Terror Funding: आतंकवाद पर लगाम कसने के लिए टेरर फंडिंग पर रोक जरूरी
Terror Funding: पिछले सप्ताह देश में 'नो मनी फॉर टेरर' कॉन्फ्रेंस आयोजित की गयी। आतंकवाद की वैश्विक समस्या का समाधान खोजने के लिए इसमें 75 देश इकट्ठा हुए। सभी देशों ने इस बात पर सहमति जतायी कि आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने के लिए, इसे अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली फंडिंग पर सख्ती से लगाम लगाना जरूरी है। लगभग सभी ने इस मामले में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की सदिच्छा भी दर्शायी है।

आतंकवाद पोषण के अलग-अलग स्रोत
आतंकवाद तरह-तरह का होता है। इसमें व्यक्तिगत कृत्य, सामूहिक हमले, ब्रेनवाशिंग अभियान, आतंकी विचारधारा का प्रसार, आतंकवादी प्रशिक्षण कार्यक्रम जैसी गतिविधियॉं शामिल हैं। सभी कामों के लिए बड़ी मात्रा में धन की जरूरत होती है। इसके लिए आतंकी समूह तरह-तरह के स्रोतों से मदद लेते हैं। ये स्रोत ड्रग्स, हथियारों की तस्करी, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, अपहरण व फिरौती जैसे गैरकानूनी मगर संगठित अपराध भी हो सकते हैं और दान, चंदे, सदस्यता शुल्क के वैध रूप भी।
पिछले कुछ समय से इस बात की भी बहुत चर्चा है कि आतंकवादी समूह क्रिप्टो और क्राउडफंडिंग के जरिये भी धन संग्रह और हस्तांतरण कर रहे हैं। इस काम में गैरलाभकारी संगठनों अर्थात् एनजीओ का भी इस्तेमाल किया जाता है, ताकि उन्हें मिलने वाले डोनेशन या फंडिंग को वैध दर्शाया जा सके। कई देश ऐसे भी हैं, जो टेरर फंडिंग के जरिये दुनिया में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए कुख्यात हैं।
कई बार एजेंसियों के लिए वास्तविक वाणिज्यिक गतिविधियों और आतंकवाद को पोषित कर रहे वित्तीय व्यवहार के बीच फर्क करना बहुत कठिन हो जाता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत-पाक सीमा व्यापार का उपयोग किस तरह से आतंकवादी संगठनों को धन उपलब्ध कराने के लिए किया जाता रहा है। पुलवामा हमले के मामले में भी, राष्ट्रीय जॉंच एजेंसी (एनआईए) ने पता लगाया था कि जैश आतंकवादियों को बैंक चैनलों के माध्यम से लगातार धन का हस्तांतरण किया जा रहा था।
तकनीकी की चुनौती
आतंकवादी संगठन अपने कारनामों की तैयारी व क्रियान्वयन के लिए डार्क वेब का उपयोग करते हैं। डार्क वेब के जरिये मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स के कारोबार जैसी गतिविधियों को काफी बढ़ावा मिला है।
परस्पर संदेशों के आदान-प्रदान के लिए वे ओनियन राउटिंग नामक तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। यह किसी कम्प्यूटर नेटवर्क में गुमनाम रहकर संवाद करने का एक निरापद तरीका माना जाता है।
इसमें एनक्रिप्टेड डाटा, ओनियन राउटरों की एक श्रंखला के जरिये सफर करता है। बीच में जितने भी माध्यम आते हैं, वे इसे अगले पड़ाव तक ले जाने के लिए केवल इसकी एक परत ही उघाड़ पाते हैं। अंतिम परत के उतरने के साथ ही यह डाटा डिक्रिप्ट होकर अपनी मंजिल तक पहुँच जाता है।
डाटा की इस पूरी यात्रा में, हर माध्यम सिर्फ अपने से पहले वाले और बाद में आने वाले पड़ाव के बारे में ही जान पाता है। इसमें किसी के लिए भी, असली यूजर तक पहुँच पाना बहुत कठिन होता है। इसने सुरक्षा एजेंसियों के लिए, सतर्कता और निगरानी के काम को बहुत मुश्किल बना दिया है। दूसरे, साइबर क्राइम को लेकर अभी तक वैश्विक स्तर पर कानून और नियमों को लेकर सहमति का भी अभाव है, जिसका आतंकवादी समूह भरपूर लाभ उठाते हैं।
टेरर फंडिंग के खिलाफ सक्रिय संस्थाएं
1989 में जी7 देशों ने एक इंटर गवर्नमेंटल फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का गठन किया था, ताकि मनी लॉन्ड्रिंग पर नकेल कसी जा सके। लेकिन, 2001 में इसका दायरा बढ़ाते हुए टेरर फंडिंग को भी इसमें शामिल किया गया। इसी एफएटीएफ ने पता किया था कि किस तरह इस्लामिक स्टेट जैसी संस्थायें फाइनेंशियल फंडिंग के लिए नये-नये तरीके इजाद कर रही हैं। इनमें टैक्सेशन और तेल-गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जैसे उपाय शामिल थे।
आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ वैश्विक गतिविधियों में मनीवैल काफी सक्रिय भूमिका निभाता है। वह यह मूल्यांकन करता है कि सदस्य राज्यों और क्षेत्रों द्वारा एफएटीएफ के मानकों का सही ढंग से पालन हो रहा है या नहीं। इसके लिए वह व्यवहारिक कठिनाइयों को दूर करने में भी मदद करता है।
नो मनी फॉर टेरर सम्मेलन, इसी तरह की एक और अंतरराष्ट्रीय पहल है। इसका आयोजन सदस्यों देशों की फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिटों के समूह एग्मोंट द्वारा किया जाता है। इसकी शुरुआत 2018 में में पेरिस से हुई थी। इसके अगले साल यह मेलबर्न में आयोजित किया गया।
दिल्ली में हुए सम्मेलन का मुख्य एजेंडा, पिछले दो सम्मेलनों में इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच हुई चर्चा को आगे ले जाना था। इसमें साइबर अपराधों को लेकर वैश्विक कानूनों में एकरूपता और सभी सदस्य देशों की फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिटों के बीच परस्पर सहयोग व तालमेल की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया है।
भारत कर सकता है अगुवाई
करीब तीन दशकों तक, भारत आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक रहा है। यह सही है कि 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद देश में आतंकी हमलों की वारदातें काफी कम हुई हैं। लेकिन, इसका यह अर्थ नहीं है कि खतरा खत्म हो गया है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया, इराक, तुर्की जैसे देशों में आतंकवादी रह-रह कर अपने नापाक मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं। इसे देखते हुए नहीं लगता कि भारत को अभी निश्चिंत हो जाना चाहिए।
अच्छी बात यह है कि सरकार इस बात को अच्छी तरह से समझ रही है और आतंकवाद की जड़ें कमजोर करने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रहने देना चाहती। लेकिन, आतंकवाद के फंडिंग के स्रोत इतने बड़े और विविधतापूर्ण हैं कि सबके साझा प्रयास ही इनकी काट कर सकते हैं। सम्मेलन में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सदस्यों को आश्वस्त किया कि "भारत, समान विचारधारा वाले भागीदारों के साथ, वैश्विक सुरक्षा और स्थिरता के लिए आतंकवाद के अस्तित्व के खतरों को उजागर करने के लिए प्रतिबद्ध और ऊर्जावान रहेगा।''
भारत ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए, इन प्रयासों की अगुवाई का प्रस्ताव रखा है। सब कुछ ठीक रहा तो आतंकवाद के वित्त पोषण और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ इस अंतरराष्ट्रीय पहल का वैश्विक सचिवालय भारत में बन सकता है।
यह भी पढ़ें: Terror Funding: चीन, पाक और अफगानिस्तान नहीं रोकेंगे आतंकियों को फंडिंग
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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