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'सलमान, दिक़्क़त लड़कियों के कपड़े में नहीं, लड़कों की नज़र में है'

मशहूर अभिनेता सलमान ख़ान ने हाल ही में एक टीवी चैनल के इंटरव्यू में लड़कियों और उनके पहनावे को लेकर अपने विचार ज़ाहिर किए जिसकी ख़ासी चर्चा हो रही है.

सलमान ख़ान
BBC
सलमान ख़ान

बात जब स्त्रियों या लड़कियों के बारे में होती है तो बहुत कुछ छिपाये नहीं छिपता. अक्सर हमारे दिल और दिमाग़ में गहरे बैठी असल बातें बाहर निकल ही आती हैं. कई बार वह ढकने की कोशिश से भी नहीं ढकतीं. कई बार हमें यह भी भ्रम होता है कि हम बहुत अच्छी बातें कर रहे हैं.

पिछले दिनों सलमान ख़ान के साथ भी ऐसा ही हुआ. उन्हें लगा कि वे लड़कियों के हितैषी और मुहाफ़िज़ हैं. सलमान 'भाई जान' हैं. उन्होंने लड़कियों के बारे में अपने ख़्यालात ज़ाहिर किये तो तालियाँ भी बटोर लीं.

मगर क्या वे वाक़ई स्त्री हितैषी हैं? या उन्होंने हितैषी बनने के लिए जो बातें कीं, क्या लड़कियों की ज़िंदगी उससे बेहतर हो जायेगी? यह बात कुछ दिनों पहले शुरू होती है.

सलमान के बारे में पलक ने क्या कहा था

पलक तिवारी बॉलीवुड की नवोदित अभिनेत्री हैं. बतौर अभिनेत्री उनकी पहली फ़िल्म सलमान खान के साथ 'किसी का भाई किसी की जान' है.

एक ख़बर के मुताबिक़, उन्होंने सेट पर सलमान ख़ान के एक नियम के बारे में बताया. नियम लड़कियों के लिए था. सलमान के सेट पर किसी भी लड़की को गले तक का कपड़ा पहन कर आना चाहिए. क्यों? क्योंकि कपड़ा गले से नीचे ढलकेगा तो मर्दों की नज़र जायेगी. यह सलमान को पसंद नहीं है. अच्छी लड़कियों की तरह सभी लड़कियों को पूरी तरह ढका होना चाहिए.

यही नहीं, सलमान ख़ान का विचार है कि लड़कियों की हमेशा हिफ़ाज़त करनी चाहिए. लड़कियों को हमेशा महफ़ूज़ रहना चाहिए. पलक भी सलमान की बातों से सहमत नज़र आती हैं. पलक तिवारी की ये बातें पिछले दिनों काफ़ी चर्चा में रहीं.

'अदालत' में बैठे सलमान ने क्या सफ़ाई दी

हाल ही में न्यूज़ चैनल 'इंडिया टीवी' के रजत शर्मा के कार्यक्रम 'आप की अदालत' में सलमान ख़ान मेहमान थे. उनसे पहला ही सवाल पलक तिवारी की उस बात से जुड़ा था.

रजत शर्मा का कहना था उनकी दोहरी नीति है. वे ख़ुद तो झट से शर्ट उतारते हैं और लड़कियों के लिए कपड़े पहनने के नियम बनाते हैं.

सलमान ने पलक की कही अपनी बातों को ही जायज़ ठहराने की भरपूर कोशिश की. वे जवाब देते हैं, 'मैं सोचता हूँ, ये जो औरतों की बॉडीज़ (बदन) हैं, वह कहीं ज़्यादा प्रीशियस (बेशक़ीमती) हैं. तो वह जितनी ढकी हुई होंगी, मुझे लगता है कि बेटर (अच्छी) होंगी.'

सलमान की इस बात पर हॉल में बैठे लोग तालियाँ बजाते हैं. इस बात पर रज़ामंदी में मुस्कुराने और तालियाँ बजाने वालों में महिलाएँ भी हैं.

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जब बात आगे बढ़ती है तो सलमान कहते हैं, 'यह लड़कियों का चक्कर नहीं है, यह लड़कों का चक्कर है. जिस हिसाब से लड़के लड़कियों को देखते हैं, आपकी बहनें, आपकी बीवियाँ, आपकी मदर्स, वह मुझे अच्छा नहीं लगता है. मैं नहीं चाहता कि वे इन सब हालात से गुज़रें.'

जब उनसे पूछा जाता है कि लड़कों को क्या सिखा रहे हैं. सलमान का जवाब होता है, 'सब जानते हैं, लेकिन कभी-कभी इनकी नीयत ख़राब हो जाती है तो कोशिश है कि हम जब पिक्चर बनायें तो हम उनको ये मौक़ा न दें कि ये आके हमारी हीरोइन को, हमारी औरतों को उस प्रकार से देखें.' तालियाँ फ़िर बजती हैं.

इस कार्यक्रम की शुरुआत में सलमान कहते हैं कि समस्या यह नहीं है कि क्या पूछेंगे. समस्या है कि मैं जवाब क्या दूँगा?

वाक़ई समस्या सलमान के नज़रिये और जवाब में है.

अच्छी लड़की यानी कैसी लड़की

पलक ने सलमान के हवाले से अच्छी लड़की का ज़िक्र किया है. सवाल है, यह अच्छी लड़की कैसी होती है जिनकी बात ये दोनों कर रहे हैं.

इनकी यानी सलमान जैसे मर्दाना लोगों की अच्छी लड़की सिर्फ़ कपड़ों से नहीं बनती है. सिर्फ़ कपड़ों तक ही नहीं रुकी होती. वे कपड़े से शुरू होते हैं और बहुत आगे तक जाते हैं.

इन जैसों के मुताबिक़, अच्छी लड़की यानी जो सबकी बात माने. पिता, भाई, पति के कहने में रहे. पलट कर जवाब न देती हो. अपने मन की कहती हो न करती हो. ज़्यादा और ज़ोर से बोलती न हो. देर शाम बाहर न घूमती हो. पर-पुरुष से मेलजोल न रखती हो. उछलती-कूदती न हो. घर के मर्दों और सभी की ख़ुशी का ख़्याल रखती हो, रीति-रिवाज, परम्परा का पालन करती हो. घर-समाज की 'इज़्ज़त' का ख़्याल रखती हो और उसे बचा कर रखती हो. घर की ठीक-ठाक देखभाल करना आता हो. वग़ैरह… वगैरह…जोड़ते जाइये और एक लम्बी फ़ेहरिस्त अच्छी लड़कियों के गुणों वाली बनाते जाइये.

यह कैसी लड़की सलमान बनाना चाहते हैं? क्या आज की लड़कियाँ ऐसे ही 'अच्छा' बनना चाहती हैं?

हमारे अगल-बगल पलक जैसी लड़कियाँ हैं, जो अच्छी लड़की के सामाजिक खाँचे में ख़ुद को ढालना चाहती हैं. दूसरी ओर, इसके उलट सोचने वाली लड़कियों की तादाद भी कम नहीं है.

आज की लड़कियाँ जो बन रही हैं और जो बनना चाहती हैं, सलमान जैसों की नज़र में 'बुरी लड़की' होंगी. इसीलिए आज लड़कियों का एक बड़ा समूह यह भी कहने से परहेज़ नहीं करता, 'हाँ, हम बुरी लड़कियाँ हैं. हम इन बातों को मानने से इनकार करती हैं.'

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बेशक़ीमती शरीर और चालाकी भरी बातें

पितृसत्ता बहुत चालाकी से काम करती है. सलमान की बातें पहली नज़र में किसी को अच्छी लग सकती हैं. इसमें स्त्रियों की चिंता की गयी है. उनकी हिफ़ाज़त की बात है. इसीलिए उनकी बातों पर लगातार तालियाँ बजती हैं. यानी उनकी बातों का समाज में आधार है. समाज में स्त्रियों के बारे में सोचने वाले वे अकेले नहीं हैं. यानी यह एक मज़बूत विचार है, जो हमारे अंदर तक पैठ बनाये हुए है.

सवाल है, क्या वाक़ई में सलमान को स्त्रियों की ही चिंता है?

क्या स्त्री का शरीर ही बेशक़ीमती है?

पुरुष का शरीर बेशक़ीमती क्यों नहीं है?

स्त्री की ज़िंदगी बेशक़ीमती है या शरीर?

जैसे ही किसी को हम बेशक़ीमती मानते हैं, उसे हिफ़ाज़त से छिपा कर रखने की बात करते हैं. इसीलिए कई लोग स्त्री के शरीर की तुलना बेशक़ीमती सामान भी से करते हैं. कुछ तो मिठाइयों से भी कर देते हैं. स्त्री का शरीर बेशक़ीमती है, इसीलिए स्त्री के शरीर का रिश्ता परिवार और समाज की इज़्ज़त से भी जोड़ दिया जाता है. यानी अगर इस बेशक़ीमती शरीर में कुछ हुआ तो समाज के मुताबिक़ धब्बा लग जाता है.

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महिला
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महिला

चूँकि उसका शरीर ही बेशक़ीमती है और उसी से इज़्ज़त भी जुड़ी है, तो उसकी हिफ़ाज़त ज़रूरी बन जाती है. हिफ़ाज़त का मतलब, स्त्री पर नियंत्रण. स्त्री पर क़ाबू. उसकी हर गति पर क़ाबू और नज़र.

इसलिए सलमान लड़कियों की हिफ़ाज़त और उन्हें महफ़ूज़ रखने की ज़िम्मेदारी ख़ुद पर यानी मर्दाना समाज पर लेते हैं. यह मासूम चिंता से भरी बातें असल में लड़की या स्त्री को ख़ुद के चंगुल में दबाये रखने के सिवा और कुछ नहीं है.

यह है कि हम हैं तो लड़कियाँ सुरक्षित हैं. आओ लड़कियों, हम तुम्हें सुरक्षित रखेंगे! यही नहीं, यह लड़की के आज़ाद हैसियत और व्यक्तित्व से इनकार भी है. यानी लड़की ख़ुद अपना भला-बुरा नहीं सोच सकती. सोचने के लिए उसे सलमान जैसा मर्दाना विचारवान पुरुष चाहिए. वह अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद नहीं कर सकती. उसकी हिफ़ाज़त कोई 'भाई' या कोई 'टाइगर' ही कर सकता है.

कपड़े से होती हिंसा

क्या हिंसा का कोई रिश्ता कपड़े से भी है. सलमान की बातों से तो ऐसा ही लगता है. इसीलिए वे उन कपड़ों के ख़िलाफ़ हैं जो लड़कियों के गले से नीचे आती हैं. क्योंकि इसी के साथ लड़कों की नज़र भी गिरती जाती है.

अगर सलमान की मानें तो महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के लिए ज़िम्मेदार उनके ही कपड़े हैं. यह तर्क, वैसा ही है जैसा लड़कियों के साथ होने वाली यौन हिंसा के बाद हमारा समाज अक्सर देता है. जैसे- लड़कियों के कपड़े चुस्त थे. भड़कीले और भड़काऊ थे. छोटे कपड़े पहन रखे थे.

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महिला
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शरीर दिखाई दे रहा था… मगर हम जानते हैं कि लड़कियों के साथ हिंसा के लिए कपड़े नहीं, मर्द ज़िम्मेदार हैं. लड़कियाँ चाहे जैसा भी कपड़ा क्यों न पहनें, हिंसक मर्द हिंसा के लिए कपड़ा नहीं देखता है.

घर के अंदर होने वाली यौन हिंसा हो या राह चलती लड़कियों के साथ होने वाली हिंसा- वजह कपड़ा नहीं होता.

दूध पीती बच्ची के साथ यौन हिंसा हो या किसी बुजुर्ग के साथ, वजह कपड़ा नहीं होता.

हिंसक मर्द सिर से पैर तक कपड़े में लिपटी किसी भी लड़की या स्त्री को आर-पार देखने की ताक़त रखता है. इसलिए यह समझ ही ग़लत है कि लड़कियों के साथ हिंसा, उनके कपड़ों की वजह से होती है.

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सलमान खान
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सवाल लड़कों का है तो बात लड़कों पर होनी चाहिए

सलमान बहुत ख़ूबसूरती से यह बात मानते हैं कि यह सब जो है, वह लड़कियों का नहीं लड़कों का चक्कर है. लड़कों की नीयत ख़राब हो जाती है. यानी लड़कों की ख़राब नीयत से बचाने के लिए लड़कियों पर क़ाबू रखना ज़रूरी है, ऐसा सलमान की बातें कहती हैं.

हालाँकि, मसला तो लड़कियों का है ही नहीं. मसला है मर्दाना नज़रिये का. लड़कों का. लड़कों की बेअंदाज़ हरकतों का. लड़कों की परवरिश का.

कोई यह क्यों नहीं पूछता कि सलमान, लड़कों की नीयत इतनी कमज़ोर क्यों है, जो बात-बात पर डिग जाती है? जो लड़की देखते ही डिगने लगती है? लड़की की चमड़ी दिखी नहीं कि वह नीयत, बदनीयत होने लगती है? तो दिक़्क़त कहाँ और किसमें है? लड़कियों में या लड़कियों के कपड़े में?

सलमान गंभीर मर्ज़ की ग़लत दवा बता रहे हैं. मर्ज़ की वजह दबंग मर्द या लड़के हैं तो दवा की ज़रूरत मर्दों या लड़कों को है. लड़कियों को नहीं. अगर मर्ज़ की वजह मर्दों की नज़र-नज़रिया है तो बदलने की ज़रूरत उस नज़र-नज़रिये को है, कपड़े को नहीं.

तो बात लड़कों-मर्दों की ही की जानी चाहिए. कितना बेहतर होता अगर सलमान अपने सुपर हीरो की छवि का इस्तेमाल लड़कों को हमदर्द मर्द बनाने में करते.

उन्हें अपनी नज़र और नज़रिया बेहतर करने की वकालत करते. लेकिन दिक़्क़त तो यह भी है कि बात-बात पर कपड़े उतारने वाले सलमान फ़िल्मों में जैसे मर्द की छवि बनाते हैं…वैसे मर्द स्त्री के साथी- दोस्त-हमदर्द नहीं बन सकते. इसलिए नये मर्द की छवि उन्हें भी गढ़नी होगी.

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