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Exclusive: IPCC के वैज्ञानिक ने जताई चिंता, कहा संकट में भारतीय कृषि

इंटर गवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के वर्किंग ग्रुप-1 की रिपोर्ट में जब यह कहा गया कि आने वाली एक सदी में समुद्र का जलस्तर एक से तीन मीटर तक बढ़ जाएगा और देश-दुनिया तटीय शहर डूब जाएंगे। खैर ऐसा कुछ भी होने में अभी करीब 100 वर्ष लगेंगे, लेकिन जो संकट सामने खड़ा है, वह बेहद खतरनाक है। वो है जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव। हम सभी जानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर टिकी हुई है, जीडीपी का 20.2 हिस्‍सा कृषि और संबंधित क्षेत्रों से आता है। इस दशा में कृषि पर संकट और ज्यादा गहरा हो जाता है। इस संकट से बचने के लिए भारत को क्या करना चाहिए, उसके लिए कुछ सुझाव आईपीसीसी की रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिकों में से एक प्रो. एंड्रयू टर्नर ने दिये।

Prof. Andrew Turner

यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रो. एंड्रयू टर्नर ने भारत में हो रहे मौसमी बदलाव एवं वायु प्रदूषण पर काफी शोध किया है। वनइंडिया से खास बातचीत में उन्‍होंने कृषि क्षेत्र के आने वाले कल पर चिंता व्यक्त की। उन्‍होंने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि पृथ्‍वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। अगर हम आज से ही कार्बन एमिशन को शून्‍य को कर दें, जोकि संभव नहीं है, तो भी 2030 तक पृथ्‍वी का तापमान बढ़ेगा ही बढ़ेगा। और तापमान बढ़ने के कारण समुद्र में चक्रवातों की तीव्रता और अधिक होगी।

प्रो. टर्नर ने कहा कि तापमान में प्रत्येक डिग्री की वृद्ध‍ि के साथ मौसम की स्थ‍िति बिगड़ती जाएगी। हम अभी से ही देख रहे हैं कि भारत में मॉनसून पहले ही अनियमित हो चुका है। लंबे समय तक सूखा पड़ना, जरूरत से अधिक बारिश होना, अब आम होता जा रहा है। जाहिर है किसानों की फसल बारिश पर निर्भर करती है। ऐसे में अगर आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की वजह से कृषि पर होने वाले नुकसान को कम करना है, तो ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें मौसम विभाग की टीम को किसानों के साथ मिलकर काम करना होगा।

अगर बारिश का सटीक अनुमान लगा लिया जाए और पहले से किसानों को समय रहते बता दिया जाये, तो उसके अनुसार वो अपनी फसल की बुआई, कटाई, आदि का काम कर सकते हैं। एंड्रयू टर्नर ने 2019 की सर्दियों में अपनी भारत यात्रा का जिक्र करते हुए बताया कि दिल्ली में उत्तरी राज्यों से आने वाले धुएं के कारण प्रदूषण हर साल बढ़ जाता है। पराली जलाना उन किसानों की भी मजबूरी है। भारत सरकार उसके उपाय भी कर रही है, लेकिन जिस तरह से मौसम में परिवर्तन हो रहे हैं, उसे देखते हुए इन उपायों को तेज़ करने की जरूरत है।

crop damage due to heavy rainfall

खैर हम आपको बता दें कि भारतीय मौसम विभाग हर रोज मौसम पर अलर्ट जारी करता है, जिसमें कृषि से जुड़े अलर्ट भी रहते हैं। हां यह जरूर है कि जो किसान हाई टेक नहीं हैं, जिनके पास स्मार्ट फोन आदि नहीं हैं, उन्‍हें मौसम की जानकारी मिलने में दिक्कत होती है।

आईपीसीसी की रिपोर्ट तैयार करने वाले 193 वैज्ञानिकों में से एक प्रो. एंड्रयू ने यह सलाह भी दी कि अगर भारत के किसानों को देश में उपलब्‍ध जलाशयों का पानी इस्‍तेमाल करना सुगम बना दिया जाए तो भी आने वाले संकट से बचा जा सकता है। यानि कि जिस जगह पर बारिश नहीं होती है या देर से होती है, अगर समय पर वहां पानी पहुंंचा दिया जाए, तो नुकसान को कम किया जा सकता है।

प्रो. एंड्रयू ने कहा, "पिछली एक सदी में हमने भारत में देखा है कि मॉनसून में औसत बारिश में कमी आयी है। 1950 के बाद से औसत में ज्‍यादा गिरावट दर्ज हुई है। मॉनसूनी बारिश में कमी आने के साथ-साथ उद्योगों, वाहनों, व अन्‍य स्रोतों से एयरोसोल पॉल्‍यूशन बढ़ा है। जिस वजह से वायु की गुणवत्ता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा जितनी अधिक होगी, बारिश भी उतनी अधिक होगी। आने वाले समय में बादल फटने जैसी बारिश की घटनाएं अधिक होंगी जिसका नुकसान न केवल शहरों पर होगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों पर भी होगा। यानि कि फसलों की बर्बादी पहले की तुलना में अधिक होगी।"

crop damage due to heavy rainfall

हाल ही में कब-कब फसलें हुईं बर्बाद

> जून 2021 में यास चक्रवात के कारण ओडिशा में 2197.34 हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई, जोकि कुल फसल की 33 प्रतिशत थी।

> 2020 में देश के इन 12 राज्यों में 33 प्रतिशत फसल भारी बारिश/बाढ़/भूस्खलन की वजह से नष्‍ट हो गई:

क्र. सं. राज्य बर्बाद हुई फसल का क्षेत्रफल (हेक्टेयर में)
1 आंध्र प्रदेश 2.56 लाख
2 अरुणाचल प्रदेश 0.28 लाख
3 असम 1.73 लाख
4 बिहार 7.41 लाख
5 हिमाचल प्रदेश 0.31 लाख
6 कर्नाटक 14.32 लाख
7 मध्‍य प्रदेश 6.68 लाख
8 ओडिशा 1.79 लाख
9 सिक्किम 0.03 लाख
10 तेलंगाना 2.39 लाख
11 उत्तर प्रदेश 1.15 लाख
12 महाराष्‍ट्र 41.41 लाख
कुल 80.06 लाख
स्रोत: भारतीय कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय

> 2019 में चक्रवात फानी की वजह से फसलों की बर्बादी:

ओडिशा : 1,48,663 हेक्‍टेयर
आंध्र प्रदेश: 1,365 हेक्टेयर
पश्चिम बंगाल: 1,12,000 हेक्टेयर

क्या कहते हैं अन्‍य पर्यावरण वैज्ञानिक

आईपीसीसी-एसआरओसीसी के लीड ऑथर व इंडियन इंस्टि‍ट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी के वरिष्‍ठ वैज्ञानिक डॉ. रॉक्सी मैथ्‍यू कॉल ने आईपीसीसी की रिपोर्ट पर अपना बयान जारी करते हुए कहा है कि भारत इस वक्त खतरे की चौखट पर खड़ा है। हम पहले ही बार-बार आने वाले चक्रवात, बाढ़, सूखा, भारी बारिश और गर्म हवाओं के तीव्र प्रभावों से जूझ रहे हैं और ऐसे में मौसम अगर और अधिक तीव्र हुआ तो परेशानियां बढ़ सकती हैं। भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के आंकलन के लिए अलग से कोई सिस्‍टम अब तक नहीं है। आईपीसीसी की सि रिपोर्ट को देख कर कहा जा सकता है कि अब समय आ गया है, जब हम अपना खुद का सिस्‍टम विकसित करें, जो रिस्क असेसमेंट कर सके। विकास के कोई भी कार्य हों, चाहे एक्‍सप्रेस वे हो या फिर पब्लिक इंफ्रास्‍ट्रक्चर हर चीज में रिस्क असेसमेंट के बाद ही फैसले लेने की जरूरत है।

वहीं क्लाइमेट प्रोग्राम, वर्ल्‍ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट इंडिया की निदेशक उल्‍का केलकर का कहना है कि हमें शहरों को बसाने से पहले रिस्क अससेसमेंट की जरूरत है। यही नहीं विनिर्माण क्षेत्र में ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम करने की जरूरत है, जिससे ग्रीन हाइड्रोजन पैदा हो और रीसाइकिलिंग को बढ़ावा मिले, अन्‍यथा आने वाले समय में भारत की बड़ी आबादी लू के थपेड़ों, भारी बारिश और आंधी, चक्रवात आदि से जूझते रह जाएंगे। और हां, यह ध्‍यान रहे कि मौसम का खराब मिज़ाज न केवल बिजली-पानी बाधित करता है, बल्कि मेडिकल ऑक्सीजन की सप्‍लाई भी इससे रुक सकती है।

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