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राज्यसभा के बाद भी 6 महीने तक CM रह सकते हैं नीतीश कुमार! क्या सांसद-मुख्यमंत्री दोनों संभव? संवैधानिक नियम

Nitish Kumar Rajya Sabha Decision: बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 5 मार्च को राज्यसभा के लिए नामांकन किया। उससे पहले सोशल मीडिया पर नीतीश कुमार ने खुद ऐलान किया कि वह अब राज्यसभा जाना चाहते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि सार्वजनिक जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा रही है कि वे बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ-साथ संसद के भी दोनों सदनों का हिस्सा बनें। इसी इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने इस बार राज्यसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है।

नीतीश कुमार के इस ऐलान के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि बिहार को जल्द ही नया मुख्यमंत्री मिल सकता है। राजनीतिक गलियारों में कई संभावित नामों को लेकर चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। हालांकि संविधान के नियमों के मुताबिक नीतीश कुमार चाहें तो राज्यसभा सदस्य बनने के बाद भी कुछ महीनों तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। आइए जानें पूरा संवैधानिक नियम क्या कहता है।

Nitish Kumar Rajya Sabha Decision

क्या राज्यसभा सांसद रहते हुए CM बने रह सकते हैं? (CM And Rajya Sabha MP Rule)

संविधान के प्रावधानों के मुताबिक मुख्यमंत्री को राज्यपाल नियुक्त करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 (1) में इसका जिक्र है। वहीं अनुच्छेद 164 (4) में यह व्यवस्था दी गई है कि कोई भी व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने अधिकतम 6 महीने तक मुख्यमंत्री पद पर रह सकता है।

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अनुच्छेद 164 (1) क्या कहता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 (1) के अनुसार किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। राज्यपाल ही मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी करते हैं। इस अनुच्छेद में यह भी प्रावधान है कि पूरी मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। यानी सरकार तभी तक बनी रह सकती है, जब तक उसे विधानसभा में बहुमत का समर्थन हासिल हो। इसी कारण मुख्यमंत्री को राज्य सरकार का प्रमुख माना जाता है और वही मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है।

सरल शब्दों में कहें तो मुख्यमंत्री की नियुक्ति औपचारिक रूप से राज्यपाल करते हैं, लेकिन आमतौर पर वही नेता मुख्यमंत्री बनता है जिसके पास विधानसभा में बहुमत का समर्थन होता है।

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अनुच्छेद 164 (4) क्या व्यवस्था देता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164 (4) एक विशेष स्थिति को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्री या मुख्यमंत्री बनता है लेकिन वह उस समय राज्य की विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे अधिकतम 6 महीने के भीतर राज्य की किसी एक विधायिका का सदस्य बनना अनिवार्य होगा।

अगर वह छह महीने के भीतर विधायक (MLA) या विधान परिषद सदस्य (MLC) नहीं बन पाता, तो उसे अपने पद से हटना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने केवल छह महीने तक ही मंत्री या मुख्यमंत्री पद पर रह सकता है।

यह नियम इसलिए रखा गया है ताकि सरकार में शामिल हर मंत्री अंततः जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह रहे।

मुख्यमंत्री पर भी यही नियम लागू होता है

क्योंकि मुख्यमंत्री भी मंत्रिपरिषद का हिस्सा होता है, इसलिए अनुच्छेद 164 (4) का यह नियम उस पर भी लागू होता है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई नेता मुख्यमंत्री बनता है लेकिन उस समय वह विधायक या एमएलसी नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी भी सदन का सदस्य बनना होगा।

इसका मतलब यह है कि अगर नीतीश कुमार विधान परिषद यानी MLC पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा चले जाते हैं, तब भी वे तुरंत मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ते तो भी 6 महीने तक इस पद पर बने रह सकते हैं। लेकिन इस अवधि के बाद उन्हें विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होगा, नहीं तो उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा।

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क्या नीतीश जल्द दे सकते हैं इस्तीफा? (Nitish Kumar Resignation Possibility)

हालांकि संविधान उन्हें 6 महीने की छूट देता है, लेकिन राजनीतिक परंपरा अक्सर अलग राह दिखाती है। आमतौर पर जब कोई मुख्यमंत्री राज्यसभा या लोकसभा की राजनीति में सक्रिय भूमिका लेने का फैसला करता है, तो वह कुछ ही समय में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी दे देता है।

अगर नीतीश कुमार इस्तीफा देते हैं, तो राज्यपाल के पास नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति का अधिकार होता है। इसके लिए आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के विधायक दल की बैठक बुलाई जाती है, जिसमें नए नेता का चुनाव किया जाता है। पार्टी नेतृत्व और आलाकमान की राय के बाद विधायक दल का नेता चुना जाता है और वही मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालता है।

नई सरकार को मेरा पूरा समर्थन रहेगा: नीतीश कुमार (Nitish Kumar Statement)

राज्यसभा चुनाव के फैसले से पहले नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी मंशा स्पष्ट की। उन्होंने लिखा कि संसदीय जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा रही है कि वे बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ-साथ संसद के दोनों सदनों के भी सदस्य बनें।

उन्होंने यह भी कहा कि राज्यसभा में जाने के बाद भी बिहार में बनने वाली नई सरकार को उनका पूरा समर्थन रहेगा। उनके इस बयान से यह संकेत मिला है कि वह राज्य की राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं होने वाले हैं।

तेजस्वी यादव का आरोप, बीजेपी पर साधा निशाना (Tejashwi Yadav Reaction)

नीतीश कुमार के फैसले पर विपक्ष की भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि बिहार में बीजेपी ने महाराष्ट्र मॉडल लागू किया है। उनके मुताबिक भाजपा ने नीतीश कुमार पर इतना दबाव बनाया कि उन्हें पद छोड़ने की नौबत आ गई।

तेजस्वी ने यह भी कहा कि भाजपा अपने सहयोगी दलों को कमजोर करने की रणनीति पर काम करती है और नीतीश कुमार को भी इसी तरह राजनीतिक तौर पर 'हाइजैक' किया गया है।

बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री (Nishant Kumar JDU Entry)

इस पूरे घटनाक्रम के बीच जेडीयू के अंदर एक और बड़ी राजनीतिक हलचल की चर्चा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार 8 मार्च को जनता दल यूनाइटेड में औपचारिक रूप से शामिल हो सकते हैं।

बताया जा रहा है कि पार्टी में उनकी भूमिका को लेकर बाद में फैसला लिया जाएगा। पहले उनकी ज्वाइनिंग आज ही कराई जानी थी और इसके लिए जेडीयू कार्यालय में कार्यकर्ताओं के लिए भोज की भी व्यवस्था की गई थी। लेकिन राज्यसभा नामांकन से जुड़े कार्यक्रम के कारण यह कार्यक्रम टाल दिया गया।

बिहार की राजनीति में नया अध्याय (Bihar Political Transition)

नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का फैसला बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। अगर वह मुख्यमंत्री पद छोड़ते हैं तो राज्य में सत्ता की कमान किसके हाथ में जाएगी, इसे लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं।

आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि नीतीश कुमार राज्यसभा की राजनीति पर पूरा फोकस करते हैं या कुछ समय तक मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभालते रहते हैं। फिलहाल इतना तय है कि उनका यह फैसला बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव की आहट दे रहा है।

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