Bihar News: “चईत मासे बोलेले कोयलिया हो रामा, मोर अंगनवा” से गूंजा बिहार म्यूजियम, महिला दिवस पर संगोष्ठी और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित
भारतीय नृत्य कला मंदिर और बिहार ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित एक बिहार संग्रहालय संगोष्ठी में भारतीय संस्कृति, संगीत और नृत्य में महिलाओं के योगदान पर प्रकाश डाला गया, जिसमें नेतृत्व, कलात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक प्रभाव पर ज़ोर दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पटना स्थित बिहार म्यूजियम में कला एवं संस्कृति विभाग के अंतर्गत भारतीय नृत्य कला मंदिर और बिहार ललित कला अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। "चाक्षुष एवं प्रदर्श कला में महिलाओं की भूमिका" विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में कला, संस्कृति और समाज में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम की शुरुआत विभाग के सचिव प्रणव कुमार, प्रशासी पदाधिकारी कहकशां और अन्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस अवसर पर प्रणव कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी राज्य या देश के विकास में महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर वैदिक काल तक महिलाओं ने विदुषी, कवयित्री और विचारक के रूप में समाज को समृद्ध किया है। महिलाओं ने हमेशा संस्कृति और परंपराओं को संजोकर रखने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां नारी का सम्मान होता है, वहीं समृद्धि और उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
संगोष्ठी की शुरुआत प्रसिद्ध लोकगायिका पियु मुखर्जी के व्याख्यान से हुई। उन्होंने "विमेन्स इम्पोर्टेंस एंड इम्पैक्ट ऐज़ द कैरेक्टर इन इंडियन सेमी-क्लासिकल वोकल म्यूजिक" विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने भारतीय संगीत परंपरा में महिलाओं की भूमिका और उनकी भावनात्मक अभिव्यक्ति को गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया।
उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम, विरह और चैता गायन की परंपरा को अपने सुरों में पिरोते हुए "ये मोरा सइयां बुलाए आधी रात, नदिया बैरी भइल" और "चईत मासे बोलेले कोयलिया हो रामा, मोर अंगनवा" जैसे लोकगीत प्रस्तुत किए। उनकी प्रस्तुति ने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया और दर्शकों ने तालियों की गूंज से उनका स्वागत किया। कार्यक्रम में इसके बाद प्रो. जसमिन्दर कौर, डॉ. विंबावती देवी, डॉ. उलूपी कुमारी और संगीता ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने अपने अनुभवों के आधार पर समाज, संस्कृति और कला के विकास में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
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