संध्या काल में यौन संबंध बनाने से पैदा होती है दुराचारी संतानें, दिती से पैदा हुए थे हिरण्याक्ष- हिरण्यकशिपु

नई दिल्ली। उत्तम गुणों से युक्त संतान की प्राप्ति करना प्रत्येक दंपती का सपना होता है, लेकिन सही जानकारी नहीं होने से और गलत समय पर यौन संबंध बना लेने से दुष्ट प्रकृति की संतानें पैदा हो जाती हैं। शास्त्रों में सायंकाल के समय यौन संबंध बनाना वर्जित बताया गया है, लेकिन महर्षि कश्यप की पत्नी दिति के कामाग्नि से पीड़ित होने पर सायंकाल के समय बने संबंधों के कारण हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दो भयंकर दैत्य प्रकृति के पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका संहार करने के लिए भगवान विष्णु को नृसिंह अवतार धारण करना पड़ा।

संध्या में यौन संबंध बनाने से पैदा होती है दुराचारी संतानें

आइए जानते हैं पूरी कथा

एक समय की बात है महर्षि कश्यप सायंकाल के समय होम हवन करने के लिए बैठे। उसी समय उनकी पत्नी दिति आई और उन्होंने महर्षि कश्यप से कहा- हे भगवन! मुझे कामाग्नि पीड़ित कर रही है। अत:आप ऋतुदान कर दीजिए। इस पर महर्षि कश्यप ने कहा- देवी! यह संध्याकाल का समय है। यह हवन कार्य और देव पूजा का समय है। तुम थोड़ी देर धैर्य रखो। हवन संपन्न करके मैं तुम्हारे साथ रमण करूंगा। इस समय सहवास करने से देवताओं तथा धर्म की विरोधी दुष्ट संतान पैदा होगी। स्वामी की बात सुनकर दिति हाथ जोड़कर उनके चरणों में गिर पड़ी और लाल नेत्रों वाली होकर बोली- हे मुनि! इसी समय आप मेरी कामाग्नि को शांत नहीं करेंगे तो कामदेव की अग्नि से पीड़ित हुई मैं अपने प्राण त्याग दूंगी। चाहे जैसी भी संतान पैदा हो, किंतु मेरी अभिलाषा आपको अभी पूरी करनी होगी। दिती की ऐसी बात सुनकर महर्षि कश्यप ने उससे सहवास किया और फिर स्नानादि करके अपने हवन करने में रत हुए।

हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए

कालांतर में दिति को महान बलशाली, तीनों लोकों को जीत लेने वाले, देवताओं के विरोधी हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन दोनों ने अनेक वर्षो तक मात्र अपने अंगूठे के बल खड़े रहकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। दोनों की तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव प्रकट हुए तो उन दोनों ने आशीर्वाद मांगा किदेवताओं, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, श्रेष्ठ मनुष्यों, पिशाचों तथा चारण आदि किसी भी योनि के प्राणी के द्वारा हमारी मृत्यु न हो। न शस्त्रों से, न गीले पदार्थ से, न शुष्क पदार्थ से, न किसी जंतु से और न किसी जलचर से। अन्य किसी प्राणी से हमारी मृत्यु न हो। न पृथ्वी में, न आकाश में, न उन दोनों के मध्य, न उषाकाल में हमारी मृत्यु हो। तब शिवजी ने ऐसा ही होगा कहा और अंतध्र्यान हो गए।

भगवान विष्णु का भक्त था प्रहलाद

कालांतर में हिरण्यकशिपु का प्रहलाद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। प्रहलाद के तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु खंभे से नृसिंह के रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का वध किया। कालांतर में प्रहलाद का पुत्र विरोचन हुआ और विरोचन का पुत्र राजा बलि।

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