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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर गुलाब कोठारी की पुस्तक ‘स्त्री की दिव्यता’ का लोकार्पण

यह कार्यक्रम नई दिल्ली में गुलाब कोठारी की 'स्त्री की दिव्यता' का अनावरण है, जिसमें स्त्री दिव्य ऊर्जा और भारतीय दार्शनिक परंपराओं में महिलाओं की आध्यात्मिक भूमिकाओं का विवरण दिया गया है। इसमें प्रमुख शख्सियतें शामिल हैं जो लिंग विमर्श और समाज और संस्कृति में महिलाओं की अभिन्न भूमिका पर जोर देती हैं, जबकि मातृत्व, ज्ञान और संप्रभुता को जोड़ती हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत द्वारा प्रसिद्ध विचारक, लेखक और राजस्थान पत्रिका के प्रमुख संपादक गुलाब कोठारी की पुस्तक "स्त्री की दिव्यता" का लोकार्पण नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में किया गया। यह पुस्तक नारीत्व की अवधारणा को केवल शारीरिक आयाम तक सीमित न रखकर उसे दिव्य ऊर्जा के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें स्त्री और पुरुष सिद्धांतों के पूरक स्वभाव का विश्लेषण करते हुए भारतीय दार्शनिक परंपराओं में महिलाओं की आध्यात्मिक भूमिका को विस्तार से समझाया गया है।

Divinity of Woman: Kothari Launches Stree Ki Divyata

पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार और विचारक राम बहादुर राय, अध्यक्ष इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा की उपस्थिति में किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के निदेशक युवराज मलिक ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी रचनाओं के प्रकाशन और प्रचार-प्रसार के प्रति न्यास की प्रतिबद्धता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक महिलाओं के जीवन के विभिन्न चरणों और समाज में संस्कारों को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि महिलाएं न केवल व्यक्तिगत जीवन बल्कि समाज और राष्ट्र के मूल्यों तथा दिशा को भी आकार देती हैं। अपने संबोधन में प्रो. कुमुद शर्मा ने नारीत्व और सृजन की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने ‘नारी तू नारायणी’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए बताया कि हिंदू धर्मग्रंथों में महिलाओं को देवी के प्रतीक के माध्यम से समृद्धि, शक्ति और ज्ञान का स्वरूप माना गया है।

उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने हमेशा महिलाओं को परिवार और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया है। राम बहादुर राय ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इस पुस्तक के लोकार्पण के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को बधाई दी। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज को महिला दिवस के गहरे महत्व की याद दिलाते हैं। उन्होंने ‘नारायणी’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए महिलाओं की आध्यात्मिक और संरक्षक शक्ति पर प्रकाश डाला।

गुलाब कोठारी के विचार "माँ ही स्वर्ग है" का उल्लेख करते हुए उन्होंने मातृत्व, ज्ञान और स्त्रीत्व के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया। इस अवसर पर गुलाब कोठारी ने पुस्तक लिखने की प्रेरणा और भारतीय ज्ञान परंपरा से युवाओं को जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अधिकतर पुरुष-केंद्रित दृष्टिकोण से विकसित हुई है, जिसके कारण महिलाओं के विशिष्ट गुणों और सामर्थ्य को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता।

शास्त्रों के संदर्भ देते हुए उन्होंने स्त्री सिद्धांत की आध्यात्मिक और सभ्यतागत समझ को सामने रखा और कहा कि महिलाओं की भूमिका पारंपरिक रूप से देने और सृजन करने से जुड़ी रही है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि समाज में पुरुषों के भीतर का स्त्रीत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, जिससे सहानुभूति और संवेदनशीलता में कमी आ रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराओं में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि महान व्यक्तित्वों के निर्माण में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के मुख्य संपादक एवं संयुक्त निदेशक कुमार विक्रम ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि न्यास के प्रकाशन कार्यक्रम में जेंडर विमर्श को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और वास्तविक जेंडर समानता के लिए पुरुषों को भी अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। वैदिक दर्शन के अध्येता और राजस्थान पत्रिका के प्रमुख संपादक गुलाब कोठारी पिछले चार दशकों से भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता को स्थापित करने के लिए कार्य कर रहे हैं।

उनके लेखन में वेद, उपनिषद और भगवद्गीता के विचारों को समकालीन जीवन से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है। गुलाब कोठारी कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें ‘मानस’, ‘गीता विज्ञान उपनिषद’, ‘वेद विज्ञान उपनिषद’, ‘मैं ही राधा मैं ही कृष्ण’ और ‘ब्रह्म विवर्त’ शामिल हैं। उनकी पुस्तक ‘स्त्री देह से आगे’, जिसे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने 2025 में प्रकाशित किया था, को भी पाठकों और विद्वानों से व्यापक सराहना मिली है।

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