अलगाववादी एनजीओ बिरादरी के सहारे कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा
संसार का तो ज्यादा पता नहीं लेकिन भारत में एनजीओ एक प्रेशर ग्रुप के रूप में ही काम करते हैं। इन एनजीओ समूहों की कार्यशैली किसी सामाजिक आंदोलन जैसी नहीं होती। भारत में एनजीओ किसी और से पूंजी प्राप्त करके सामाजिक कार्यों को करने का प्रपंच करते हैं। प्रपंच इसलिए क्योंकि इनका निश्चित उद्देश्य किसी मुद्दे को उठाकर उस पर सफलता प्राप्त करने की बजाय उस मुद्दे पर मिले बजट को खर्च करना होता है। फिर भी इन एनजीओ का तमाम तरह की देशी विदेशी ताकतों द्वारा राजनीतिक व्यवस्था पर प्रेशर ग्रुप के रूप में इस्तेमाल तो किया ही जाता है।

इस एनजीओ बिरादरी ने अपने लिए एक बहुत अच्छा सा शब्द गढा है: सिविल सोसायटी। एनजीओ बनाने और चलानेवाले लोग ये मानते हैं कि वो एक अनसिविलाइज्ड सोसाइटी (असभ्य समाज) में काम कर रहे हैं जिसे उसे सिविलाइज्ड (सभ्य) बनाना है। स्वाभाविक है इस सोच के कारण उनमें एक विशिष्टताबोध भी होता है कि वो लोगों से अलग हैं। भारत की राजनीतिक व्यवस्था जब तक कांग्रेस के हाथों में रही ऐसी सिविल सोसाइटीज खूब फली फूली। इनकी फंण्डिग का स्रोत आमतौर पर विदेशी तत्वों के हाथ में ही रहा जो भारत में अपना कोई न कोई स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे।

एनजीओ का मकड़जाल और कांग्रेस इकोसिस्टम
एक सामान्य व्यक्ति के लिए एनजीओ के मकड़जाल को समझना कठिन ही नहीं नामुमकिन है। असल में यह दुनिया के कॉरपोरेट ढांचे का ही एक हिस्सा है। जैसे अगर कोई एनजीओ वायु प्रदूषण को कम करने के लिए भारत में डीजल वाहन बनाने का विरोध कर रहा है तो वह बैटरी से चलनेवाले वाहनों के समूह से फंडिग प्राप्त कर रहा होता है। इस तरह वह एक तरफ पर्यावरण की चिंता करता हुआ दिखता है तो दूसरी तरफ वह किसी और बिजनेस लॉबी का व्यापार बढाने का उपकरण बनकर काम कर रहा होता है। संसारभर में बाजारों पर कब्जे का जो कॉरपोरेट वॉर चल रहा है, ज्यादातर एनजीओ उस वार में किसी न किसी समूह के लिए पैदल सेना जैसा होता है।
राजनीतिक रूप से इन एनजीओ या सिविल सोसाइटी को संभवत: इसीलिए कभी कोई महत्व नहीं मिलता था। कांग्रेस की सरकारें जरूर इनको अबाध गति से काम करने का मौका देती रहीं और अपने विरोधियों पर हमला करवाती रही, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि कांग्रेस इन सिविल सोसाइटी संगठनों पर निर्भर हो गयी हो। वो कांग्रेस के लिए एक उपकरण होते थे, कांग्रेस विरोधियों पर हमला करने में निरंतर सहयोग के लिए उनकी आर्थिक मदद भी की जाती थी, उनकी बातें भी सुनी जाती थीं, नीतियों में उनके सुझाव भी माने जाते थे किंतु उनको राजनीतिक शक्ति मानने से सदैव परहेज ही किया गया। लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है जब अपने द्वारा पाले पोसे गये करीब डेढ सौ एनजीओ के सहारे कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़ी है। राहुल गांधी की कांग्रेस ने उनको सिविल सोसाइटी से आगे बढकर पोलिटिकल पॉवर के रूप में देखने की गलती कर दी है।
7 सितंबर को तमिलनाडु से शुरु हुई कांग्रेस पार्टी की भारत जोड़ो यात्रा की रुपरेखा बनाने का काम भी एनजीओ बिरादरी से जुड़े लोगों ने ही किया है। इसमें जो प्रमुख नाम हैं उनमें योगेन्द्र यादव, अरुणा रॉय, सैयदा हमीद, पीवी राजगोपाल, बेजवाड़ा विल्सन, जीएन देवी सहित करीब डेढ सौ एनजीओ के प्रमुखों के नाम शामिल हैं। इसमें जो प्रमुख नाम हैं वो पहले भी सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में रह चुके हैं। इसलिए कांग्रेस के लिए ये एनजीओ वाले अपरिचित नहीं है। वो उनके अपने इको सिस्टम का ही हिस्सा हैं। भारत जोड़ो यात्रा शुरु होने के पहले इन सबकी राहुल गांधी के साथ 22 अगस्त को दिल्ली में एक लंबी बैठक भी हो चुकी है।

असफल योगेन्द्र यादव दे रहे सफलता का फार्मूला
इस यात्रा में कांग्रेस नेताओं के अलावा सिविल सोसायटी से जो सबसे चर्चित नाम है वो है योगेन्द्र यादव का। योगेन्द्र यादव इस यात्रा में राहुल गांधी के साथ साथ चल रहे हैं। योगेन्द्र यादव समाजवादी पृष्ठभूमि वाले शिक्षक और एनजीओ वर्कर रहे हैं। लंबे समय तक वो फोर्ड फाउण्डेशन के पैसे पर चलनेवाली संस्था सेन्टर फॉर डेवलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) में काम कर चुके हैं। वहां वो लोकनीति केन्द्र चलाते थे जिसका मुख्य उद्देश्य राजनीति में जातीय विमर्श पैदा करना था। जब केन्द्र में मनमोहन सिंह सरकार को सलाह देने के लिए सोनिया गांधी ने नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनायी तो योगेन्द्र यादव को भी उसका एक सदस्य बनाया। इस काउंसिल में रहकर राइट टू एजूकेशन के तहत शिक्षा जगत में व्यापक 'सुधार' किये जिसे आठ साल के शासन के बाद भी मोदी सरकार ठीक नहीं कर पायी है।
योगेन्द्र यादव का अपना जीवन राजनीति शास्त्र के अध्यापक के रूप में चंडीगढ से शुरु हुआ। वो एनजीओ बिरादरी से जुड़ गये लेकिन देश में टीवी के जरिए उनकी पहचान एक सेफोलॉजिस्ट या चुनाव विश्लेषक की ही बनी। यह उनकी राजनीति में गहरी रुचि का ही मामला था कि जब अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनायी तो वो उसमें शामिल हो गये। हालांकि दोनों का साथ ज्यादा चला नहीं और 2015 में अरविन्द केजरीवाल ने प्रशांत भूषण के साथ योगेन्द्र यादव को भी अपनी पार्टी से बाहर कर दिया। लेकिन योगेन्द्र यादव की राजनीतिक रूचि ऐसी गहरी थी कि उन्होंने स्वराज इंडिया नाम से अपनी पार्टी बनायी और 2019 का हरियाणा चुनाव भी लड़ा। लेकिन जिस राजनीति में चुनावी सफलता के लिए वो टीवी पर बैठकर एक से एक फार्मूला बताते थे उस राजनीति में प्रवेश के बाद उनकी पार्टी का आज तक खाता नहीं खुला।
यह जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि जिस एनजीओ कल्चर वाले फार्मूले से स्वयं योगेन्द्र यादव राजनीति में फल फूल नहीं सके तो फिर उसी एनजीओ बिरादरी के भरोसे वो कांग्रेस के फलने फूलने का आश्वासन कैसे दे रहे हैं? हालांकि स्वयं योगेन्द्र यादव ने भारत जोड़ो यात्रा से ठीक पहले एक लेख लिखकर सबको अपनी बात समझायी है। उस लेख में उन्होंने ये बात समझाने का प्रयास किया है कि भारत के सामाजिक आंदोलन अगर किसी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ जाएं तो क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है। "जन आंदोलनों और राजनीतिक दलों की उर्जा जोड़ने की जरूरत" शीर्षक से लिखे गये इस लेख में योगेन्द्र यादव कहते हैं कि "हाल में ही देश में किसान आंदोलन की ताकत का नमूना देखा है। लेकिन देश में तमाम ऐसे दूसरे आंदोलन भी हैं जो ऐसी ही ताकत रखते हैं।" योगेन्द्र यादव लिखते हैं कि "उन आंदोलनों के पास विचार है, उर्जा है, प्रतिरोध की क्षमता है लेकिन आज की लोकतांत्रिक राजनीति में वो दिल्ली में कोई ताकत खड़ी नहीं कर सकते।"
इसलिए योगेन्द्र यादव ने कांग्रेस के पीछे एक राजनीतिक ताकत के रूप में सिविल सोसायटी को चलने का फार्मूला दिया है। लेकिन आधा सच बोलने से तो बात नहीं बनती भले ही उसे कितने भी विद्वतापूर्ण ढंग से कहा गया हो। पूरा सच ये है कि कांग्रेस के पीछे जो एनजीओ इकट्ठा हुए हैं उनकी अपनी सामाजिक हैसियत कुछ खास नहीं है। दूसरी बात वो कोई आंदोलन नहीं है। तीसरी बात आंदोलन के नाम पर बने संगठन जब राजनीति में उतरते हैं तो उनका क्या हाल होता है यह बात योगेन्द्र स्वयं और संयुक्त किसान मोर्चा को देखकर समझ ही गये होंगे जिसने किसान आंदोलन की सफलता से उत्साहित होकर पंजाब विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतार दिये थे।

एनजीओ बिरादरी और आंदोलन
आंदोलन सामाजिक होते हैं जिनका राजनीतिक प्रभाव तो हो सकता है लेकिन आंदोलन स्वयं राजनीति से दूर ही रहते हैं तो सफल होते हैं। जेपी आंदोलन और अन्ना आंदोलन दो ऐसे राजनीतिक आंदोलन थे जो राजनीतिक सुधार के लिए शुरु किये गये लेकिन इन आंदोलनों से निकलकर जो राजनीति में आये वो स्वयं वही हो गये जिसके विरोध में आंदोलन किया था। इसलिए सामाजिक हो या फिर राजनीतिक आंदोलन, किसी राजनीतिक ताकत के साथ मिलकर शुरु किये जाएं तो भ्रष्ट हो जाते हैं। फिर यहां तो सामाजिक आंदोलन भी नहीं बल्कि एनजीओ बिरादरी को कांग्रेस के पीछे खड़ा करके उन्हें आंदोलनकारी बताया जा रहा है। जबकि एनजीओ बिरादरी का आंदोलनों से दूर दूर का कोई नाता नहीं होता।

राष्ट्रवाद से देशप्रेम को अलग करने का प्रोजेक्ट
असल में योगेन्द्र यादव की पीड़ा भी वही है जो कांग्रेस की है। कुछ साल पहले सेमिनार मैगजीन में लिखे अपने एक लंबे लेख में योगेन्द्र यादव ने नरेन्द्र मोदी के शासन का विकल्प तैयार करने का सुझाव दिया था। इस लेख में ही उन्होंने इस बात का संकेत दे दिया था कि हर मोदी विरोधी को एक राजनीतिक दल के पीछे खड़ा होना होगा तभी मोदी और भाजपा को सत्ता से बाहर किया जा सकता है। भारत जोड़ो यात्रा में आंदोलन के नाम पर एनजीओ बिरादरी की भागीदारी उसी का प्रतिफल है। योगेन्द्र यादव मानते हैं कि मोदी के शासनकाल में "एक अव्यक्त सामाजिक क्षुद्रता ने एक राजनीतिक दुकान खोज ली है।" योगेंद्र यादव के लिए वो सामाजिक क्षुद्र लोग कोई और नहीं बल्कि भाजपा के वोटर और समर्थक हैं जबकि उस दुकान का नाम भाजपा है।
स्वाभाविक है कि सामाजिक क्षुद्रों की दुकानदारी बंद करने और अपनी दुकानदारी दोबारा शुरु करने के लिए योगेन्द्र या उनके जैसे एनजीओ बिरादरी वाले साथी एक बार फिर कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने के बहाने अपनी महत्त्वाकांक्षा पूर्ति के अभियान पर है। इसके पीछे उनका तर्क है कि 'संघ परिवार के राष्ट्रवादी तख्तापलट' के लिए जरूरी है कि हम उन्हीं प्रतीकों का सहारा लें जिन प्रतीकों ने 'कट्टरपंथी संघ' को प्रासंगिक बना दिया है। इसके लिए उनके बहुत सारे सुझावों में एक सुझाव ये भी है राष्ट्रवाद का विकल्प तैयार करने के लिए हमें देश प्रेम को केन्द्र में रखना होगा। इसलिए पहले जैसे कांग्रेस की अगुवाई में हिन्दू और हिन्दुत्व को अलग करने का प्रयास किया गया वैसे ही अब 'राष्ट्रवाद' को 'देशप्रेम' से अलग करने का प्रयास किया जाएगा। कांग्रेस के नेतृत्व में यही अलगाव एनजीओ बिरादरी का हमेशा से प्रोजेक्ट रहा है, यही इस भारत जोड़ो यात्रा का भी उद्देश्य है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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