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इंडिया गेट से: बिहार की राजनीति का राज्यसभा पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

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अब बिहार में सत्ता परिवर्तन के आफ्टर इफेक्ट्स देखने का समय है। बिहार विधानसभा के स्पीकर विजय कुमार सिन्हा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस आ गया है, और विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह इस्तीफा दे दें।

Harivansh

विजय कुमार सिन्हा भाजपा नेतृत्व से सलाह करने दिल्ली आए कि उन्हें अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना चाहिए या सम्मानजनक ढंग से इस्तीफा दे देना चाहिए। भाजपा जदयू समझौते के तहत दोनों सदनों के सभापति का पद भाजपा के पास था।

अब विधान सभा और विधान परिषद दोनों जगह जदयू-आरजेडी के नए गठबंधन का बहुमत है। विधान सभा में नए गठबंधन के 243 में से 164 सदस्य हैं, तो विधान परिषद में 75 में से 45 सदस्य हैं। इस लिए सत्ताधारी नया गठबंधन चाहे तो दोनों सदनों में अविश्वास प्रस्ताव ला कर अध्यक्ष और सभापति को हटा सकता है।

विजय कुमार सिन्हा के खिलाफ तुरंत अविश्वास प्रस्ताव इसलिए लाया गया है, क्योंकि वह अध्यक्ष पद पर रहते हुए भी सदन में मंत्रियों और मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलते रहे हैं। नीतीश कुमार ने एक बार सदन में ही अध्यक्ष के खिलाफ नाराजगी का इजहार किया था।

लेकिन विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण के खिलाफ इस लिए अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया गया है, क्योंकि वह नीतीश कुमार के काफी करीबी माने जाते हैं। उन्हें सलाह दी गई है कि वह इस्तीफा दे दें, तो इसका मतलब है कि वह या तो अंदरखाते जदयू का हिस्सा बन जाएं या हट जाएं। बिहार की राजनीति अब फिर जातीय समीकरणों पर आकर टिक गई है, इस लिए कुछ भी संभव है। हो सकता है कि निष्ठा बदल कर अवधेश नारायण सिंह सभापति बने रहें।

लेकिन सबसे बड़ा संकट राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह के सामने है। वह जदयू कोटे से राज्यसभा के उप सभापति बनाए गए थे, दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह इस्तीफा देंगे या वह अपनी निष्ठा बदल कर भाजपा के हो जाएंगे। दुबारा सभापति बनने के बाद हरिवंश की मोदी सरकार से निकटता बढी है।

पिछले दिनों विपक्ष के हंगामें के बीच जितने भी बिल पास हुए, वे सब उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने पास करवाए, जबकि सभापति वेंकैया नायडू ऐसे मौकों पर हरिवंश को बिठा कर अपने चेम्बर में चले जाते थे।

वेंकैया नायडू से नरेंद्र मोदी की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी था, वरना उपराष्ट्रपति के रूप में उन्हें एक और टर्म मिल सकता था। खासकर कृषि बिलों को पास करवाते समय वेंकैया नायडू की गैरमौजूदगी प्रधानमंत्री को अखरी थी, लेकिन जिस तरह हरिवंश नारायण ने विपक्ष के हंगामें के बीच बिल पास करवाए थे, उस से प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी उन से बेहद खुश थे।

जब विपक्ष ने हरिवंश पर आरोप लगाया था कि उन्होंने विपक्ष की मांग के बावजूद सदन में बिना वोटिंग करवाए बिल पास करवा दिए तो राज्यसभा सचिवालय से सफाई दी गई थी कि किसी सांसद ने वोटिंग की मांग नहीं की थी। तब राज्यसभा टीवी की रिकार्डिंग का एक वीडियो क्लिप लीक हुआ था, जिस में हंगामे के बीच कम्युनिस्ट पार्टी का एक सांसद वोटिंग की मांग करता दिखाई दे रहा था।

संसदीय गलियारों में चर्चा थी कि यह क्लिप सभापति कार्यालय स्टाफ के कर्मचारी ने लीक किया है, जिस से प्रधानमंत्री बेहद खफा हैं। इस घटना से हरिवंश नारायण सिंह की काफी बदनामी हुई थी। विपक्ष उन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का मन भी बना रहा था कि तभी प्रधानमंत्री ने तीनों कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया था।

हरिवंश नारायण सिंह पुराने समाजवादी हैं, बलिया से होने के कारण उन की चन्द्रशेखर से नजदीकी थी। चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने तो वह उन के अतिरिक्त सूचना सलाहाकार थे। उन्हें नीतीश कुमार ने 2014 में राजसभा का सदस्य बनाया था। 2017 में नीतीश कुमार के दुबारा एनडीए में आने के बाद 2018 में एनडीए ने उन्हें राज्यसभा का उपसभापति बनाने के लिए उम्मीदवार बनाया।

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विपक्ष की एकजुटता के बावजूद एनडीए ने विपक्ष के उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को 20 वोटों के अंतर से हरा दिया था। समाजवादी पृष्भूमि के दलों ने हरिवंश नारायण सिंह को वोट दिया था, जिस का जुगाड़ खुद नीतीश कुमार ने किया था। वह 2020 में दुबारा ध्वनि मत से जीत गए थे।

अब हरिवंश अगर जदयू में ही बने रहते हैं, तो उन्हें उपसभापति पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार उन्हें क्या सलाह देते हैं। वैसे भाजपा का उनसे इस्तीफा मांगने या अविश्वास प्रस्ताव लाने का कोई मन नहीं है।

अगर हरिवंश नारायण सिंह इस्तीफा देते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना उप सभापति चुनवाने के लिए राज्यसभा में एक बार फिर शक्ति परीक्षण से गुजरना होगा। क्योंकि विपक्ष भले ही उपराष्ट्रप्ति के चुनाव में कितना ही कमजोर हुआ दिखाई दिया है, अव भाजपा का उपसभापति निर्विरोध नहीं बनने देगा।

भाजपा के भले ही अभी राज्यसभा में सर्वाधिक 91 सदस्य हैं, लेकिन भाजपा तो छोडो, राजग का भी बहुमत नहीं है। हाल ही में राजग से जुडी शिवसेना के तीन में से दो राज्यसभा सांसद किस तरफ जाएंगे यह साफ़ नहीं है। राज्यसभा में अभी आठ स्थान रिक्त हैं, शेष बचे 237 सदस्यों में से बहुमत के लिए 119 सांसदों की जरूरत है।

पांच मनोनीत सदस्यों के अतिरिक्त अन्नाद्रमुक के चार, असम गण परिषद का एक सदस्य भाजपा को समर्थन देगा तो भी यह संख्या 101 बनती है। भाजपा को बीजू जनता दल के 9 और वाईएसआर कांग्रेस के 9 सदस्यों के समर्थन की दरकार रहेगी। भाजपा इन दोनों दलों को उप सभापति का पद देने का रिस्क तो नहीं उठा सकती, इस लिए भाजपा को एक बार फिर इन दोनों दलों के सामने झोली फैलानी पड़ेगी ।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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English summary
bihar new government formation and its effect in rajya sabha
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