जर्मन साहित्य पुरस्कार या टैलेंट हंट शो?

बर्लिन, 27 जून। कोविड महामारी के चलते जर्मन भाषा के साहित्य का महोत्सव पिछले दो साल से ऑनलाइन ही आयोजित हो रहा था, लेकिन इस बार उसकी वापसी एक नए फॉर्मेट में हुई है जिसे टीवी पर लाइव प्रसारित किया गया. इस महोत्सव का सबसे प्रमुख आकर्षण इंगेबोर्ग बाखमान पुरस्कार है और इसी के नाम पर इस समारोह को भी जाना जाता है. इसका आयोजन इस बार ऑस्ट्रिया के शहर क्लागेनफुर्ट में हुआ.
इस साल का जर्मन भाषा साहित्य महोत्सव इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा कि इसमें पहले उन 14 साहित्यकारों को चुना गया जिनके बीच पुरस्कार के लिए प्रतिस्पर्धा होनी थी.
1971 में बगदाद में जन्मी उसामा अल शाहमानी ने सत्ता की आलोचना करने वाला एक नाटक लिखा था जिसके प्रकाशन के बाद साल 2002 में उन्हें इराक से भागकर स्विट्जरलैंड जाना पड़ा. लेखक अलेक्जांड्रू बुलुज 13 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ रोमानिया से जर्मनी पहुंचे. तेहरान में पैदा हुए लेखक बेहजाद करीम खानी भी उस वक्त बच्चे ही थे जब उनके परिवार को ईरान-इराक युद्ध के दौरान भागकर जर्मनी आना पड़ा था. स्लोवेनिया की रहने वाली अना मारवान 25 वर्ष की उम्र में पढ़ाई के लिए वियना आ गई थीं.
जर्मन प्रेस एजेंसी, डीपीए से बातचीत में निर्णायक मंडल की प्रमुख इन्सा विल्के कहती हैं, "सवाल लेखकों की जन्मभूमि का नहीं है बल्कि उनकी साहित्यिक गुणवत्ता मायने रखती है. परिप्रेक्ष्य की विविधता नए साहित्यिक उपकरणों को भी जन्म दे सकती है."
इस प्रतियोगिता में हाल के वर्षों में भी विभिन्न पृष्ठभूमि के लेखकों का बोलबाला रहा है. बर्लिन में रहने वाली ब्रिटिश लेखिका शेरोन डोडुआ ओटू ने साल 2016 का इंगेबोर्ग बाखमान पुरस्कार जीता था जो जर्मन भाषा में लिखी उनकी पहली कहानी के लिए मिला था. पिछले साल यह पुरस्कार तेहरान में जन्मी नावा इब्राहिमी को दिया गया था जिन्होंने अपने लेखन में माइग्रेशन और उससे उत्पन्न पीड़ा की चर्चा की थी.

लेखकों के लिए स्लो-मोशन टैलेंट शो
इस बार इस महोत्सव का फॉर्मेट एक स्लो मोशन जैसा है, यानी आजकल के लोकप्रिय कास्टिंग शो का बौद्धिक संस्करण जैसा. प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के लिए हर लेखक को अपनी रचना के एक हिस्से को कैमरे के सामने 25 मिनट तक पढ़ना था. पढ़ने की इस पूरी प्रक्रिया की मूल रूप में रिकॉर्डिंग की गई जिसमें न तो कोई स्पेशल इफेक्ट था और न ही किसी तरह की नाटकीयता. यानी किसी तरह का कोई संपादन नहीं किया गया था.
प्रकाशकों की परेशानी
तीन दिवसीय इस रीडिंग मैराथन में 14 लेखकों ने हिस्सा लिया. टिक-टॉक जैसे छोटे वीडियोज के दौर में यह प्रतियोगिता बेतुकी भले ही लग रही हो लेकिन अनगिनत बुकस्टाग्रामर्स लोगों का ध्यान खींचने के लिए प्रतिस्पर्धा में लगे हैं. जर्मन भाषी समुदाय में इस आयोजन को लेकर काफी उत्साह है, भले ही टेलीविजन पर उसकी रेटिंग बहुत कमजोर रही हो.
एक अखबार ने आयोजन को कामुक अभिव्यक्ति देने की कोशिश करते हुए बाखमान पुरस्कार को "प्रकाशन जगत के डीलक्स टिंडर" के रूप में पेश किया है.
वास्तव में, कई लेखकों को इस आयोजन में उनकी भागीदारी के बाद अच्छे प्रकाशकों से अनुबंध हासिल करने की उम्मीद रहती है. प्रतियोगिता के बाद कात्जा पेट्रोव्स्काजा और एमीन सेव्गी ओज्दमार जैसे कई लेखकों को उनकी रचनाओं के अंग्रेजी अनुवाद की वजह से अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा हासिल हुई.
और हां, पुरस्कार राशि भी अपने आप में अनूठी है. इस साल इंगेबोर्ग बाखमान पुरस्कार 46वीं बार दिया गया है और इस पुरस्कार की राशि थी 25 हजार यूरो. हालांकि महोत्सव में अलग-अलग श्रेणियों में कुल 62,500 यूरो धनराशि के पुरस्कार दिए गए.
इंगेबोर्ग बाखमान, साहित्य की सुपर स्टार
यह पुरस्कार ऑस्ट्रिया की कवि इंगेबोर्ग बाखमान के नाम पर दिया जाता है. उनका जन्म 1926 में क्लेगेनफर्ट शहर में हुआ था, जहां यह महोत्सव आयोजित होता है.
विश्वयुद्ध के बाद के महान साहित्यकारों में से एक रहीं बाखमान ने महिलाओं के संघर्ष, साम्राज्यवाद और फासीवाद जैसे मुद्दों को अपनी कविता और गद्य के माध्यम से उठाया. उनके निबंध और भाषण भी उतने ही लोकप्रिय हुए जितना कि उनका साहित्य.
1973 में उनकी रहस्यमय मौत भी उनके साथ जुड़े तमाम मिथकों में से एक है. सिगरेट से लगी आग से वो जल गई थीं, उनका इलाज चल रहा था. डॉक्टर समझ नहीं पाए कि वह ड्रग्स की किस कदर आदी हैं. कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत हो गई.

समूह 47 की उभरती रचनाकार
बाखमान अपने समय में उस प्रभावशाली समूह 47 की प्रतिष्ठित लेखिका थीं जिसके सदस्य जर्मन-भाषी साहित्य समारोह के पहले होने वाली अनौपचारिक बैठकों में शामिल होते थे और समारोह की रूपरेखा तय करते थे.
इन बैठकों में प्रतिष्ठित लेखकों को अपनी अप्रकाशित रचनाओं का पाठ करने के लिए आमंत्रित किया जाता था और उसके बाद आलोचकों के बीच इन रचनाओं पर चर्चा होती थी.
इसी समूह में गुंटर ग्रास की रचना 'द टिन ड्रम' पर भी चर्चा हुई थी और ऐसी ही तमाम रचनाओं पर यहां बातचीत होती थी. और देखते ही देखते यह समूह जर्मनी का प्रमुख साहित्यिक संस्थान बन गया.
विशाल निर्णायक मंडल यानी जूरी का सामना
इस समूह के प्रमुख आलोचकों में से एक मार्सेल राइष रानिकी भी थे जो बाद में जर्मनी में 'साहित्य के पोप' के रूप में मशहूर हुए. रानिकी भी इंगेबोर्ग बाखमान पुरस्कार के शुरुआती निर्णायक मंडल के एक सदस्य थे.
उनके भावनात्मक और तीक्ष्ण मूल्यांकन ने जूरी के निर्णयों को और सुदृढ़ बनाया. वो उन लोगों में से एक थे जिन्होंने यह तय किया कि लेखकों को जूरी की आलोचनाओं का जवाब देने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, यहां तक कि अपमानजनक टिप्पणियों को भी चुपचाप सुनना पड़ेगा.
इस व्यवस्था की सबसे पहले शिकार बनीं केरिन स्ट्रक. साल 1977 में राइष रानिकी ने उनकी पांडुलिपि को महोत्सव के उद्घाटन सत्र में ही फाड़ दिया. लेखिका ने रोते हुए टीवी सेट से विदा ली और कहा, "मासिक धर्म की अवस्था में महिलाएं क्या सोचती हैं, क्या महसूस करती हैं- ऐसी बातों में किसे दिलचस्पी है? यह साहित्य नहीं बल्कि अपराध है."
यही वजह है कि इस आयोजन को मीडिया में हर साल आयोजित होने वाले "साहित्यिक सैडोमैसोचिस्ट सीन" के रूप में प्रचारित किया गया, भले ही जूरी सदस्यों ने पुरस्कार देने के लिए कहीं अधिक तथ्यात्मक दृष्टिकोण अपनाया हो.
यह भी पढ़िए: साहित्य का नोबेल
एक सम्मानित संस्था
महोत्सव की शुरुआत ऑस्ट्रिया के राष्ट्रीय पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर, ओआरएफ के लिए एक टेलीविजन कार्यक्रम के तौर पर की गई थी. इसीलिए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज के समय में कार्यक्रम का यह फॉर्मेट आउटेडेट सा लगता है. लेकिन यदि इसमें बहुत ज्यादा संशोधन कर दिया जाता है तो इसकी तीखी आलोचना होनी भी तय है.
साल 2013 में ओआरएफ ने घोषणा की कि बजट की कमी के कारण महोत्सव का आयोजन नहीं किया जाएगा. लेकिन इस घोषणा का काफी विरोध हुआ और कार्यक्रम के तमाम प्रायोजकों के सामने आने के कारण यह स्थगित होने से बच गया.
कई बार कुछ लेखकों ने तो इस आयोजन के दौरान अपनी पांडुलिपियों को पढ़ते समय कुछ ऐसे काम भी किए जिससे कि वो चर्चा में आ जाएं और अखबारों की हेडलाइन उनकी रचना से नहीं बल्कि उनकी ऐसी गतिविधियों से निकल कर आए.
मसलन, साल 1983 में जर्मन लेखक रेनाल्ड गोएत्ज अपनी रचना का पाठ कर रहे थे. इस पांडुलिपि में से "यू कैन हैव माई ब्रेन" पंक्तियों को पढ़ने के बाद उन्होंने अपने सिर को एक धारदार ब्लेड पर पटक दिया और उनके सिर से खून बहने लगा जो कि पांडुलिपि पर फैल गया.
स्विस लेखक उर्स एलेमान ने 1991 में अपनी रचना "बेबीफकर" का पाठ किया जिसे बाल यौन शोषण से जोड़कर देखकर देखा गया. उनकी इस रचना से काफी हंगामा खड़ा हो गया था.
ऑस्ट्रिया के लेखक फिलिप वाइस तो 2009 में अपनी पांडुलिपि ही खा गए थे.
इस तरह के लेखकों ने समारोह में ध्यान खींचने की कोशिश जरूर की और वो इसके इतिहास का हिस्सा भी बने लेकिन ऐसे लेखक कभी भी मुख्य पुरस्कार जीतने में सफल नहीं रहे.
समारोह का इतिहास बताता है कि पुरस्कार वही लेखक जीतते हैं जो बेमतलब की हरकतें नहीं करते हैं और जिनकी रचना दमदार होती है.
46वें जर्मन भाषी साहित्य महोत्सव के लिए रचना पाठ का आयोजन 23 से 25 जून के मध्य किया गया.
रिपोर्ट: एलिजाबेथ ग्रानियर
Source: DW
-
'इंटीमेट सीन के दौरान उसने पार की थीं सारी हदें', Monalisa का बड़ा बयान, सेट पर मचा था ऐसा हड़कंप -
Rakesh Bedi Caste: धुरंधर में पाकिस्तान को उल्लू बनाने वाले 'Jameel' किस जाति से? ठगी का शिकार हुई पत्नी कौन? -
RBSE Topper: रिजल्ट से 10 दिन पहले थम गईं निकिता की सांसें, 12वीं की मार्कशीट में चमकता रह गया 93.88% -
Leander Paes: तीन अभिनेत्रियों संग रहा लिवइन रिलेशन, बिना शादी के बने पिता, घरेलू हिंसा का लगा था आरोप -
Vaibhav Suryavanshi के पास सात समंदर पार से आया ऑफर! टैलेंट पर फिदा हुआ ये देश, कहा- हमारे लिए खेलो -
LPG Price Today: कुकिंग गैस की दरें ऊंचे स्तर पर, आपके शहर में आज कहां पहुंचा रेट? -
Election Report Card: 5 चुनावी राज्यों में बीजेपी का हिसाब-किताब: कहां बन रही सरकार, कहां बिगड़ रहे समीकरण? -
क्रिकेट जगत में शोक की लहर, IPL 2026 के दौरान होटल के कमरे में मिला शव! BCCI की ड्यूटी ने छीन ली जिंदगी? -
Kal Ka Match Kon Jeeta 30 March: कल का मैच कौन जीता- राजस्थान रॉयल्स vs चेन्नई सुपर किंग्स -
Iran Vs America: अकेला पड़ा अमेरिका? 10 सबसे बड़े सहयोगी ने ट्रंप को दिखाया ठेंगा, कहा- जंग में साथ नहीं देंगे -
तलाक के 6 साल बाद कैसे प्रेग्नेंट हो गईं Poonam Pandey? सरेआम दिखा दीं फोटोज, लोग बोले- कौन है बच्चे का पिता? -
कराची में Sonu Nigam की होने वाली थी मौत? लाइव शो के दौरान हुआ था भयावह हादसा, अब वीडियो में दिखा सच












Click it and Unblock the Notifications