कृषि कानून 2020ः क्या मुद्दों से भटक गया है किसानों का आंदोलन, क्या कहते हैं तथ्य?
नई दिल्ली। कृषि कानून 2020 के खिलाफ हरियाणा और पंजाब किसानों के आंदोलन को समर्थन लगभग सारा विपक्ष दे रहा है, लेकिन अब किसान आंदोलन के किसानों मूल मुद्दों से भटकता नजर आ रहा है। यही कारण है कि सरकार ही नहीं, बल्कि विपक्ष के कई नेता किसान आंदोलन की प्रासंगिकता पर सवाल उठाने लग गए है। इस क्रम सबसे बड़ा सवाल कर्नाटक में कांग्रेस के सहयोग से गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर चुके पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल सेक्युलर के चीफ कुमारस्वामी द्वारा उठाया गया है।
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पूर्व मुख्यमंत्री कुमारास्वामी ने शनिवार को एक बयान में कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि किसानों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में कांग्रेस की राजनीतिक एजेंडे का साधने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने किसानों को आगाह करते हुए कहा कि किसानों को ऐसे दलों से सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि जब किसान संकट में रहता है तब किसान संघ के नेता कभी सामने नहीं आते हैं। यह बयान उन्होंने कर्नाटक राज्य किसान संघ पर आरोप लगाते हुए कहा जो किसानों की हितों की रक्षा के बदले कांग्रेस के हितों की रक्षा के लिए सक्रिय नजर आ रहा है।

उधऱ, किसान आंदोलन को लेकर केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि अब किसान आंदोलन ज्यादातर लेफ्टिस्टों और माओवादियों के हाथ में चला गया है। उन्होंने आगे है कि वामपंथी दल किसान आंदोलन की आड़ में अपना एजेंडा चलाना चाहते हैं। गोयल ने किसानों से अपील किया कि वो राजनीतिक दलों के बहकावे में न आकर सीधे अपनी बात सरकार से करें, जिनके लिए सरकार के दरवारेज खुले हैं और सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है।

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किसान आंदोलन के मूल मुद्दे पर भटकने पर कई तर्क दिए जा रहे हैं। पहला यह कि किसान आंदोलन को कांग्रेस समेत विभिन्न दल अपनी राजनीतिक दल एजेंडा को चलाने के लिए इस्तेमाल कर रही है, दूसरे हरियाणा के सिंधु बॉर्डर पर पर टुकड़े-टुकड़े गैंग के दस्तक से आंदोलन का मकसद बदलता हुआ दिख रहा है। सिंघु बॉर्डर पर धऱना दे रहे किसानों के साथ टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य देखे गए, जहां किसान-मजदूर-छात्र एकता के नाम पर शाहीन बाग और आजादी के नारे से जुड़े पोस्टर लहराए गए।

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इसके अलावा अब किसान आंदोलन में रोजाना नए नए ऐस संगठन पहुंचने लगे हैं, जिन संगठनों को किसानों या खेतीबाड़ी से कोई वास्ता ही नहीं हैं। जो महज किसान आंदोलन के जरिए अपनी राजनीतिक हित साधने की कोशिश में वहां पहुंच रहे हैं। इसके सबूत सिंघु बॉर्डर पर पहुंचे अतिथि शिक्षक संघ को लिया जा सकता है, जो मंगलवार को अतिथि शिक्षक संघ के बैनर तले सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए नजर आए। वहीं, ऑल इंडिया रेलवे मैन्स यूनियन, इंडियन टूरिस्ट, ट्रांसपोर्ट्स एसोसिएशन, क्रांतिकारी युवा संगठन और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमन के सदस्य भी वहां देखे गए।
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दिलचस्प बात यह है कि किसान आंदोलन के बहाने राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए वामपंथी संगठनों ने पूरी तरह से किसान आंदोलन को हाईजैक कर लिया, जिसकी चर्चा केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने अपने बयान में की थी। शाहीन बाग में भी इसी गैंग के लोग सक्रिय भूमिका में थे और एक शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसा में तब्दील हो गया था। ऐसा माना जा रहा है कि अगर वामपंथी संगठन किसान आंदोलन को हाईजैक करने में पूरी तरह कामयाब हो गए तो किसान आंदोलन की दिशा-दशा भटक सकती है।

किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन में वामपंथी गैंग के पहुंचने पर आवाज उठाते हुए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि किसान नेताओं के आंदोलन में UAPA के तहत जेल में बंद शरजील और उमर खालिद की रिहाई की मांग क्यों हो रही है। हालांकि उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन भटका तो किसी को लाभ नहीं होने वाला है। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए सरकार के दरवाजे हमेशा खुले है और उन्हें सीधे सरकार से अपनी बात कहनी चाहिए। उन्होंने पंजाब सरकार पर आरोप लगाया कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में किसानों को पहले दिन से भड़काया गया।

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गौरतलब है किसान आंदोलन एमएसपी, मंडी और एपीएमसीट एक्ट को खत्म करने की निर्मूल आंशकाओं को लेकर शुरू हुआ था, जबकि कृषि कानून में तीनों को खत्म करने का कहीं भी उल्लेख किया गया है। बावजूद इसके जब किसान आंदोलन शुरू हुआ और सरकार ने बातचीत के लिए किसानों को आमंत्रित किया तो किसानों के हर आशंका का समाधान को राजी सरकार ने किसानों से कृषि कानून में संशोधन का सुझाव मांगा, लेकिन महज कृषि कानून को निरस्त करने की मांग पर अड़े रहे।

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हालांकि जब सरकार ने कृषि कानून को रदद् नहीं करने के संकेत दे दिए, तो किसान आंदोलन और तेज करने की धमकी दी गई। परिणाम स्वरूप सरकार की ओर से किसानों से बात कर रहे केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसान प्रतिनिधियों को एमएसपी को कानूनी मान्यता देने की बात कही, इस पर भी किसान नेता तैयार नहीं हुए और कृषि कानून को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए। इससे यही लगता है कि कृषि कानून की आड़ में कोई राजनीतिक खेल चल रहा है, जिसमें अब असामाजित तत्वों को भी प्रश्रय मिलता दिख रहा है।

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माना जा रहा है कि किसान आंदोलन कृषि और कृषक हितों से इतर हटकर मोदी सरकार विरोधी आंदोलन में सिमटता जा रहा है। य़ह ठीक सीएए और एनआरसी के खिलाफ शुरू हुआ सरकार विरोधी आंदोलन बनकर रह गया है। यह इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि चौथे दौर के बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने जब किसानों से बातचीत के दौरान एमएसपी को संवैधानिक दर्जा दिलाने की बात कहीं तो तब भी किसान कृषि कानून 2020 को निरस्त करने की जिद पर अड़े रहे, जबकि एमएसपी को कानूनी दर्जा मिलने से उक्त आशंका का विराम लगना स्वाभाविक था, जिसको मुख्य मुद्दा बनाकर किसान आंदोलनरत हैं।

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किसान ऐसे में सरकार संवैधानिक प्रक्रियाओं से पारित कृषि कानून 2020 को कैसे निरस्त करने के बारे में राय बना सकती है, जब किसान कृषि कानून को लेकर कोई संभावित समस्या को रख नहीं रहे हैं। अभी तक किसी भी बैठक में किसानों की ओर से कृषि कानून में संशोधन को लेकर कोई सुझाव नहीं दिया गया है। किसान प्रतिनिधियों से सिर्फ एक रट्टा लगा रखा है कि जब तक कृषि कानून वापस नहीं लिया जाता है, वो तब तक सरकार के खिलाफ धऱना देते रहेंगे और सरकार इस ऊहापोह में हैं कि जहां समस्या हो, उसको दुरस्त किया जाए, जिससे किसान संतुष्ट हो सके।

उल्लेखनीय है मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानून 2020 में उन्हीं बातों को जोड़ा गया है, जिसकी मांग किसान आंदोलन के समर्थन भारतीय किसान यूनियन अपने मेनिफेस्टो 2019 में कर चुकी है। इसका प्रावधान किसान आंदोलन में अगुआ पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सरकार खुद पंजाब में कर चुकी है, जिसको आधार बनाकर कांग्रेस ने 2019 लोकसभा चुनाव में अपनी घोषणा पत्र में एपीएमसी एक्ट को खत्म करने का दावा किया था। यही वजह है कि किसान आंदोलन का सच कब का सतह पर आ चुका था, लेकिन कृषि कानून 2020 के खिलाफ आंदोलन की अधकचरी तैयारी ने अब पोल खोल दी है।












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