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एनडीटीवी के हश्र के पीछे ऋण का जाल और पेचीदा शेयरहोल्डिंग

नई दिल्ली, 24 अगस्त। भारत के सबसे अमीर व्यक्ति गौतम अडाणी की कंपनी द्वारा एनडीटीवी के अधिग्रहण की कोशिश के कई तार अभी भी उलझे हुए हैं. कई सवाल हैं जिनके जवाबों का अभी सामने आना बाकी है, लेकिन मामला कंपनियों के पेचीदा शेयरहोल्डिंग पैटर्न बनाने के इर्द गिर्द केंद्रित है. अडाणी समूह ने घोषणा की है कि वो एक सहायक कंपनी के जरिए एनडीटीवी समूह में 29.18 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद रहा है.

debt trap complex shareholding behind adanis takeover bid of ndtv

अडाणी समूह ने यह भी बताया कि वो एनडीटीवी के अतिरिक्त 26 प्रतिशत शेयर खरीदने के लिए एक ओपन ऑफर भी ले कर आएगा. अगर अडाणी का यह ओपन ऑफर सफल हो जाता है तो समूह के पास एनडीटीवी की कुल 55.18 प्रतिशत हिस्सेदारी आ जाएगी और वह एनडीटीवी का सबसे बड़ा शेयरधारक बन जाएगा.

(पढ़ें पत्रकारिता की नई चुनौतियों के बीच रवीश कुमार को मैग्सेसे अवार्ड)

इस समय एनडीटीवी समूह के सबसे बड़े शेयरधारक उसके संस्थापक प्रणय रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और आरआरपीआर नाम की कंपनी हैं. इन तीनों को मिला कर प्रोमोटर और प्रोमोटर समूह कहा जाता है. इनके पास एनडीटीवी की कुल 61.45 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन अडाणी समूह ने आरआरपीआर का भी अधिग्रहण कर लिया है. इसके बाद रॉय दम्पति के पास एनडीटीवी के सिर्फ 32 प्रतिशत शेयर बचे हैं.

कौन था असली खरीदार

एनडीटीवी ने एक बयान में कहा है कि उसे इस अधिग्रहण की कोई जानकारी नहीं थी और यह बिना उसकी सहमति के किया गया है. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि एनडीटीवी या रॉय दम्पति को इसकी जानकारी होने की कोई जरूरत भी नहीं थी. उन्होंने 2009 में आरआरपीआर की तरफ से वीसीपीएल नाम की एक कंपनी से 403.85 करोड़ रुपयों का लोन लिया था और वीसीपीएल को आरआरपीआर के 99.99 प्रतिशत शेयरों पर अधिकार दे दिया था.

अब अडाणी समूह ने वीसीपीएल के जरिए आरआरपीआर का भी अधिग्रहण कर लिया है. सवाल वीसीपीएल पर भी उठ रहे हैं. कई विशेषज्ञों ने दावा किया है कि यह रिलायंस समूह की एक शेल कंपनी थी और रिलायंस और अडाणी समूह इस समय एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं. द वॉयर के संस्थापक एडिटर एमके वेणु ने एक ट्वीट में लिखा कि बड़ा सवाल यही है कि रिलायंस ने अपने प्रतिद्वंदी समूह को एक मीडिया ब्रांड थाली में सजा कर क्यों दे दिया?

(पढ़ें: पत्रकार मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी पर उठ रहे सवाल)

इस पूरे घटनाक्रम का मीडिया की स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ेगा यह सवाल भी उठ रहा है. बीते कुछ सालों में प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के हित की पत्रकारिता करने लगा है. मीडिया के इस हिस्से पर सरकार और उसके नुमाइंदों से कोई सवाल ना पूछने के और सरकार के एजेंडा से जुड़े मुद्दे उठाने के आरोप लगते आए हैं.

मीडिया पर असर

एनडीटीवी के कुछ कार्यक्रमों को छोड़ कर समूह पर व्यापक रूप से इस तरह के आरोप नहीं लगे थे. लेकिन इस अधिग्रहण का एनडीटीवी की पत्रकारिता पर क्या असर पड़ेगा इसे लेकर चिंताएं उभर रही हैं. पत्रकार और एक्टिविस्ट पामेला फिलीपोस ने एक ट्वीट में लिखा कि पत्रकारों के खिलाफ अडाणी के मुकदमों के बारे में सभी जानते हैं और ऐसे में इस अधिग्रहण का मीडिया की स्वतंत्रता पर अनगिनत तरीकों से असर होगा.

गौतम अडाणी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी के तौर पर भी जाना जाता है और केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी पर अडाणी समूह के प्रति पक्षपात के आरोप भी लगते रहते हैं.

Source: DW

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