उद्योग क्षेत्र में भारत की 75 वर्षों की गौरवपूर्ण उपलब्धियां
भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 3 जनवरी 1948 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में 50,000 से अधिक लोगों की एक जनसभा को संबोधित करते हुए स्वाधीन भारत के उद्योगों के विकास एवं सरंचना की कल्पना पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा, "समय की मांग है और आमतौर पर एक सहमति भी बन गयी है कि भारत को स्वतंत्र देश के रूप में अपना अस्तित्व बनाने के लिए अधिक उत्पादन करना चाहिए।

भारत के पास एशिया का नेतृत्व संभालने का एक अवसर भी है, लेकिन यह मौका चूक जाएगा यदि हम अपनी अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित नहीं कर पाए। अपने उद्योगों को इस हद तक आगे विकसित करना होगा जिससे एशिया में घाटे वाले देशों की आवश्यकताओं को पूरा करने में हम सक्षम हो सकें।"
स्वाधीन भारत के औद्योगिक विकास की सबसे पहली जिम्मेदारी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं रसद आपूर्ति मंत्री के रूप में मिली। अपने लगभग दो साल से अधिक के कार्यकाल में उन्हें भारत की औद्योगिक नीति की नींव डालने का एक अवसर मिला और इस नाते उन्होंने जो कार्य किये वे बेहद प्रेरणादायक थे।
डॉ. मुखर्जी ने 1949 में दिल्ली पॉलिटेक्निक साइंस एंड टेक्नोलॉजी एसोसिएशन कार्यक्रम को एकबार संबोधित करते हुए कहा था, "लोगों की बड़ी संख्या में आर्थिक सुरक्षा और उनकी जीवनशैली में सुधार ही वह आधार है, जिस पर सभी प्रकार की राजनीतिक संस्थाए निर्भर करती है। इसलिए राजनीतिक स्वतंत्रता का न तो तब कोई अर्थ है और न ही उसमें स्थायित्व है, जब तक उसके आर्थिक पक्ष को गहराई से महसूस न किया जाये।" इस दृष्टि से वे उद्योगों में एक व्यापक तकनीकी क्रांति को आवश्यक मानते थे, ताकि आम लोगों की जीवन शैली को उन्नत किया जा सके।
1948 में भारत सरकार की पहली औद्योगिक नीति में डॉ. मुखर्जी के विचारों का ही प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। उन्होंने भारत के लघु एवं कुटीर उद्योगों को पुनर्व्यवस्थित एवं विकसित करने को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया। उनके कार्यकाल में अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड, अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड, वस्त्र अनुसंधान संस्थान और खादी एवं ग्रामीण उद्योग बोर्ड स्थापित किये गए। 4 जून 1949 को प्रधानमंत्री नेहरू ने डॉ. मुखर्जी को एक पत्र लिखकर उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा, "मैंने कल कॉटेज इंडस्ट्री एम्पोरियम देखा था और मुझे वह पसंद आया। मुझे लगता है कि वह एकदम ठीक-ठाक है और उसके अच्छे नतीजे सामने आयेंगे।"
खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) का वर्तमान में अवलोकन करे तो पता चलता है कि इसने एक उच्चतम महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर ली है, जो भारत में सभी एफएमसीजी कंपनियों के लिए अभी एक दूरस्थ लक्ष्य बन गयी है। वर्ष 2022 में केवीआईसी ने पहली बार 1.15 लाख करोड़ रुपये का जबरदस्त कारोबार किया, जो देश में किसी भी एफएमसीजी कंपनी द्वारा अभूतपूर्व है। इस उपलब्धि को प्राप्त करने वाली केवीआईसी देश की एकमात्र ऐसी कंपनी है जिसने 1 लाख करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया है।
केंद्रीय मंत्री के रूप में डॉ. मुखर्जी को लघु एवं कुटीर उद्योगों के साथ-साथ आधारभूत भारी उद्योगों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तीन सफल परियोजनाओं की शुरुआत का भी श्रेय जाता है:
1. 1948 में पश्चिम बंगाल के चितरंजन में रेल इंजन कारखाने की स्थापना हुई, जिसमें 1950 में देशबंधु नाम से पहले भारतीय स्वचालित इंजन का निर्माण किया गया। वर्तमान में, चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (सीएलडब्ल्यू), रेलवे बोर्ड के 485 इंजनों के उत्पादन लक्ष्य के मुकाबले वित्त वर्ष 2021-22 में रिकॉर्ड 486 इंजनों का उत्पादन करके एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर चुका है।
2. डॉ मुखर्जी ने 1940 में स्थापित हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट फैक्टी को देश की स्वतंत्रता के बाद एक लिमिटेड कंपनी के रूप में पुनर्गठित किया था। बाद में अगस्त 1963 में मिग 21 बनाने के लिए एयरोनॉटिक्स इंडिया लिमिटेड (एआइएल) अस्तित्व में आई। जून 1964 में सरकार ने हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को एयरोनॉटिक्स इंडिया लिमिटेड के साथ मिला दिया। इस प्रकार हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का जन्म हुआ। आज यही एचएएल, हॉक प्रशिक्षण विमान, तेजस एकल इंजन लड़ाकू विमान, और सुखोई-30 एमकेआई लडाकू विमान का उत्पादन कर रहा है।
3. भिलाई स्टील प्लांट की कल्पना को भी डॉ. मुखर्जी ने साकार किया था। विगत वर्षों में दस बार देश का सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात कारखाने के लिए प्रधानमंत्री ट्रॉफी प्राप्त यह कारखाना राष्ट्र में रेल की पटरियों और भारी इस्पात प्लेटों का एकमात्र निर्माता तथा संरचनाओं का प्रमुख उत्पादक है। देश में 260 मीटर की रेल की सबसे लम्बी पटरियों के एकमात्र सप्लायर, इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 31 लाख 53 हजार टन विक्रय इस्पात की है।
मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय न्यूजप्रिंट तथा पेपर मिल्स लिमिटेड, बिहार के धनबाद में (अब झारखण्ड में) सिंद्री खाद कारखाना और दामोदर घाटी निगम जैसे उद्योगों की स्थापना भी डॉ. मुखर्जी के कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों में से एक थे।
डॉ. मुखर्जी ने 1950 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। तत्पश्चात, देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यूएसएसआर के वामपंथी ढांचे के अनुरूप देश में पंचवर्षीय योजनाओं को लागू कर दिया। इन योजनाओं के माध्यम से देश के शीघ्र औद्योगीकरण का वादा किया गया था। शुरुआत के तौर पर द्वितीय पंचवर्षीय योजना में उद्योगों पर व्यय होने वाली राशि 891 करोड़ रुपये निर्धारित की गयी जोकि पहली पंचवर्षीय योजना की राशि 179 करोड़ रुपए की लगभग पांच गुनी थी। पहली योजना में समस्त व्यय का 7 प्रतिशत उद्योगों पर जबकि द्वितीय योजना में यह 19 प्रतिशत कर दिया गया।
फिर भी देश के औद्योगिक ढांचें में बहुत कुछ सुधार की आवश्यकता महसूस की गयी। अतः वर्ष 1956 में एक औद्योगिक नीति बनाई गयी। प्रधानमंत्री नेहरू की सरकार ने तय किया कि आधारभूत एवं सुरक्षा उद्योग अथवा जनहित सेवायें सरकारी क्षेत्र में रहेगी। इसलिए सरकार ने इस प्रकार के सभी उद्योगों को पूर्णतः सरकारी संरक्षण दिया और कांच, सीमेंट एवं रसायन जैसे उद्योगों को निजी क्षेत्र को सौंप दिया। इसके अलवा निजी क्षेत्र को अपनी आवश्यकताओं के लिए सरकारी क्षेत्र पर निर्भर रहने की एक शर्त भी जोड़ दी गयी। कुल मिलाकर यह देश की औद्योगिक नीति की समाजवादी व्यवस्था थी और इसे ही 'लाइसेंस कोटा परमिट राज' के नाम से जाना जाता है।
शुरूआती वर्षों में नवाचार और भारी उद्योगों से ज्यादा कृषि पर अधिक बल दिया गया। लाल बहादुर शास्त्री जब देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने कार्यकाल में विदेशी निवेश सहित निजी क्षेत्र की उपयोगिता पर ध्यान देना शुरू किया। दुर्भाग्यवश, ताशकंद में उनकी हत्या हो गयी और उन्हें भारत के उद्योगों को नयी दिशा एवं दशा देने का पूरा मौक़ा नहीं मिला।
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के कार्यकालों में भारतीय उद्योगों को सकारात्मक दिशा देने के लिए अलग-अलग औद्योगिक नीतियों को जरुर पेश किया गया लेकिन उनका कोई ठोस लाभ देश को नहीं मिला। इसका एक बड़ा कारण लाइसेंस राज व्यवस्था को समाप्त नहीं करना था। साथ-ही-साथ वैश्विक एक्सपोज़र की कमी के चलते हमारे उद्योग तकनीकी स्तर पर पिछड़ते चले गए और बंद होने के कगार पर पहुँचने लगे। नतीजा यह हुआ कि 1991 तक देश के आर्थिक हालात एकदम कमजोर हो गए।
वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में एक नई औद्योगिक नीति को अपनाया गया, जिसका उद्देश्य देश की पिछली औद्योगिक उपलब्धियों को मजबूती प्रदान करना और भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा योग्य बनाने की प्रक्रिया में तेजी लाना था।
संसद में अपने बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट करते हुए कहा, "औद्योगिक विकास की नीतियों का व्यापार की नीतियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे औद्योगिक विकास को प्रारंभिक चरण में संरक्षण की आवश्यक थी ताकि हम बिना किसी व्यवधान के सीखने की अवधि से गुजर सकें।...... औद्योगीकरण की चार दशकों की योजना के बाद, अब विकास के एक ऐसे चरण में पहुंच गए हैं जहां हमें डर के बजाय विदेशी निवेश का स्वागत करना चाहिए।...... प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पूंजी प्रौद्योगिकी और बाजारों तक पहुंच प्रदान करेगा। यह हमारे औद्योगिक क्षेत्र को चरणबद्ध तरीके से विदेशों से प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा।"
शुरुआती वर्षों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में धीमी गति रही लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह अपने अधिकतम स्तर पर पहुँचने लगा है। भारत ने वित्त वर्ष 2021-22 में 83.57 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल किया जो अब तक किसी भी वित्त वर्ष में सबसे अधिक है। वर्ष 2014-15 में भारत में एफडीआई केवल 45.15 अरब अमेरिकी डॉलर का था। वित्त वर्ष 2003-04 की तुलना में भारत के एफडीआई में 20 गुना वृद्धि हुई है, जब एफडीआई केवल 4.3 अरब अमेरिकी डॉलर था।
वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान भारत में निवेश करने वाले शीर्ष निवेशक देशों के मामले में सिंगापुर 27 प्रतिशत के साथ पहले स्थान पर है। इसके बाद 18 प्रतिशत के साथ अमेरिका दूसरे स्थान पर और 16 प्रतिशत के साथ मॉरीशस तीसरे स्थान पर आता है। वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान देश में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर क्षेत्र में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश देखने को मिला है जहां करीब 25 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ क्रमशः सेवा क्षेत्र (12 प्रतिशत) और ऑटोमोबाइल उद्योग (12 प्रतिशत) का स्थान है।
वर्तमान में परंपरागत, लघु एवं आधारभूत उद्योगों में दिन-प्रतिदिन ऊँचाइयाँ प्राप्त करने के साथ-साथ भविष्य के उपक्रमों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, भू-स्थानिक प्रणाली, ड्रोन, अर्धचालक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के साथ-साथ 5जी जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया जाने लगा है। इसके लिए केंद्रीय बजट 2021-22 में भी प्रावधान बनाये गए है।
प्रधानमंत्री मोदी ने 2 मार्च 2022 को 'प्रौद्योगिकी-सक्षम विकास' वेबिनार में अपने विचार व्यक्त कर भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को सरकार से पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया, "युवाओं के स्किलिंग, री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग के लिये एक पोर्टल का प्रस्ताव बजट [2022] में किया गया है।"
नवाचार की दुनिया में स्टार्टअप इंडिया अभियान के शुभारंभ यानी 16 जनवरी 2016 के बाद से 2 मई 2022 तक देश में 69,000 से अधिक स्टार्टअप को केंद्र सरकार द्वारा मान्यता दी गई है। भारत में नवाचार केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है बल्कि आईटी सेवाओं से 13 प्रतिशत, स्वास्थ्य सेवा एवं जीवन विज्ञान से 9 प्रतिशत, शिक्षा में 7 प्रतिशत, पेशेवर एवं वाणिज्यिक सेवाओं से 5 प्रतिशत, कृषि में 5 प्रतिशत और खाद्य एवं पेय पदार्थों से 5 प्रतिशत के साथ 56 विविध क्षेत्रों में समस्याओं को हल करने वाले नवाचार यानि स्टार्टअप को मान्यता दी है।
ऐसे भारतीय स्टार्टअप जो यूनिकॉर्न श्रेणी - एक बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का पूंजीगत मूल्य हासिल कर चुके है, उनकी संख्या भी मई 2022 तक 100 पहुँच गयी है। इनका कुल पूंजीगत मूल्य 332.7 अरब अमेरिकी डॉलर है। जबकि 2016-17 तक हर साल लगभग एक यूनिकॉर्न तैयार होता था। पिछले चार वर्षों में (वित्त वर्ष 2017-18 के बाद से) यह संख्या तेजी से बढ़ रही है और हर साल अतिरिक्त यूनिकॉर्न की संख्या में सालाना आधार पर 66 प्रशित की वृद्धि हुई है। आज वैश्विक स्तर पर हर 10 में से 1 यूनिकॉर्न का भारत में उदय हो रहा है।
यही नहीं, आज भारतीय औद्योगिक उपक्रम वैश्विक स्तर पर अपनी धाक जमा रहे है। उद्योग जगत की पत्रिका 'फ़ोर्ब्स' के अनुसार वर्ष 2022 में विश्व के 2000 प्रमुख उपक्रमों में 55 उपक्रम भारतीय है। इस प्रकार विश्व में भारत सातवाँ ऐसा देश बन गया है, जिसके सर्वाधिक उपक्रम वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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