छोटे से उपाय से घट सकता है 30 करोड़ कारों के बराबर उत्सर्जन

नई दिल्ली, 04 अक्टूबर। ग्लोबल अलायंस फॉर इनसिनरेटर ऑल्टरनेटिव्स (GAIA) की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन कम करने में कचरे का निवारण बड़ी भूमिका निभा सकता है. सोमवार को जारी इस रिपोर्ट में कहा गया कि हमारे सामने मुंह बाए खड़े जलवायु परिवर्तनके संकट से निपटने में कचरे से खाद बनाने जैसे मामूली दिखने वाले उपाय भी बहुत काम के हो सकते हैं.
दुनियाभर की सरकारों ने मीथेन उत्सर्जन कम करने का प्रण लिया है. मीथेन को कार्बन डाई ऑक्साइड से भी ज्यादा खतरनाक माना जाता है क्योंकि यह कम समय में कार्बन डाई ऑक्साइड से 80 गुना ज्यादा सौर रेडिएशन सोखती है. मीथेन और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के सबसे बड़े मानवीय स्रोतों में मवेशी और कचरे का निपटारा शामिल हैं.
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के मुताबिक इन गतिविधियों से कुल उत्सर्जन का 30 प्रतिशत हिस्सा आता है. उसके बाद तेल और गैस उद्योगों का नंबर है जो 19 फीसदी ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित करते हैं. कचरे के ढेरों यानी लैंडफिल्स का योगदान 17 प्रतिशत है.
30 करोड़ कारों बराबर उत्सर्जन
जीएआईए की रिपोर्ट कहती है कि खासकर शहरों में कचरे के निपटारे में मामूली बदलाव कर उत्सर्जन में भरी कमी लाई जा सकती है जो सालाना 30 करोड़ कारों द्वारा होने वाले उत्सर्जन के बराबर होगी. इस रिपोर्ट के लेखकों ने 'जीरो वेस्ट' जैसी रणनीतियों का अध्ययन किया. इनमें ऑर्गैनिक, रीसाइकलयोग्य और अन्य कचरे को अलग-अलग करने जैसे तरीके शामिल हैं.
शोधकर्ता कहते हैं कि इन तरीकों से कचरे के निवारण की पूरी व्यवस्था में से मीथेन कम नहीं होगी लेकिन इन नीतियों से मानवीय कारणों से मीथेन के उत्सर्जन में 13 फीसदी की कमी लाई जा सकती है. रिपोर्ट कहती है कि कचरा कम करने ना सिर्फ मीथेन घटेगी बल्कि निर्माण, यातायात और चीजों के उपभोग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी.
जीएआईए के नील टांगरी कहते हैं, "बेहतर कचरा निवारण जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक उपाय है. इसमें तड़क-भड़क वाली या महंगी नई तकनीकों की जरूरत नहीं है. यह सिर्फ अपने उपभोग और उत्पादन पर ज्यादा ध्यान देने और जिस चीज की जरूरत नहीं है उसके निपटारे के बारे में सोचने का मामला है."
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि कचरे का निवारण पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक अहम कदम होगा. उन्होंने दुनिया के आठ शहरों के कचरे के निवारण की व्यवस्था में परिवर्तन के मॉडल बनाकर यह दिखाया कि अगर इन मॉडलों को अपनाया जाए तो ये शहर लगभग कचरे से होने वाले उत्सर्जन को 84 फीसदी तक कम कर सकते हैं.
क्यों अहम है रिपोर्ट?
मीथेन उत्सर्जन धरती के तापमान में हुई वृद्धि के लगभग 30 फीसदी के लिए जिम्मेदार है.यह एक बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में काफी कम समय के लिए वातावरण में रहती है लेकिन इसके असर कहीं ज्यादा हैं. इस वक्त वातावरण में जितनी मीथेन गैस मौजूद है वह आठ लाख साल का सर्वोच्च स्तर है.
पिछले साल ग्लासगो में हुए जलवायु सम्मेलन में सौ से ज्यादा देशों ने 'ग्लोबल मीथेन प्लेज' के तहत इसके उत्सर्जन में कमी करने का प्रण लिया था. इसके तहत 2020 तक मीथेन का उत्सर्जन 30 फीसदी कम करने की प्रतिज्ञा की गई है. लेकिनमीथेन उत्सर्जन करने वाले कई बड़े देशों ने इस प्रतिज्ञा को नकार दिया. इनमें रूस, चीन और ईरान के साथ-साथ भारत भी शामिल है.
जीएआईए की रिपोर्ट के बारे में यूएन एनवॉयर्नमेंट प्रोग्राम के इंटरनेशनल रिसॉर्स पैनल के यानेत्स पोटोच्निक कहते हैं, "यह रिपोर्ट दिखाती है कि जलवायु परिवर्तन संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने में कचरे के निवारण की कितनी अहम भूमिका है. यह रिपोर्ट इस जरूरत को जाहिर करती है कि हमारी उत्पादन और उपभोग की आदतों में बदलाव करके कचरे को जड़ से खत्म करना कितना जरूरी है और इसके लिए उपलब्ध सभी तरीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए."
वीके/एए (रॉयटर्स)
Source: DW
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