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'AAP संकट' से जुड़े हर सवाल का जवाब

By Bbc Hindi
अरविंद केजरीवाल
Getty Images
अरविंद केजरीवाल

दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने फिर से हाई कोर्ट का रुख किया है. 'लाभ के पद' के मामले में अयोग्य करार दिए गए अपने 20 विधायकों को बचाने के लिए पार्टी ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक नई याचिका दायर की है. याचिका पर बुधवार यानी 24 जनवरी को सुनवाई होगी.

इन विधायकों को अयोग्य करार देने की चुनाव आयोग की सिफारिश को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मान लिया था. याचिका राष्ट्रपति के फैसले के ख़िलाफ दायर की गई है.

पर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हाई कोर्ट राष्ट्रपति के फैसले के ख़िलाफ़ सुनवाई कर सकता है या उनके फैसले के ख़िलाफ़ याचिका दायर की जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह के मुताबिक, राष्ट्रपति केंद्र सरकार की अनुमति से ही फैसले लेते हैं और यह फैसला लोगों से जुड़ा है, ऐसे में हाई कोर्ट में सुनवाई संभव है.

उन्होंने कहा कि तकनीकी रूप से 20 विधायकों को अयोग्य क़रार देने वाला फैसला राष्ट्रपति का नहीं सरकार का फैसला है, जिसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

आइए जानते हैं इस मामले से जुड़े कुछ और सवालों के जवाब:

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद
Twitter/rashtrapatibhvn/BBC
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली सरकार ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव भी बनाया था. इसे ही 'लाभ का पद' मानते हुए चुनाव आयोग ने सभी विधायकों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश 19 जनवरी को राष्ट्रपति से की. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 21 जनवरी को इसे मंज़ूरी दे दी.

आम आदमी पार्टी ने इस मामले में 19 जनवरी को ही हाई कोर्ट में चुनाव आयोग के इस क़दम को चुनौती दी थी. हालांकि हाई कोर्ट से किसी तरह की अंतरिम राहत नहीं मिली थी.

क्या होता है 'लाभ का पद'?

'लाभ के पद' का मतलब उस पद से है जिस पर रहते हुए कोई व्यक्ति सरकार की ओर से किसी भी तरह की सुविधा लेने का अधिकारी हो. पद के हिसाब से देखें तो संसदीय सचिव को राज्य मंत्री के बराबर समझा जाता है. उनको इसी के हिसाब से सुविधाएं मिलती हैं.

अगर इसके सिद्धांत और इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत ब्रितानी कानून 'एक्ट्स ऑफ़ यूनियन, 1701' में देखी जा सकती है.

इस क़ानून में कहा गया है कि अगर कोई भी व्यक्ति राजा के अधीन किसी पद पर कार्यरत रहते हुए कोई सेवा ले रहा है या पेंशनभोगी है तो वह व्यक्ति हाउस ऑफ़ कामंस का सदस्य नहीं रह सकता.

भारतीय संविधान की बात करें तो संविधान के अनुछेद 191 (1)(ए) के मुताबिक़, अगर कोई विधायक किसी लाभ के पद पर पाया जाता है तो विधानसभा में उसकी सदस्यता अयोग्य क़रार दी जा सकती है.

वहीं, संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (अ) के मुताबिक सांसद या विधायक किसी भी ऐसे पद पर नहीं रह सकते हैं जहां उन्हें वेतन, भत्ते या अन्य दूसरी तरह के फायदे मिलते हों.

विशेषज्ञों के मुताबिक़, संविधान में ये धारा रखने का उद्देश्य विधानसभा को किसी भी तरह के सरकारी दबाव से मुक्त रखना था. क्योंकि अगर लाभ के पदों पर नियुक्त व्यक्ति विधानसभा का भी सदस्य होगा तो इससे प्रभाव डालने की कोशिश हो सकती है.

सोनिया गांधी
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सोनिया गांधी

क्या पहले भी ऐसा हुआ है?

जी हां. पहले भी इस कानून के तहत जन प्रतिनिधियों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी थी. सोनिया गांधी को 'लाभ के पद' के मामले में 2006 में अपनी लोकसभा सदस्यता गंवानी पड़ी थी. उन्हें इस्तीफा देकर रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ना पड़ा था.

सोनिया उस वक्त सांसद होने के साथ-साथ राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष थीं.

इसी साल जया बच्चन को भी लाभ के पद के मामले में राज्यसभा सदस्यता छोड़नी पड़ी थी. वो सांसद होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष थीं.

जया बच्चन सुप्रीम कोर्ट गईं, लेकिन वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली.

21 संसदीय सचिव तो 20 पर कार्रवाई क्यों?

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने कुल 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था. जिसके बाद विवाद शुरू हो गया था. इनमें से एक विधायक जरनैल सिंह ने पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान इस्तीफा दे दिया था

इसके खिलाफ वकील प्रशांत पटेल ने चुनाव आयोग में अर्जी दाखिल की थी. जरनैल सिंह के इस्तीफा देने के बाद 20 विधायकों पर ये कार्रवाई की गई.

संसदीय सचिव क्यों बनाए गए?

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी के अनुसार 2015 में मिली भारी जीत आम आदमी पार्टी के लिए गले का फंदा बन गई है. इतनी बड़ी संख्या में विधायकों को जोड़े रखने के लिए ज़रूरी है कि उन्हें उपयुक्त पुरस्कार भी दिया जाए.

जोशी के मुताबिक, "इसी कोशिश में ही संसदीय सचिव प्रकरण हुआ. सत्ता की राजनीति में 'पुरस्कारों और प्रसादों' का महत्व है. लोग मुफ्त में जनसेवा करने नहीं आते.

पार्टी के सामने अपनों को पुरस्कृत करने की चुनौती है. सलाहकारों जैसी भूमिकाएं इसीलिए बनाई जाती हैं. इस पर बखेड़ा भी खड़ा होता है. दिल्ली में वही हो रहा है."

आम आदमी पार्टी
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आम आदमी पार्टी

दिल्ली अन्य राज्यों से अलग कैसे?

इस पर विवाद शुरू होने के बाद आप सरकार ने एक विधेयक विधानसभा में पारित किया था. इस विधेयक में इन पदों को 'लाभ के पद' से बाहर रखने की बात थी.

लेकिन विधेयक को एलजी ने मंज़ूरी देने से इंकार कर दिया था. दिल्ली सरकार बिना एलजी की मंज़ूरी के क़ानून भी पास नहीं कर सकती है.

चूंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है. हर विधेयक पर एलजी की मंज़ूरी अनिवार्य होती है. अन्य राज्यों में यह मंज़ूरी राज्यपाल देते हैं.

दूसरे राज्यों की क्या है स्थिति?

90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के 49 विधायक हैं, जिनमें से 11 संसदीय सचिव के पद पर कार्यरत हैं. दिल्ली की तर्ज़ पर यहां कार्रवाई हुई तो इनकी संख्या 38 रह जायेगी. इसके उलट कांग्रेस पार्टी के पास अभी 39 सदस्य हैं.

राज्य के 11 संसदीय सचिवों के कामकाज पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पहले ही रोक लगा रखी है.

छत्तीसगढ़ में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त इन संसदीय सचिवों को मंत्रालय में अलग से कमरा, वेतन के 73,000 रुपए के अलावा 11,000 रुपए और मंत्रियों को मिलने वाली अधिकांश सुविधायें मिलती रही हैं.

अरविंद केजरीवाल
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अरविंद केजरीवाल

क्या सरकार को ख़तरा?

70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी ने 2015 में 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी. एक ने पंजाब चुनाव के दौरान इस्तीफा दे दिया था.

किसी ने पार्टी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था तो किसी ने ख़ुद को अलग कर लिया था. अब 20 विधायकों की सदस्यता रद्द हो जाने के बावजूद आम आदमी पार्टी के पास ज़रूरी बहुमत से ज़्यादा विधायक हैं, इसलिए सरकार को फिलहाल ख़तरा नहीं है.

लेकिन अयोग्य क़रार दिए गए 20 विधायकों की सीटों पर आने वाले समय में उपचुनाव हो सकते हैं.

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English summary
Answer to every question related to AAP crisis

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