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लालकिले से तिरंगा फहराने की मृग मरीचिका में फंस गए नीतीश कुमार

बिहार जैसे राज्य के आठवीं बार मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार ने भाजपा छोड़कर जो दांव खेला है, उसका कारण अब काफी कुछ स्पष्ट हो गया है। कल जब उनसे पूछा गया कि वे क्या 2024 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए अपनी सम्भावना देखते हैं, तो उन्होंने हाथ जोड़ लिए। लेकिन फिर पलटकर उन्होंने कहा कि इस बारे में उनके पास कई फोन आये हैं। वे तो बस 2024 में विपक्षी एकता के लिए काम करेंगे। "विपक्षी एकता के लिए काम करने" के उनके इस कथन में दिल्ली की गद्दी के लिए उनकी अतृप्त आकांक्षाओं का अनकहा सच छिपा है।

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वैसे भी राजनीति संभावनाओं का कभी न रुकने वाला खेल हैं। राजनीति की दाल में जब महत्वाकांक्षाओं का छौंक लगता है तब उसका स्वाद और भी रोचक हो जाता है। इसलिए राजनीति में महत्वाकांक्षा रखना एक बड़ा गुण माना जाता है। मगर इसी दाल में यदि अतृप्त आकांक्षाओं के नमक का अनुमान गलत हो जाये तो वह अधिक नमकीन होने के कारण ज़हर की तरह कड़वी भी हो जाती है। फलदायी महत्वाकांक्षा और भ्रम पैदा करने वाली अतृप्त आकांक्षा का सही आंकलन और फिर उसका उचित संतुलन ही राजनीति में किसी को सफल और असफल बनाता है।

2013 में भाजपा के साथ अपना लम्बा गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार की ये चौथी राजनीतिक कलाबाज़ी है। पहले भाजपा, फिर 2015 में लालू यादव के राजद, 2017 में फिर भाजपा और अब फिर लालू की पार्टी और कांग्रेस के साथ जो राजनीतिक शादी रचाई है वह सिर्फ पटना की गद्दी के लिए नहीं हैं। 2014 से ही कई पत्रकार और विश्लेषक उन्हें प्रधानमंत्री पद के सबसे उपयुक्त राजनेता के रूप में प्रस्तुत करते आये हैं। उन्हें इस तरह पेश करने वाले उनके कितने शुभचिंतक है, ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इससे लगता है कि खुद नीतीश के सोये सपनों को पंख लग गए हैं। इसीलिये वे अपनी भरी दावत से उठकर पड़ोस के घर में बारात लेकर पहुँच गए हैं। मगर उनके ये अरमान वास्तविकताओं से बहुत दूर लगते हैं।

विपक्षी एकता का जो परचम वे थामने के लिए निकले हैं उसके बहुत से दावेदार पहले से ही मौजूद हैं। जो विपक्षी राजनीतिक दल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव तक में एक नहीं हो पाए वो 2024 के आम चुनाव में नीतीश के नेतृत्व तले एकजुट हो जायेंगे यह मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा ख्याल ही है।
अगर ऐसा है तो फिर ममता बनर्जी का क्या होगा? चन्द्रशेखर राव क्या करेंगे? कांग्रेस पटना में नीतीश की ताजपोशी में तो बैंड बाजा लेकर गाने गाकर नाच सकती है, लेकिन दिल्ली दरबार के लिए तो पार्टी के एकमात्र युवराज राहुल गाँधी ही हो सकते हैं।

संत कबीर का एक दोहा है:
माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर।
आषा तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।।

इस दोहे का अर्थ है कि मनुष्य का मन बड़ा छलिया होता है। वह आदमी की अतृप्त इच्छाओं और सुप्त कामनाओं को लगातार छेड़ता रहता है। इस दौरान उसकी बुद्धि भी उसके बस में नहीं रहती। माया का ये खेल आदमी से जो न करा दे, सो कम है। विवेकशील लोग इसलिए हमेशा ही इस ठगिनी माया से सतर्क रहते हैं। पर कुर्सियों पर बैठकर, सत्ता के मद में रहते हुए विवेक की रक्षा कर पाना बहुत ही मुश्किल काम हैं । लगता है राजनीति की इस मोहिनी ने एक बार फिर नीतीश कुमार पर अपना जादू चला दिया है।

यानि लालकिले की प्राचीर से झंडा फहराने का मोह एक बार फिर नीतीश कुमार के पाला बदलने के पीछे की बड़ी वजह है। अन्यथा उन जैसा कुशल और चतुर राजनेता और मंझा हुआ खिलाडी इस समय राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस की झोली में जाकर नहीं बैठता। उनकी सरकार ठीकठाक चल रही थी। भाजपा से कोई ऐसा मतभेद भी नहीं था जो दूर न हो सके। उनके नेतृत्व को भी कोई चुनौती नहीं थी। वे मोह के इस जाल में राजनीति के तपते रेगिस्तान में पानी का आभास देती उन वायुतरंगों के फेर में पड़ गए हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है।

नीतीश कुमार ऐसे राजनेता हैं जिनकी हर पक्ष में अब तक इज़्ज़त रही है। पर इस मृग मरीचिका के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि उनकी स्थिति तृष्णा में दोनों गए, "माया मिली न राम जैसी हो जाये"।

यह भी पढ़ेंः इंडिया गेट से: बिहार की राजनीति का राज्यसभा पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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