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कैसे पैसा वापस लाएंगे बाबा रामदेव?

Baba Ramdev
जब कभी किसी आदमी के किसी वजह से कुछ हजार या कुछ लाख प्रशंसक बन जाते हैं तो उसे यह गलतफहमी हो जाती है कि वह देश को चलाने में भी सक्षम है और यदि वह राजनीति में आएगा तो देश की जनता उसे सर-माथे पर बैठाकर देश की बागडोर सौंप देगी।

इस प्रकार की गलतफहमी कई लोगों को हो चुकी है। लेकिन जनता ने उन्हें कबूल नहीं किया। अब योग के सहारे टीवी पर दिखाई देने लगे स्वामी रामदेव को शायद कुछ लोगों ने समझा दिया है कि देश की जनता बहुत बेसब्री से इस बात का इंतजार कर रही है कि कब स्वामी रामदेव राजनीति में पदार्पण करें और उन्हें देश की बागडोर सौंप दें। तभी शायद स्वामी रामदेव यह कहते हैं कि 'अब मेरे पास इतनी शक्ति है कि मैं सरकार को उखाड़ सकता हूं।' स्वामी देव की इस बात से उनका बड़बोलापन ही झलकता है। उन्होंने 'भारत स्वाभिमान ट्रस्ट' का गठन कर लिया है। इस ट्रस्ट की राजनैतिक शाखा 'भारत स्वाभिमान जवान' बनायी है।

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वह 2014 को होने वाले लोकसभा चुनाव में सभी 543 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की योजना पर अमल कर रहे हैं। जब चुनाव लड़ा जाएगा तो जनता को भरमाने के लिए कोई मुद्दा भी चाहिए। स्वामी रामदेव देश की जनता को यह ख्वाब दिखा रहे हैं कि वह स्विस बैंकों में देश का जमा 300 लाख करोड़ रुपया भारत में लाएंगे। देश का पैसा देश में वापस आए यह अच्छी बात है। लेकिन क्या स्विस बैंकों से पैसा वापस लेना इतना ही आसान है, जैसे एटीएम से पैसा निकाल लेना? क्या स्विस बैंकों से भारत सरकार या किसी भी देश की सरकार यह कहेगी कि हमारे भ्रष्ट लोगों का जो पैसा आपके यहां जमा है, उसे वापस कर दो और स्विस बैंक वापस कर देगा?

यदि स्विस बैंकों से पैसा वापस लाना इतना ही आसान होता तो भ्रष्टाचारी लोग अपना पैसा स्विस बैंक में ही क्यों रखते ? स्विस बैंकों से पैसा वापस लाना तो छोड़िए, स्वामी रामदेव यही पता लगा लें कि इन बैंकों भारत के कितने लोगों का और कितना काला पैसा जमा है ? स्वामी रामदेव को देश की जनता को यह तो हर हाल में बताना ही चाहिए कि वह स्विस बैंकों से पैसे को वापस कैसे लाएंगे? ऐसा करने के लिए उनके पास क्या रणनीति है?

स्विस बैंकों से पैसा वापस लाने की बात करने वाले स्वामी रामदेव खुद इंग्लैंड में एक आईलेंड और अमेरिका के ह्‌यूस्टन शहर में लगभग तीन
सौ एकड़ जमीन खरीदते हैं। विदशों में सम्पत्ति खरीदना क्या भारत के पैसे को विदेशों में ले जाना नहीं है? स्वामी रामदेव को देश की जनता को भी बताना चाहिए कि उन्होंने कुछ ही सालों में साठ-सत्तर हजार करोड़ का विशाल सामा्रज्य कैसे खड़ा कर लिया? यदि अतीत की बात करें तो साइकिल पर चलने वाले स्वामी रामदेव हरिद्वार में गुरु शंकर देव के शिष्य थे। उनके वह गुरु आजकल कहां हैं, क्या कर रहे हैं, इसका किसी को पता नहीं है। खुद स्वामी रामदेव भी उनके बारे में कुछ नहीं कहते हैं। कहा जाता है कि लोगों की नजरों से दूर होने से पहले गुरु शंकर देव बहुत ज्यादा व्यथित थे।

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स्वामी रामदेव की बातों से पता चलता है कि उन्होंने वह सब गुर सीख लिए हैं, जो भारत की मौजूदा राजनीति करने के लिए बहुत जरुरी है। मसलन, देश के सबसे बड़े वोट बैंक समझे जाने वाले मुसलमानों पर उन्होंने डोरे डालने शुरु कर दिए हैं। इस बात को वह भी समझते हैं कि बगैर मुसलमानों को साथ लिए देश की सत्ता पर काबिज नहीं हुआ जा सकता है। तभी वो वह देवबंद में होने वाले जमीअत उलेमा हिन्द के अधिवेशन में हिस्सा लेते हैं। वह यह भी जानते हैं कि भारत का मुसलमान आरएसएस से दूरी बना कर चलता है। इसलिए उन्होंने अभी से इस प्रकार की बातें करनी शुरु कर दी हैं, जिससे यह आभास हो कि वे आरएसएस को पसंद नहीं करते हैं। एक पाक्षिक पत्रिका से साक्षात्कार में वे कहते हैं-'भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि भाजपा युवाओं को हिन्दुत्व का विचार नहीं समझा पा रही है। युवा हिन्दुत्व का अर्थ सिर्फ राम मंदिर समझते हैं।' आरएसएस के बारे में वह कहते हैं-'आरएसएस कारसेवकों का हिन्दुत्व के प्रति अपना विचार है लेकिन वे भी आम आदमी को इसका अर्थ नहीं समझा पा रहे हैं।' हालांकि स्वामी रामदेव का हिन्दुत्व कौनसा है, इसको वह नहीं बताते।

राजनीति का सबसे बड़ा गुर भी स्वामी रामदेव ने सीखा है। उन्होंने घोषणा की है कि वह न तो चुनाव लड़ेंगे न ही प्रधानमंत्री का पद लेंगे। वह इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि उनकी पार्टी चुना जीत गयी तो देश की जनता उन्हें जबरदस्ती गद्दी पर बैठा देगी। और स्वामी रामदेव किसी सूरत में देश की जनता का आग्रह नहीं ठुकरा पाएंगे। ऐसा भी नहीं है कि स्वामी रामदेव अकेले ही इतना बड़ा दांव अकेले ही खेलने निकले हैं। दरअसल, योग की वजह से बड़ी-बड़ी हस्तियां उनके साथ नजर आने लगी हैं। शायद इन्हीं हस्तियों ने स्वामी रामदेव को चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया। यह भी हो सकता है कि स्वामी रामदेव को कुछ लोग 'मोहरा' बनाकर अपना हित साधने का खेल, खेल रहे हों।

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