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Delimitation: BJP के खिलाफ 'INDIA' के नेता बनना चाह रहे थे स्टालिन, लेकिन बंट गया विपक्ष?

Delimitation India: देश में संभावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक (INDIA) में साफ बंटवारा नजर आ रहा है। दक्षिण भारतीय राज्यों की पार्टियां इस प्रस्ताव का विरोध कर रही हैं, जबकि हिंदी भाषी राज्यों की कुछ पार्टियां इसे लेकर सहमति जताती दिख रही हैं।

खासकर, डीएमके प्रमुख और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन इस मुद्दे पर खुद को विपक्ष का अगुवा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं।

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Delimitation India:दक्षिण राज्यों का कड़ा विरोध

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और पुडुचेरी जैसे दक्षिण के अधिकतर राज्यों की ज्यादातर राजनीतिक दल परिसीमन प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। इस विरोध की कमान डीएमके के स्टालिन ने संभाल रखी है। उनके साथ कांग्रेस की तमिलनाडु इकाई और अन्य सहयोगी दल भी सुर में सुर मिला रहे हैं।

इसे भी पढ़ें- दक्षिणी राज्यों के लिया लोकसभा में 33% प्रतिनिधित्व की मांग, परिसीमन पर क्या बोले सीएम रेवंत रेड्डी?

इन राज्यों को आशंका है कि अगर परिसीमन में जनसंख्या को ही एकमात्र आधार बनाया गया, तो उनकी लोकसभा सीटों की संख्या घट सकती है। इससे दक्षिण की राजनीति पर उत्तर भारत का वर्चस्व बढ़ सकता है।

लेकिन, तेलंगाना प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी का कहना है कि डीएमके इस मुद्दे को तूल देकर भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। उनका दावा है कि परिसीमन पर केंद्र में कोई चर्चा नहीं हुई है और ऐसी कोई भी प्रक्रिया जनगणना के बाद ही शुरू होगी।

Delimitation Commission: उत्तर भारतीय पार्टियों में राय बंटी

विपक्षी गठबंधन INDIA में शामिल कई उत्तर भारतीय पार्टियां इस मुद्दे पर असमंजस में हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन परिसीमन के मौजूदा फॉर्मूले पर सवाल उठा चुके हैं। अखिलेश को आशंका जता रहे हैं कि परिसीमन की आड़ में भाजपा कुछ ऐसा कर सकती है, जिससे राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए वे डीएमके के विरोध को समर्थन दे रहे हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कहना है कि परिसीमन का आधार सिर्फ जनसंख्या नहीं होना चाहिए। वे इसे आदिवासी समुदायों के लिए खतरा बताने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि इससे पहले भी आदिवासी सीटों को घटाने की कोशिश की गई थी,लेकिन भारी विरोध के चलते उसे टालना पड़ा था।

हालांकि, बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) परिसीमन प्रक्रिया के समर्थन में है। राजद के अनुसार, वर्तमान में सांसदों को जरूरत से ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। बक्सर के राजद सांसद सुधाकर सिंह का कहना है कि मौजूदा परिसीमन में एक सांसद 18 से 28 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है, जो अनुचित है।

बिहार में इसी साल कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में आरजेडी ऐसा कोई कदम नहीं बढ़ाना चाहती है, जिससे उसकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

Delimitation Commission of India: विपक्षी एकता की परीक्षा

स्टालिन की अगुवाई में विपक्षी दलों का एक बड़ा धड़ा परिसीमन के खिलाफ एकजुट दिखने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस समेत कई दल इस पर उनके साथ खड़े हैं, लेकिन हिंदी पट्टी के कुछ प्रमुख दलों की सहमति न मिलने से यह कोशिश कमजोर होता दिख रहा है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इस मुद्दे पर स्टालिन बुलाई गई बैठक में शामिल होने से परहेज किया। महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टियां (जैसे शिवसेना-यूबीटी) भी इस मामले में चुप्पी साधे हुए लग रही है। इससे स्पष्ट है कि INDIA गठबंधन इस मुद्दे पर एकराय नहीं है।

Delimitation: भाजपा के लिए संभावित लाभ

परिसीमन का प्रस्ताव भाजपा के लिए राजनीतिक लाभ का अवसर हो सकता है। उत्तर भारत में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने से भाजपा को फायदा हो सकता है, क्योंकि वह इस क्षेत्र में मजबूत स्थिति में है।

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