Mangrove Forests: मैंग्रोव वन क्या होते हैं और जलवायु परिवर्तन में इनका क्या योगदान है?
Mangrove Forests: मिस्र के शर्म-अल-शेख में जलवायु परिवर्तन का कोप-27 सम्मेलन 6 नवंबर से प्रारंभ होकर 18 नंवबर 2022 को संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को लेकर अनेक विषयों पर चर्चा हुई।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने कहा कि हमारी पृथ्वी एक प्रकार की जलवायु अराजकता की ओर बढ़ रही है। उन्होंने चेताया कि मानवता के पास "सहयोग करने या खत्म हो जाने" का विकल्प ही बचा है।
उन्होंने आगे कहा कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए हमारे पास दो विकल्प है - 1. जलवायु सहयोग संधि या 2. सामूहिक आत्महत्या संधि। अर्थात यदि जलवायु सहयोग संधि नहीं होती है तो विनाश तय है।
पिछले 150 वर्षों में पावर प्लांट, जंगलों की कटाई, वाहनों की बढ़ती संख्या और अन्य स्रोतों से होने वाला 'ग्रीनहाउस' गैसों का उत्सर्जन पृथ्वी के तापमान को लगातार बढ़ा रहा है। वर्ष 2016, सबसे गर्म वर्ष रहा।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत सरकार के केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने के लिए मैंग्रोव सबसे अच्छा विकल्प है। ये मैंग्रोव वृक्ष/पेड़ क्या होता है, इसकी क्या विशेषताएं है, यह कैसे पर्यावरण के लिए लाभदायक है, आईए इसके बारे में विस्तार से जानें।
मैंग्रोव वृक्ष
'मैंग्रोव' शब्द का अर्थ होता है - दलदल में उगे पेड़/झाड़ियां। मैंग्रोव ऐसे छोटे वृक्ष/झाड़ी होते हैं जो खारे पानी अथवा अर्ध-खारे पानी में पाए जाते हैं तथा ये समुद्री तटों को स्थिरता प्रदान करते हैं। अर्थात मैंग्रोव नमक-सहिष्णु पेड़ हैं, इन्हें हेलोफाइट्स भी कहते हैं।
इनकी जड़ें अक्सर पानी के नीचे नमकीन तलछट में होती है। ये फूल वाले पेड़ होते है, जो राइजोफोरेसी, लिथ्रेसी, एकेंथेसी, कॉम्ब्रेटेसी और अरेकेसी फेमिली (परिवार) से संबंधित हैं। मैंग्रोव पेड़ों की लगभग 80 प्रजातियां है, जो कम ऑक्सीजन वाली मिट्टी में उगते हैं।
मैंग्रोव की विशेषताएं
मैंग्रोव वृक्ष खारे पानी और कम ऑक्सीजन की स्थिति में भी जीवित रह सकते हैं। मैंग्रोव जड़ प्रणाली वातावरण से ऑक्सीजन को अवशोषित करती है, क्योंकि मैंग्रोव वातावरण की मिट्टी में ऑक्सीजन सीमित या शून्य होती है।
इनकी जड़ें आम पौधों से अलग होती हैं, जिन्हें ब्रीदिंग रूटस अथवा न्यूमेटोफोर्स कहा जाता है। इनकी जड़ों में कई छिद्र होते हैं, जिनके द्वारा ऑक्सीजन भूमिगत ऊतकों में प्रवेश करती है। मैंग्रोव के पेड़ गर्म, कीचड़युक्त, नमकीन आदि उन परिस्थितियों में ही फलते-फूलते हैं, जिसमें दूसरे पौधों जीवित नहीं रह पाते।
मैंग्रोव पेड़ों की एक अन्य विशेषता उनकी श्वसन जड़ें भी हैं, जो सामान्य जड़ों के विपरीत ज़मीन से ऊपर निकल आती हैं। जिनमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इनके माध्यम से ये ऑक्सीजन ग्रहण करके नीचे की जड़ों को पहुंचाती हैं।
मैंग्रोव पौधे की पत्तियों पर एक मोम का लेप होता है जो जल को अपने अंदर अवशोषित रखता है और जल के वाष्पीकरण को कम करता है। इनके बीज मूल पौधे से जुड़े रहते हुए ही अंकुरित होकर पानी में गिर जाते हैं और किसी अन्य स्थान पर पहुंचकर ठोस ज़मीन में अपनी जड़ें जमा लेते हैं।
मैंग्रोव पौधों में सूर्य की तीव्र किरणों तथा पराबैंगनी-बी किरणों से बचाव की क्षमता होती है।
दुनिया में मैंग्रोव वन
पृथ्वी पर मैंग्रोव वन का क्षेत्रफल 1,50,000 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें एशिया में मैंग्रोव की संख्या सबसे ज्यादा है। दक्षिण एशिया के मैंग्रोव वन की दुनिया के मैंग्रोव वन में हिस्सेदारी 6.8 प्रतिशत है और दक्षिण एशिया के मैंग्रोव वन में भारत का योगदान 45.8 प्रतिशत है।
दुनिया में चार मुख्य प्रकार के मैंग्रोव वृक्ष पाए जाते हैं - 1. लाल मैंग्रोव (बहुत अधिक खारे पानी को सहने की क्षमता रखते हैं), 2. काले मैंग्रोव (खारे पानी को सहने की क्षमता कम होती है), 3. सफेद मैंग्रोव (चिकनी सफेद छाल वाले) और 4. बटनवुड मैंग्रोव (झाड़ी आकार वाले)।
भारत में मैंग्रोव वन
● 2019 की भारत वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार भारत में मैंग्रोव वन का क्षेत्रफल 4,975 वर्ग किमी. है, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र (32,87,263 वर्ग किमी) का 0.15 प्रतिशत है। दुनिया के मैंग्रोव वन क्षेत्रफल का 3.31 प्रतिशत है।
● भारत के पश्चिम बंगाल में 42.45 प्रतिशत मैंग्रोव वन सबसे अधिक है। दूसरा नंबर गुजरात (23.66 प्रतिशत) का आता है और उसके पश्चात अंडमान निकोबार द्वीप समूह (12.39 प्रतिशत) है।
● पश्चिम बंगाल में 'सुंदरवन' दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र हैं।
● भारत में दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन भितरकनिका (ओडिशा) में है, जो वैतरनी व ब्राह्मणी दो नदी डेल्टाओं से बना है।
● गंगा, महानदी, गोदावरी कावेरी व कृष्णा नदियों के डेल्टा में भी मैंग्रोव वन हैं।
● मैंग्रोव वन के उच्च घनत्व के मामले में केरल के बैकवाटर का स्थान प्रथम हैं।
मैंग्रोव वृक्ष का महत्त्व
● मैंग्रोव वृक्ष मिट्टी को उपजाऊ बनाने तथा उसकी क्षमता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण हैं।
● मैंग्रोव चक्रवातों के प्रभाव को कम करता है।
● मैंग्रोव वन समुद्री तट को सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये ज्वार, तूफानी लहरों आदि से समुद्री कटाव को कम करते हैं।
● मैंग्रोव, जल शोधन में महत्वपर्णू भूमिका निभाते है। ये अपवाह से पोषक तत्वों को अवशोषित करके पानी की गुणवत्ता में सुधार करते हैं, जिसके हानिकारक शैवाल तटों पर नहीं उग पाते।
● ये समुद्री वातावरण का 10-15 प्रतिशत कार्बन अवशोषित करते हैं, जबकि समुद्री वातावरण में इनकी हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम है।
● ये जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। ये मछलियों, अकशेरूकीय, पक्षियों, स्तनधारियों, वन्यजीवों और पौधों को आश्रय और आवास प्रदान करते हैं।
● स्थानीय निवासियों द्वारा मैंग्रोव वृक्ष का उपयोग भोजन, औषधि, टैनिन, ईंधन तथा इमारती लकड़ी के लिए किया जाता रहा है।
मैंग्रोव वनों के लिए खतरा
● तटीय क्षेत्रों के व्यवसायीकरण (बुनियादी ढाँचे के विकास, शहरीकरण और कृषि भूमि रूपांतरण) से मैंग्रोव वनों का क्षेत्रफल तेजी से कम हो रहा है। पिछले 40 वर्षों में मैंग्रोव वनों का क्षेत्रफल आधे से भी कम रह गया है।
● मैंग्रोव वनों को लगभग 35 प्रतिशत नुकसान झींगा फार्मों के उद्भव से हुआ है।
● मैंग्रोव पौधे को कम समय में 10 डिग्री का उतार-चढ़ाव अत्यधिक खतरनाक अथवा जानलेवा हो सकता है।
● अत्यधिक मानव हस्तक्षेप से मैंग्रोव का विस्तार सीमित हुआ है।
● मैंग्रोव तेल रिसाव से भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं।
मैंग्रोव संरक्षण हेतु प्रयास
● बायोस्फीयर रिजर्व, विश्व धरोहर स्थलों और यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क आदि यूनेस्को नामित साइटें मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन और संरक्षण में सुधार करने के लिए योगदान करती हैं।
● आईएसएमई (इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर मैंग्रोव इकोसिस्टम) की स्थापना वर्ष 1990 में मैंग्रोव के अध्ययन, उनके संरक्षण, तर्कसंगत प्रबंधन और टिकाऊ उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई थी।
● यूनेस्को द्वारा मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उनके स्थायी प्रबंधन और संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य 26 जुलाई को मैंग्रोव दिवस मनाया जाता है।
● आईयूसीएन व यूएनडीपी द्वारा "भविष्य के लिये मैंग्रोव (एमएफएफ)" एक अनूठी पहल विकसित की गई है।
● मैंग्रोव के संरक्षण और विकास हेतु भारत सरकार ने वर्ष 1976 में राष्ट्रीय मैंग्रोव समिति का गठन किया था।
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