अब मलेरिया की दवाइयों से हो सकेगा जीका वायरस का इलाज
अब जीका वायरस का इलाज संभव है, नए शोध के अनुसार मलेरिया की दवाईयों से हो सकता है जीका का इलाज
नई दिल्ली। जीका वायरस पूरी दुनियाभर के देशों के लिए सिर दर्द बन चुका है। इस वायरस का पता लगा पाना ही अपने आप में एक चुनौती जैसा होता है क्योंकि ये संक्रमित गर्भ के माध्यम से भ्रूण को बीमार कर देता है। इस वायरस से नवजात बच्चे के आधे शरीर को लकवा मार जाता है। कई बार तो उसके सिर का आकार बहुत ही छोटा हो जाता है। परन्तु इस बीमारी की समस्या से शायद हम सबको निजात मिलने वाली है।
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अमेरिका की यूनिवर्सिटी ने किया शोध
उल्लेखनीय है कि अमेरिका के सेंट लुइस में स्थित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं के अनुसार, सामान्यतः मलेरिया के लिए उपयोग में लाई जाने वाली दवा 'हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन' (hydroxychloroquine) जीका वायरस को गर्भनाल के माध्यम से भ्रूण तक पहुँचने से रोक देती है, जिससे भ्रूण के मस्तिष्क पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।

क्या है चुनौती
दरअसल, भारत में इस दवा का गर्भवती महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने की मंज़ूरी मिल चुकी है परन्तु इसका इस्तेमाल केवल थोड़े समय के लिए ही किया जा सकता है। आपको बता दें कि गर्भनाल विकसित भ्रूण को रोगग्रस्त जीवों से सुरक्षित रखने के लिये एक अवरोध के रूप में काम करती है पर ज़ीका वायरस में पाए जाने वाले पैथोजन्स को रोक पाना इसके लिए थोड़ा मुश्किल होता है।

यूं काम करेगी यह दवा
ये पैथोजन्स गर्भ कोशिकाओं से भ्रूण तक पहुंचने वाले कुछ जरूरी तत्वों को रोक देते हैं जिसके कारण भ्रूण का पूर्णतया विकास नहीं हो पाता है। इन पैथोजन्स को स्वायत्तजीवी (autophagy) कहा जाता है। गर्भ में जीका संक्रमण से स्वायत्तजीवियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। लिहाजा जब हम किसी दवा का उपयोग करके स्वायत्तजीवियों की संख्या में होने वाली वृद्धि को रोक देते हैं तो ये वायरस भ्रूण को प्रभावित नहीं कर पाता है। गौर करने वाली बात ये है कि यह दवा इन पैथोजन्स को भ्रूण तक पहुँचने से रोक देती है और जीका जैसे ख तरनाक वायरस से लड़ने में कारगर साबित होती है।

दवा के लंबे समय तक प्रयोग के नुकसान का आंकलन
लेकिन चिंता का विषय ये है कि वैज्ञानिक इस बात से अवगत नहीं है कि यदि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन दवा का उपयोग लंबे समय के लिए किया गया तो इससे किस प्रकार के जोखिम हो सकते हैं, इसका भी परीक्षण किया जाना चाहिए, जिससे इसके संबंध में और अधिक जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिल सके। गर्भवती महिलाओं पर इस तरह का प्रयोग करना एक बड़ी चुनौती होगी। अतः इस दिशा में अतिशीघ्र अन्य कदम उठाए की जरूरत है।
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