वामपंथी सेकुलरिज्म की गिरफ्त में क्यों है बॉलीवुड का नैरेटिव?
2020 में एक वेब सीरीज ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज हुई जिसका नाम था, "जामताड़ा: सबका नंबर आयेगा।" यह वेब सीरीज नेटफ्लिक्स पर आयी थी जो कि झारखण्ड के जामताड़ा से चलाये जा रहे साइबर गिरोहों पर आधारित थी। इस वेब सीरीज में साइबर गिरोह के संचालक और सदस्यों में अधिकांश लोगों को हिन्दू के रूप में दिखाया गया था। हां, एक नौजवान मुस्लिम पत्रकार का किरदार जरूर जोड़ा गया जो कि इस गिरोह के खिलाफ खबर लिखता है।

लेकिन एक साल बाद अगस्त 2021 में जब दिल्ली पुलिस ने विशेष अभियान चलाते हुए जामताड़ा से 14 साइबर अपराधियों को गिरोह के मुखिया समेत गिरफ्तार किया तो पता चला कि इस गिरोह के सभी सदस्य मुस्लिम थे। इस साइबर क्राइम गिरोह के मुखिया का नाम अल्ताफ अंसारी और गुलाम अंसारी था।
जिसने भी जामताड़ा वेब सीरीज देखी होगी उसके मन में अदृश्य रूप से ये बात बिठा दी गयी कि हिन्दू अपराधी मानसिकता के होते हैं जो हर प्रकार की ठगी और अपराध में माहिर होते हैं जबकि मुस्लिम ऐसे अपराधों के खिलाफ लड़ाई लड़ता है। इसे ही नैरेटिव बिल्डिंग कहा जाता है। जो है उसके आधार पर वह बता दो जो नहीं है।
हमारी फिल्मों में या फिर अब वेब सीरीज में बहुत महीन तरीके से ये नैरेटिव बिल्डिंग किया जाता है और जो है उसे दिखाने के लिए नहीं, बल्कि जो नहीं है उसे दिखाकर स्थापित कर दिया जाता है। और यह नैरेटिव बनाने का काम किया है वामपंथी सेकुलरिज्म और कट्टरपंथी धर्मांधता से ग्रस्त उन लोगों ने जिनका फिल्म जगत पर लम्बे समय से कब्ज़ा है।
मुगल ए आजम का नैरेटिव
वामपंथी सेकुलरिज्म नैरेटिव या कथानक गढ़ने की कला देखनी हो तो एक पुरानी फिल्म "मुगल-ए-आज़म" को याद करना अच्छा रहेगा। आम तौर पर इस फिल्म से इतिहास की ये समझ बनती है कि सलीम ने मुहब्बत के लिए अपने बाप अकबर से बगावत की थी। असली वजह ये थी कि अकबर का शासनकाल करीब पचास साल का था। अधेड़ हो चुका सलीम समझ रहा था कि अगर उसके खुद के जवान होते बेटों के लिए उसने गद्दी जल्दी नहीं छोड़ी तो कल को वो बगावत करेंगे। बुढ़ापे में राज मिले और जल्दी ही गद्दी छोड़नी पड़े तो शासन कब करता? ताज जल्दी अपने सर पर रखने के लिए सलीम ने बगावत की थी। इतिहास की किताबों के हिसाब से "अनारकली" कोई थी ही नहीं। सलीम उर्फ़ जहाँगीर की माँ का नाम भी मरियम-उल-ज़मानी मिलता है, जोधा बाई नहीं।
अब्दुल रहीम खानेखाना जो रहीम के दोहों के लिए जाने जाते हैं वो कृष्ण भक्त थे। वो अकबर के करीबी थे। अकबर के करीबी इसलिए क्योंकि अपने संरक्षक बैरम खान की मौत के बाद अकबर ने बैरम खान के परिवार को अपने पास बुलवा लिया था। बैरम खान और उनकी पहली पत्नी के बेटे थे अब्दुल रहीम खानेखाना। अकबर ने बैरम खान की दूसरी बेवा से निकाह भी कर लिया था इसलिए रहीम अकबर के सौतेले बेटे भी कहे जा सकते हैं।
अकबर से विद्रोह करने वाले, उसके द्वारा कैद किये गए और उसके मरते ही सत्ता हथियाने वाले सलीम को अकबर का करीबी क्यों पसंद आता? तो सलीम उर्फ़ जहाँगीर ने दिल्ली की गद्दी मिलते ही पहला काम ये किया था कि अब्दुल रहीम खानेखाना को दरबार से निकाला और उनके दोनों बेटों को खूनी दरवाजे में (जो कि लाल किले के पास ही है) क़त्ल कर डाला और उनके शवों को कई दिनों तक वहां लटकाये रखा। बॉलीवुड फ़िल्में इस तरह से क्रूर सियासतदानों को मासूम आशिक के रूप में दिखाती हैं।
मुगले-आजम और जोधा-अकबर जैसी फ़िल्में समय समय पर आती रहीं और हमारी-आपकी इतिहास की समझ का बेड़ा गर्क करती रहीं। इन फिल्मों की वजह से आज किसी को ये समझाना कि मुग़ल बादशाह कट्टरपंथी इस्लामिक थे, उदारवादी नहीं, काफी मुश्किल होगा। याद करिए हृषिकेष मुखर्जी की बेमिसाल। इस फिल्म में कश्मीर घूमने गये अमिताभ बच्चन से अभिनेत्री राखी कहती हैं "मुगलों की तो बात ही कुछ और है। उनकी हर बात बेमिसाल है।" ये डॉयलॉग इस फिल्म में जिसने लिखा वह कोई सामान्य शख्सियत नहीं था। वो डॉ. राही मासूम रजा थे जिन्हें गंगा जमुनी तहजीब का नायक कहा जाता है।
फिल्मों का ब्राह्मण पाखंडी, लाला धूर्त और ठाकुर बलात्कारी
ऐसा भी नहीं है कि ये कुछ ख़ास, दो-चार फिल्मों में ही हुआ था। ये एक एजेंडा की तरह बरसों चलाया गया। ये एजेंडा कहता था कि लाला धूर्त और गरीबों को लूटने वाला होगा, गाँव का ठाकुर अत्याचारी, बलात्कारी होगा और ब्राह्मण पाखंडी होगा। इनकी तुलना में चर्च का पादरी भला सा होगा और अब्दुल/रहीम वगैरह तो ईमान के पक्के, सबका भला करने वाले होंगे ही। ऐसा कैसे हुआ, ये देखने के लिए "मदर इंडिया" फिल्म भी याद की जा सकती है।
"मदर इंडिया" भी एक ऐसी फिल्म थी जिसमें एक धूर्त लाला की वजह से गाँव का युवक डाकू बन जाता है। इस फिल्म को बनाने वाले महबूब प्रोडक्शन (बाद में महबूब स्टूडियो) का "लोगो" देख लें तो तुरंत ही आपको हंसिया-हथोड़ा वाला कम्युनिस्ट निशान नजर आ जायेगा। इसी स्टूडियो में देवानंद की "गाइड" जैसी फ़िल्में भी बनी थीं। गाइड के कई दृश्यों में ग्रामीणों को ठगते दो ब्राह्मणों और उनके पाखंड का पर्दाफाश करने वाले नायक के दृश्य भी याद होंगे। कैफ़ी आज़मी जैसे नामी-गिरामी गीतकार खुद को वामपंथी घोषित करते थे, शबाना आज़मी उनकी पुत्री और जावेद अख्तर उनके दामाद होते हैं। थोड़ी सी जाँच से ही ऐसे कई तार जोड़े जा सकते हैं।
सत्तर के दशक के बाद बनी फिल्मों पर एक शोध हुआ। इसमें 1960, 1970, 1980, 1990, 2000 और 2010 की पचास फिल्मों पर शोध हुआ और देखा गया कि कैसे पूर्वाग्रह थोपे जाते हैं। इनमें पाया गया कि 62% मामलों में भ्रष्ट व्यापारी वैश्य समुदाय के नाम वाला था। करीब 58% मामलों में भ्रष्ट नेता हिन्दू ब्राह्मण नामधारी, और 74% बार सिक्ख मजाक उड़ाने लायक किरदार में नजर आ रहा था। इसकी तुलना में 84% बार मुस्लिम मजहबी, ईमानदार दर्शाया गया था।
अगर आप ऐसा सोच रहे हैं कि पांच छह दशक पहले कभी उन्नीस सौ साठ सत्तर के दौर में ऐसा होता होगा, अब स्थिति बदल गयी होगी, तो आप गलत सोच रहे हैं। हाल ही में आई क्रिकेट पर आधारित फिल्म '83' में दिखाया गया कि भारतीय सेना के निवेदन पर पाकिस्तानी फौजी सीमा पर गोलीबारी रोक देते हैं। भारतीय सैनिक स्कोर सुन सकें, इसलिए गोलीबारी रोक दी! बहुत खूब! जून 2019 में जब पाकिस्तान ने विश्व कप मैच में भारत को हराया था, उस दिन भी पाकिस्तानी फ़ौज ने गोलीबारी की थी। पाकिस्तान की जीत पर पटाखे तो भारत के कई मुहल्लों में फूटते हैं।
ओटीटी प्लेटफार्म पर भी बॉलीवुड वाली साजिश
जब भारत में ओटीटी प्लेटफार्म की शुरुआत हुई तो इस किस्म के नैरेटिव को चलाने वालों के लिए भी सुविधा बढ़ गयी। कम खर्च में आसानी से नैरेटिव को हर मोबाइल तक पहुँचाया जा सकता था। जनता भी जागरूक होने लगी थी इसलिए इस पर बातचीत भी शुरू हो गई। उदाहरण के तौर पर "घाउल" नाम की एक शृंखला को याद किया जा सकता है।
एक समुदाय विशेष को जबरन सरकारी तंत्र के जरिये निशाना बनाए जाने पर ये शृंखला आधारित थी। वास्तविकता भले उसकी उल्टी है, उस समुदाय विशेष के इलाकों में जाने से पुलिस भारत में ही नहीं, लन्दन में भी कतराती है। ये बात लन्दन की पुलिस "रोट्टरडैम ग्रूमिंग स्कैंडल" में सैकड़ों बच्चियों का यौन शोषण और बलात्कार होने के बाद स्वीकार चुकी है। मगर ओटीटी प्लेटफार्म पर "घाउल" में इसका ठीक उल्टा दिखाया गया।
ऐसा ही आपको "सेक्रेड गेम्स" नाम की शृंखला में भी दिखेगा। इस ओटीटी शृंखला को भी विरोध का सामना करना पड़ा था। हिन्दू धर्माचार्यों को अपराधिक गतिविधियों में संलग्न और एक समुदाय विशेष के अपराधियों को भी ईमानदार दिखाती इस शृंखला में देखने योग्य काफी कुछ था। इसका मुख्य कलाकार ब्राह्मण परिवार में जन्मा एक अपराधी है, जो वीभत्स अपराध करने के बाद अब पूरी मुम्बई को ही समाप्त करने पर तुला है। इसका बाप एक हत्यारा और माँ व्यभिचारिणी होती है। ये स्वयं एक दृश्य में जिस ढाबे में काम करता है, उसका मालिक अपने पास सिर्फ ब्राह्मणों को ही काम पर रखता, बाकियों को बाहर करता दिखता है। ढाबे के मालिक से बदला लेने के लिए ब्राह्मणों के भोजन में ये किरदार मुर्गे के टुकड़े डालता भी नजर आता है।
आज की तारीख में भी ओटीटी पर देखें तो वही वामपंथी सेकुलरिज्म विचारधारा और कट्टरपंथी पूर्वाग्रह हावी दिखाई देते हैं जिन्होंने बॉलीवुड को बर्बाद कर दिया। बॉलीवुड और फिल्म-ओटीटी इत्यादि से जुड़े लोगों में हिन्दू घृणा प्रबल है। अपने पास उपलब्ध संचार माध्यमों से भी वो अपनी इसी नफरत की मार्केटिंग कर रहे होते हैं। जैसे जैसे लोग इनकी मंशा पहचानते जा रहे हैं, वैसे वैसे विरोध बहिष्कार की तरफ बढ़ता जा रहा है।
सोशल मीडिया का प्रभाव जैसे जैसे बढ़ने लगा वैसे वैसे इन बातों की चर्चा भी होने लगी। आज की तारिख में "जेम्स ऑफ़ बॉलीवुड" जैसे ट्विटर हैंडल ऐसे एजेंडा की बखिया भी उधेड़ते रहते हैं। सुधार और बदलावों की जरूरत को फिल्म व टीवी इंडस्ट्री जितनी जल्दी पहचान ले, उनके व्यापार के लिए उतना बेहतर होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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