डॉलर के मुकाबले में लगातार क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?
आजकल हम रूपये का गिरना जैसी ख़बरें अक्सर सुन रहें हैं और इसके बारे में तरह तरह की राय बना रहें हैं। एक दशक में पहली बार, डॉलर 2022 की पहली छमाही में अपने उच्चतम मूल्य पर पहुंच गया और उसके मुकाबले रूपये का मूल्य गिर गया और 82 रूपये तक पहुंच गया। जैसे ही कोरोना के बाद संभल रहे थे, यूक्रेन में युद्ध शुरू हुआ, उसके बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी, वैश्विक मंदी की आहट आने लगी, अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ी तो अमेरिका के फेडरल बैंक ने ब्याज दर बढ़ाना शुरू कर दिया। विदेशी निवेशक रिटर्न रेट बढ़ने के कारण पैसा भारत से निकालकर वहां लगाने लगे तो डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता चला गया।

देश पहले से ही उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर विकास दर से जूझ रहा था, अब रुपये की यह गिरावट भी परेशान कर रही है। हालांकि इसमें अपना उतना दोष नहीं है। इसीलिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, "रूस-यूक्रेन युद्ध, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थितियों के सख्त होने जैसे वैश्विक कारक डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने के प्रमुख कारण हैं। जबकि ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन और यूरो जैसी वैश्विक मुद्राएं भारतीय रुपये की तुलना में अधिक कमजोर हुई हैं। इसका मतलब कि भारतीय रुपया 2022 में इन मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है।" उनका यह कथन बिल्कुल ठीक है।
भारत में जो डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा है यह रूपये का अवमूल्यन नहीं यह सापेक्षिक गिरावट है जिसे रूपये का मूल्य ह्रास कहते हैं। मतलब इसे सरकार नहीं गिरा रही है। यह बाजार की परिस्थितियों के कारण बना है। इस बाजार में ऐसा नहीं है कि रुपया कमजोर हो गया तो गिर गया। यह तो दुनिया की करेंसी में से किसी एक करेंसी के ज्यादा मजबूत होने के कारण बाकी सब अपने आप कमजोर हो जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आप किसी दौड़ प्रतियोगिता में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं लेकिन दूसरे देश का धावक तेज दौड़ता है तो वह आगे निकल जाता है और दूसरे पीछे छूट जाते हैं। यही हाल डॉलर का हो गया है।
रुपये के मुकाबले डॉलर की आसान दौड़
वैश्विक परिस्थितियां ऐसी हो गई है जिसमें डॉलर की दौड़ आसान हो गई और वह आगे निकल रहा है। बाकी मुद्राएं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए भी उससे पीछे हैं। चूंकि आज के दौर में वही मानक मुद्रा है तो सबको अपनी मुद्राएं गिरती दिख रहीं हैं। भारत की मुद्रा की सापेक्षिक गिरावट तो कई देशों की गिरावट से कम है।
इसीलिए मुद्रा के इस उथल पुथल में भारत का रुपया भले ही डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है लेकिन अन्य देशों के मूल्यह्रास के कारण उनके सापेक्ष मजबूत भी हुआ है इसलिए यह केवल गिरावट नहीं है। रुपया कई देशों के मुकाबले मजबूत भी हुआ है। इसलिए इसे सिर्फ एक कोण से नहीं देखा जा सकता, बहुआयामी दृष्टिकोण लगाना पड़ेगा।
हर देश की विशिष्ट आर्थिक परिस्थिति होती है। उसकी खुद की बुनियादी आर्थिक विशेषता होती है, ब्याज दर होती है। राजनीतिक स्थिरता, अस्थिरता होती है। निवेशकों के जोखिम के विशिष्ट कारक होते हैं। ऐसे में इन देशों का मूल्य ह्रास इस विशिष्टता के कारण अलग अलग हो रहा है।
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मजबूत रूपये के लिए आयात निर्यात संतुलन जरूरी
भारत जैसा विकासशील देश ज्यादातर तेल, गैस, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स, हैवी मशीनरी, प्लास्टिक आदि के मामले में आयात पर निर्भर करता है और इसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में करता है। रुपये के मूल्य में गिरावट के साथ, देश को पहले की तुलना में उसी वस्तु के लिए अधिक भुगतान करना पड़ता है। इस घटना से कच्चे माल और उत्पादन लागत में वृद्धि होती है जिसकी मार अंततः ग्राहकों पर ही पड़ती है। आयात से जुड़ी हर चीज प्रभावित होती है। हालांकि कमजोर घरेलू मुद्रा निर्यात को बढ़ावा देती है क्यूंकि विदेशी खरीदार की डॉलर में क्रय शक्ति बढ़ जाती है लेकिन कमजोर वैश्विक मांग और लगातार अस्थिरता के मौजूदा परिदृश्य में इसका लाभ भारत को मिलता नहीं दिख रहा है।
इस बीच देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट आई है, देश का व्यापार घाटा भी बढ़ा है। जून में देश का व्यापार घाटा 26.18 अरब डॉलर रहा है। रुपये को संभालने के लिए आरबीआई ने खुले मार्केट में डॉलर की बिक्री भी की है, लेकिन अभी तक इसका कोई खास असर दिख नहीं रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि सरकारी अवमूल्यन तो अपने हाथ में है। बाजार आधारित मूल्यह्रास का उपाय क्या है? तो उपाय है। सरकार इसे वैश्विक कारक बोलकर पल्ला नहीं झाड़ सकती या डॉलर बेचकर या ब्याज दर बढ़ाकर मुकाबला नहीं कर सकती क्यूंकि अन्ततः यह कर्ज को महंगा कर देता है। हमारा मानना है कि यदि अपना घर मजबूत होता तो डॉलर की मजबूती की ऐसी आंधियां हमारे रूपये को प्रभावित नहीं कर पाती।
रूपये को मजबूत बनाने के कुछ सुझाव
यदि हम आयात निर्यात संतुलन बनायें, पेट्रोल और गैस पर निर्भरता कम कर वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग से अपना तेल और गैस आयात कम कर दें, आत्मनिर्भर भारत के लिए मेक इन इंडिया पर तेजी से काम करें, डॉलर का ऑउटफ्लो कम कर इनफ्लो पर काम करें, दूसरे देशों से रूपये या अन्य मजबूत मुद्राओं में सौदे की बात करें तभी जाकर हम अमेरिकी डॉलर की औकात विश्व बाजार में नियंत्रित कर सकते हैं। नहीं तो वैश्विक मान्य करेंसी के रूप में उसकी मांग हमेशा बनी रहेगी और बेहतर करने के बावजूद भी किसी अन्य कारण से उसकी मांग बढ़ गयी तो हमारी सारी मेहनत धरी की धरी रह जायेगी और रुपया गिरता जायेगा।
एक नहीं है मुद्रा अवमूल्यन और मूल्यह्रास
यहां हमें जानना चाहिए कि रूपये का अवमूल्यन और रूपये का मूल्य गिरना दो अलग अलग चीजें हैं। इसे एक ही बात समझने की भूल नहीं करना चाहिए। रूपये का अवमूल्यन किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष जानबूझकर नीचे की ओर किया गया समायोजन है। जिन देशों में मुद्रा की एक स्थिर विनिमय दर या अर्ध-स्थिर विनिमय दर होती है, वे इस तरह की मौद्रिक नीति का उपयोग करते हैं। इसे अक्सर रूपये का मूल्यह्रास समझ लिया जाता है। मुद्रा अवमूल्यन का निर्णय बाजार नहीं किसी देश की सरकार लेती है। यह रूपये के मूल्यह्रास की तरह गैर-सरकारी गतिविधियों का परिणाम नहीं बल्कि सरकार द्वारा सोच विचार कर किया गया निर्णय होता है।
जबकि मुद्रा का मूल्यह्रास एक मुद्रा के मूल्य में उसकी विनिमय दर बनाम अन्य मुद्राओं के संदर्भ में गिरावट को संदर्भित करता है। मुद्रा का मूल्यह्रास चूंकि बाजार आधारित होता है इसलिए यह बुनियादी आर्थिक बातों, ब्याज दर के अंतर, राजनीतिक अस्थिरता, या निवेशकों के बीच जोखिम से बचने जैसे कारकों के कारण हो सकता है। जिन देशों की आर्थिक बुनियाद कमजोर होती है, पुराना चालू खाता घाटा चला आ रहा होता है या मुद्रास्फीति की उच्च दर होती है, उन देशों की मुद्राओं में आम तौर पर मूल्यह्रास होता रहता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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