GDP Growth Rate: कैसे गणना होती है जीडीपी की, जिसकी वृद्धि दर में भारत आगे
IMF के मुताबिक दुनियाभर में आर्थिक विकास दर में गिरावट के बीच महंगाई चरम पर है। दुनिया की आर्थिक विकास दर साल 2023 में 2.9 प्रतिशत रहेगी।

इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान जताया है कि दुनिया के तमाम देशों में आर्थिक मंदी के खतरे के बीच भारत सबसे अच्छा प्रदर्शन करेगा। इस संबंध में IMF ने दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर ताजा आंकड़े जारी किये हैं। अपने पूर्वानुमान में IMF के अनुसार, आगामी चालू वित्त वर्ष 2023 में भारत 6.1% और 2024 के लिए 6.8% की विकास दर से आर्थिक प्रगति पर रहेगा। IMF के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था 2023 और 2024 में सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। वहीं वैश्विक वृद्धि दर 2023 में 2.9% रहने का अनुमान है। हालांकि, यह 2024 में बढ़कर 3.1% पर पहुंच सकती है।
IMF द्वारा जारी 2023 के विश्व आर्थिक आउटलुक रिपोर्ट के विकास पूर्वानुमान में GDP ग्रोथ रेट अमेरिका (1.4%), जर्मनी (0.1%), फ्रांस (0.7%), इटली (0.6%), स्पेन (1.1%), जापान (1.8%), यूके (-0.6%), कनाडा (1.5%), चीन (5.2%), भारत (6.1%), रूस (0.3%), ब्राजील (1.2%), मैक्सिको (1.7%), नाइजीरिया (3.2%), साउथ अफ्रीका (1.2%), सऊदी अरब (2.6%) में रहने का अनुमान है।
गौर करने वाली बात ये है कि पूरी दुनिया में मुद्रास्फीति (Inflation) का सामना करना पड़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन में कोविड के तेजी से बढ़े मामलों के कारण साल 2022 में मुद्रास्फीति को पुरजोर हवा मिली। IMF ने आशंका जताई है कि साल 2023 में भी ये दोनों वजहें ज्यादा मुद्रास्फीति (महंगाई) की वजह बनी रह सकती हैं। हालांकि, वैश्विक मुद्रास्फीति के 2022 में 8.8% से गिरकर 2023 में 6.6% और 2024 में 4.3% होने की उम्मीद है, जो अभी भी महामारी से पहले (2017-19) के लगभग 3.5% से ऊपर है।
GDP ग्रोथ रेट क्या होती है
IMF के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) किसी एक साल में देश में पैदा होने वाले सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्यांकन को कहते हैं। जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है। ज्यादा जीडीपी का मतलब है कि देश की इकॉनोमी मजबूत हो रही है। अर्थव्यवस्था ज्यादा रोजगार पैदा कर रही है, लोगों का जीवन स्तर समृद्ध हो रहा है। साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि देश में कौनसे क्षेत्र में विकास हो रहा है और कौनसा क्षेत्र आर्थिक तौर पर पिछड़ रहा है। वहीं IMF ने एक उदाहरण के जरिए समझाया है कि यदि जर्मनी के स्वामित्व वाली कोई कंपनी का संयुक्त राज्य अमेरिका में कारखाना है, तो इस कारखाने का जो उत्पादन होगा वो अमेरिका के GDP में शामिल किया जाएगा, लेकिन जर्मनी अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product) में इसे शामिल करेगा।
भारत में Central Statistics Office (CSO) साल में चार बार GDP की समीक्षा करता है, मतलब हर तीन महीने पर इसका आंकलन होता है। इसके बाद हर साल जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े जारी करता है। भारत जैसे मध्यम आमदनी वाले देश के लिए साल दर साल अधिक जीडीपी ग्रोथ हासिल करना जरूरी है ताकि देश की बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
इसका आंकलन होता कैसे है?
फाइनेंसिल एक्सप्रेस के मुताबिक GDP के आंकड़े को आठ सेक्टरों से इकट्ठा किया जाता है। जिसमें कृषि; खनन एवं उत्खनन (माइनिंग व क्वैरीइंग); उत्पादन (प्रोडक्शन); वानिकी (फॉरेस्ट्री) और फिशिंग; बिजली और गैस की आपूर्ति; निर्माण, व्यापार, होटल, परिवहन और संचार; वित्तपोषण, फाइनेंसिंग, रियल एस्टेट और इंश्योरेंस; और बिजनेस सर्विसेज़ और कम्युनिटी, सोशल और सार्वजनिक सेवाएं शामिल हैं। वहीं व्यय (एक्सपेंडिचर) आधारित जीडीपी की गणना के लिए, अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर किये गये सभी खर्च जोड़े जाते हैं जिसमें उपभोक्ता खर्च, सरकारी खर्च, व्यापार निवेश खर्च और शुद्ध निर्यात शामिल हैं।
इसी तरह जीडीपी का आंकलन नॉमिनल और रियल टर्म में होता है। नॉमिनल टर्म्स में यह सभी वस्तुओं और सेवाओं की मौजूदा कीमतों का मूल्यांकन का आंकलन करता हैं। जब किसी चालू वर्ष के संबंध में इसे महंगाई को रिलेट करके एडजस्ट किया जाता है, तो हमें रियल जीडीपी मिलती है और यही रियल जीडीपी को ही आमतौर पर अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के तौर पर मानते हैं।
IMF द्वारा विकास दिखाने से लोगों को क्या होगा फायदा?
अब जिस तरह से IMF ने पूरी दुनिया के देशों का GDP ग्रोथ रेट का पूर्वानुमान लगाया है। इसमें भारत को सबसे मजबूत ग्रोथ रेट वाला देश बताया गया है। आम जनता के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर जीडीपी बढ़ रही है, तो इसका मतलब यह है कि देश आर्थिक गतिविधियों के संदर्भ में अच्छा काम कर रहा है और सरकारी पॉलिसी जमीनी स्तर पर प्रभावी है।
अगर जीडीपी नीचे जा रही है तो इसका मतलब यह है कि सरकार को अपनी नीतियों पर काम करने की जरूरत है ताकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके। सरकार के अलावा कारोबारी, स्टॉक मार्केट इनवेस्टर और अलग-अलग नीति निर्धारक भी जीडीपी डेटा को मानक मानते हैं। जब ग्रोथ रेट सही है तो कारोबारी ज्यादा धन उस देश में निवेश करते हैं और उत्पादन को बढ़ाते हैं जिससे रोजगार व आय के साधन लोगों के लिए खुल जाते हैं। हालांकि, जब जीडीपी कमजोर होती है तो कारोबारी और शेयर इंवेस्टर अपने पैसे बचाने में लग जाते हैं। जिससे महंगाई बढ़ती है। ऐसे में सरकार पर दवाब बढ़ता है, देश की आमदनी कम हो जाती है। अगर जीडीपी मजबूत होती है तो सरकार से इंफ्रास्ट्रक्चर, हॉस्पिटैलिटी, ट्रांसपोटेशन, इजुकेशन समेत कई क्षेत्रों में विकास देखने को मिलता है। जिसका सीधा लाभ आम जनता से होता है।
भारत की इकॉनोमी 3.5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी?
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को केंद्रीय बजट सत्र 2023-24 के पहले दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) पेश किया। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि महामारी से भारत की आर्थिक रिकवरी पूरी हो गई है और आने वाले वित्तीय वर्ष 2023-24 में अर्थव्यवस्था के 6% से 6.8% के दायरे में बढ़ने की उम्मीद है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि आजादी के 75वें वर्ष में भारत पहले ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और मार्च के अंत तक हमारा देश 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले साल 3 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार किया है।
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