क्या वाक़ई नेहरू ने थिमय्या का अपमान किया था?
''अगर मुझे संसद में 15 मिनट बोलने का मौक़ा दे दिया जाए तो प्रधानमंत्री बैठ तक नहीं पाएंगे.''
- राहुल गांधी
''वे 15 मिनट बोलेंगे, ये भी बहुत बड़ी बात है. और मैं बैठ नहीं पाऊंगा, ये सुनकर मुझे याद आता है, क्या सीन है. लेकिन इस चुनाव अभियान के दौरान कर्नाटक में, आपको जो भाषा पसंद हो, उसमें. हिंदी, अंग्रेज़ी या आपकी माता जी की मातृभाषा में आप 15 मिनट, हाथ में कागज़ लिए बिना कर्नाटक की आपकी सरकार की अचीवमेंट, सिद्धियां, 15 मिनट कर्नाटक की जनता के सामने बोल दीजिए.''
- नरेंद्र मोदी
''जब कभी मोदी जी को डर लगता है, वो व्यक्तिगत हमला करते हैं. वो उसके बारे में ख़राब बोलते हैं. ग़लत बोलते हैं. मुझमें और उनमें यही फ़र्क है. वो भारत के प्रधानमंत्री हैं और मैं उन पर व्यक्तिगत हमला नहीं करूंगा.''
- राहुल गांधी
''1948 में पाकिस्तान से युद्ध जीता...जनरल थिमय्याजी के नेतृत्व में. लेकिन उस पराक्रम के बाद कश्मीर को बचाने वाले जनरल थिमय्या का उस समय के प्रधानमंत्री नेहरू और उस समय के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने बार-बार अपमान किया था.''
- नरेंद्र मोदी
ये पिछले दो-चार दिन में कर्नाटक चुनावी अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी दल कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के बयान हैं. लेकिन मोदी के थिमय्या वाले बयान पर अलग से विवाद हो गया है.
मोदी ने कर्नाटक के कलबुर्गी में कहा था, ''और इसी कारण जनरल थिमय्या को अपने पद से सम्मान के ख़ातिर इस्तीफ़ा देना पड़ा था.''
''भारत और चीन की घटना आज भी इतिहास की तारीख़ों में दर्ज है...और उनके साथ फ़ील्ड मार्शल करियप्पा के साथ क्या व्यवहार किया गया.''
''इतना ही नहीं, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद, हमारे वर्तमान सेना नायक...कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता, उन्होंने यहां तक कह दिया कि ये तो गुंडे हैं, गुंडे हैं.''
लेकिन मोदी ज़रा चूक कर गए. और कांग्रेस ने इसे तुरंत लपका. रणदीप सुरजेवाला ने लिखा, ''जनरल थिमय्या 8 मई 1957 में सेना प्रमुख बने थे और 1947 में नहीं, जैसा कि आपने कहा है. वी के कृष्णा मेनन 1947 से 1952 के बीच राजदूत रहे थे न कि रक्षा मंत्री जैसा कि आपने कहा.''
ये सच है कि वी के कृष्णा मेनन साल 1947 से 1952 के बीच लंदन में भारत के राजदूत और 1957 से 1962 के बीच रक्षा मंत्री रहे.
उनके के एस थिमय्या के साथ रिश्ते अच्छे नहीं रहे थे और साल 1959 में थिमय्या ने नेहरू को इस्तीफ़े की पेशकश भी की. हालांकि, नेहरू ने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार करने से मना कर दिया और इसे वापस लेने के लिए मनाया भी.
नेहरू और थिमय्या के रिश्ते
थिमय्या साल 1948 के कश्मीर युद्ध में शामिल रहे क्योंकि उन्हें वेस्टर्न आर्मी कमांडर के एम करियप्पा ने जम्मू कश्मीर का जीओसी नियुक्त किया था.
उन्होंने 1 नवंबर, 1948 को ज़ोजी ल में अपनी अगुवाई में हमला कराया और कबाइली-पाकिस्तानी सैनिकों को भगाने में कामयाबी पाई.
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साल 1953 में नेहरू ने उन्हें कोरिया में युनाइटेड नेशंस के न्यूट्रल नेशंस रिपैट्रिएशन कमिशन में नियुक्त किया, जिसे एक अहम पद माना जाता था.
थिमय्या की वहां काफ़ी तारीफ़ हुई. साल 1954 में लेफ़्टिनेंट जनरल बनने के बाद उन्हें सिविल सर्विस के लिए पद्माभूषण से नवाज़ा गया. उस वक़्त कांग्रेस सत्ता में थी.
साल 1957 में थिमय्या को नेहरू ने ही सेना प्रमुख के रूप में चुना और उनसे सीनियर दो लोगों को नज़रअंदाज़ किया गया. ये लेफ़्टिनेंट जनरल संत सिंह और कुलवंत सिंह थे.
वो साल 1961 तक इस पद पर रहे और 1962 के युद्ध से 15 महीने पहले रिटायर हुए. जुलाई 1964 में उन्होंने साइप्रस में कमांडर ऑफ़ यूएन फ़ोर्स का कमांडर बनाया गया, जहां दिसंबर 1965 में उनका निधन हुआ.
करियप्पा की कहानी
करियप्पा साल 1953 में भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ़ के रूप में रिटायर हुए. साल 1949 में उन्हें नेहरू सरकार ने भारतीय सेना का पहला भारतीय कमांडर-इन-चीफ़ बनाया गया.
रिटायरमेंट के बाद उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया जहां वो 1956 तक रहे. अप्रैल 1986 में उन्हें राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने फ़ील्ड मार्शल पद से नवाज़ा.
पिछले साल कांग्रेसी नेता संदीप दीक्षित ने कहा था, ''पाकिस्तान एक ही चीज़ कर सकता है कि इस तरह के ऊलजुलूल चीज़ें करें, बयानबाज़ी करें. ख़राब तब लगता है जब हमारे आर्मी चीफ़ सड़क के गुंडे की तरह बयान देते हैं. पाकिस्तान को देने हैं तो दें वो तो हैं ही ऐसे.''
बाद में उन्होंने इस बयान के लिए माफ़ी मांगी. और राहुल गांधी ने इसे गलत बताया था. उन्होंने कहा था, ''ये बिलकुल गलत है, आर्मी चीफ़ी के बारे में राजनीतिक लोगों को कमेंट करने की ज़रूरत नहीं है.''
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