इंडिया गेट से: ईसाईयों के समर्थन से दक्षिण में पैर जमाने की भाजपाई योजना
दक्षिण में अपने पैर पसारने के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ नया और बड़ा सोच रही है। यह सोच है ईसाईयों को अपने साथ मिलाना। भारत के कुल ईसाईयों में से आधे दक्षिण भारत के पांच राज्यों केरल, कर्नाटक, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रहते हैं। इसके बाद उनकी ज्यादा संख्या पूर्वोतर के राज्यों और झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, गोवा इत्यादि में है।

ईसाईयों को अपने साथ जोड़ने के लिए भाजपा का आरएसएस से भी गहन विचार विमर्श हुआ है। आरएसएस खुद भी इस लाईन पर 2016 से सोच रहा है, जब आरएसएस के नेताओं ने कुछ पादरियों के साथ विचार विमर्श किया था, हालांकि उस बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला था। अगले साल आगरा के चर्च से जुड़े एक ईसाई परिवार ने आरएसएस से खुद संपर्क साधा था। तब से हिन्दुओं और ईसाईयों के बीच की दूरी खत्म करने के लिए चर्च और संघ की बातचीत किसी न किसी रूप में चल रही है।
हिन्दुओं और ईसाईयों के नजदीक आने की संभावनाएं इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि दुनिया भर में इस्लामिक कट्टरवाद से ईसाई भी परेशान होने लगे हैं और भारत में भी उन्हें भविष्य में यह खतरा दिखने लगा है। इसके अलावा हिन्दुओं की तरह ईसाई लडकियाँ भी लव जिहाद का शिकार हो रही हैं।
दक्षिण में ईसाईयों के साथ रणनीतिक गठजोड़ के लिए भाजपा को आरएसएस से हरी झंडी मिल चुकी है। वैसे अभी तक का भारत के ईसाई कांग्रेस का समर्थन करते आये हैं, सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद यह समर्थन एकतरफा हो चुका है। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में 30 प्रतिशत ईसाईयों ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने कांग्रेस को वोट किया। दस प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने भाजपा को वोट किया।
2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को दक्षिण में सबसे कम वोट शेयर मिला। इसी के बाद आरएसएस और भाजपा में विचार विमर्श हुआ कि ईसाईयों को अपने साथ जोड़ने के लिए क्या किया जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 5 करोड़ अल्पसंख्यकों के वोट हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ईसाईयों को अपने साथ लाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। अक्टूबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वेटिकन दौरा और वहां पोप फ्रांसिस के साथ एक घंटे की मुलाक़ात इसी बातचीत को आगे बढाने की दिशा में उठाया गया कदम था।
इसके बाद पिछले साल 22 दिसंबर को दिल्ली में आरएसएस की केन्द्रीय समिति के सदस्य इन्द्रेश कुमार ने दिल्ली में दुनिया के कई देशों के 90 पादरियों के साथ क्रिसमस सेलिब्रेशन किया। जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की पोप से हुई मुलाक़ात को सकारात्मक कदम बताया गया। इसका सीधा असर गोवा विधानसभा चुनावों में दिखा था। जहां भाजपा ने 40 सदस्यों की विधानसभा में 12 ईसाईयों को टिकट दिए, यह उनकी 25 प्रतिशत आबादी से ज्यादा थे, इनमें से चार ईसाई जीते। भाजपा की मौजूदा गोवा सरकार में तीन मंत्री कैथोलिक ईसाई हैं।
गोवा के इस प्रयोग को अगले साल होने वाले तेलंगाना विधानसभा चुनाव में दोहराने की योजना पर विचार चल रहा है। भाजपा ने तेलंगाना के प्रभावशाली ईसाई उद्योगपति के.ए. पाल से संपर्क साधा है। के.ए. पाल वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने तेलंगाना के निर्माण में केसीआर को फंडिंग की थी, लेकिन तेलंगाना आन्दोलन के दौरान ही उनका केसीआर से छतीस का आंकडा हो गया। उन्होंने 2008 में अपनी प्रजा शान्ति पार्टी का गठन कर लिया था, लेकिन उनकी पार्टी कुछ ज्यादा नहीं कर पाई।
ईसाईयों में के.ए. पाल का अच्छा प्रभाव है, लेकिन उनकी छवि विवादास्पद भी है। 2012 में उन्हें हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार भी किया था। उन पर एक महिला को अमेरिका का वीजा दिलाने के लिए पैसे लेने के आरोप में केस भी दायर किया गया था। अगर वह अपनी पार्टी प्रजा शान्ति पार्टी का भाजपा से चुनावी गठबंधन कर लेते हैं, तो इस गठबंधन से दोनों पार्टियों को फायदा होगा।
इसी तरह कर्नाटक में भी ईसाई समुदाय के साथ बातचीत चल रही है। गोवा, तेलंगाना, कर्नाटक के प्रयोग को तमिलनाडु और केरल में भी दोहराया जाएगा। हालांकि आंध्र में यह संभव नहीं होगा, क्योंकि वहां के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी खुद ईसाई हैं, इसलिए फिलहाल वहां भाजपा की दाल नहीं गलेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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