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शस्त्र पूजा और युद्ध के लिए प्रस्थान का उत्सव है विजयादशमी का त्यौहार

पुरातन काल से जो चार पर्व आज तक मनाए जा रहे हैं विजयादशमी उनमें एक है। रक्षाबंधन, होली और दीपावली के साथ विजया दशमी ऐसा त्योहार है, जिसकी वैदिक या पौराणिक मान्यता है। आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयादशमी कहा जाता है। इसका विशद वर्णन हेमाद्रि, निर्णयसिंधु, पुरुषार्थचिंतामणि, व्रतराज, कालतत्त्वविवेचन एवं धर्मसिंधु आदि ग्रंथों में है।

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दुर्गा पूजा से जुड़ी है विजयादशमी

यह दिन दुर्गा पूजा में स्थापित देवी प्रतिमा के विसर्जन से जुड़ा है। इस नाते यह नवरात्र का अंग है, जो नौ दिनों के अनुष्ठान को संपूर्णता देता है। दशहरा शब्द 'दश' एवं 'अहन्' से बना है। 'अहन्' का तात्पर्य दिन से है। स्पष्ट है कि दशहरा नवरात्र अनुष्ठान का ही एक हिस्सा है।

रामलीला में रावण दहन

नवरात्र में रामलीला के उत्सव प्राय: सभी जगह चलते हैं और यह रामलीला लगभग आश्विन की दशमी को समाप्त होती है। इस दिन रावण एवं उसके साथियों की आकृतियों के पुतले बनाकर जलाए जाते हैं। रामलीला के रावण वध को जोड़कर लोग कहते हैं कि दशहरे के दिन श्रीराम ने रावण को मार डाला। धीरे-धीरे यह बात प्रसिद्ध हो गई और अब प्राय: लोग यही मानते हैं कि दशहरे पर भगवान श्रीराम ने पौलस्त्य रावण का वध किया। पर यह धारणा रामायण द्वारा स्थापित तथ्यों के विपरीत है।

रामायण के साक्ष्य बताते हैं कि विजया दशमी तिथि की महत्ता का विचार कर इस दिन श्रवण नक्षत्र में श्रीराम ने किष्किंधा के प्रवर्षण पर्वत से रावण विजय के लिए प्रस्थान किया। यही कारण है कि कुछ लोगों के मत से विजयादशमी पर श्रीराम और सीता की पूजा करनी चाहिए क्योंकि इसी दिन राम ने लंका की ओर चढ़ाई की थी।

प्राय: चर्चा होती है कि पांच शताब्दियों पहले गोस्वामी तुलसीदास द्वारा 'श्रीरामचरितमानस' की रचना करने के बाद रामलीला का आयेाजन शुरू हुआ। पर यह धारणा भी सही नहीं है। श्रीराम के जीवन चरित के मंचन की पुरानी परंपरा है। सातवीं शती में संस्कृत के महान कवि भवभूति द्वारा लिखा 'उत्तररामचरितम्' तो प्रसिद्ध ही है, जिसका मंचन यात्राओं के दौरान किया जाता था।

उत्तर भारत में आजकल जो रामलीला होती हैं, उनमें बरेली के पंडित राधेश्याम कथावाचक का महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिन्होंने रामलीला को नया आधार ग्रंथ दिया। उनके द्वारा रचित राधेश्याम रामायण का संवाद ही रामलीलाओं में प्रयोग किया जाता है। पारसी थिएटर में हिंदी परंपरा की नींव रखने वाले इस दिग्गज की राधेश्याम रामायण हिंदी पट्टी के एक बड़े इलाके में कई दशकों से लोकप्रिय है।

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दशहरे पर शस्त्र पूजा

विजया दशमी वर्ष की तीन अत्यंत शुभ तिथियों में एक है। अन्य दो हैं, चैत्र शुक्ल एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा यानी संवत्सर का पहला दिन और दीपावली का अगला दिन, जिस दिन गोवर्धन पूजन और अन्नकूट होता है।

पुराने जमाने में इस दिन से श्रवण नक्षत्र का संयोग होने पर राजा महाराजा अपने शत्रुओं पर आक्रमण करते थे। वे इस दिन को विजय पाने के लिए सबसे शुभ मानते थे। इसका परिणाम हुआ कि इस दशमी तिथि से 'विजया' शब्द स्थाई रूप से जुड़ गया और यह तिथि विजया दशमी कहलाने लगी। आज भी भारत में सेना द्वारा विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजा की परंपरा कायम है।

पुराणो में वर्णित विजयादशमी के प्रमुख कृत्य

अपराजिता-पूजन, शमी पूजन, सीमोल्लंघन (अपने ग्राम या राज्य की सीमा को लांघकर घर को पुन: लौट आना) एवं घर की नारियों द्वारा अपने समक्ष दीप घुमाना, नए वस्त्रों और आभूषण धारण करना और क्षत्रिय-राजाओं द्वारा घोड़ों, हाथियों एवं सैनिकों का परिक्रमण करना।

दशहरा या विजयादशमी सभी वर्गों और जातियों के लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण दिन है किंतु राजाओं, सामन्तों एवं क्षत्रियों के लिए यह विशेष रूप से शुभ दिन है। निर्णयसिंधु एवं धर्मसिंधु तथा अन्य निबंधों में शमी (खेजड़ी) के पूजन के विषय में विस्तार पाया जाता हैं। यदि शमी वृक्ष उपलब्ध न हो तो अश्मन्तक वृक्ष की पूजा की जानी चाहिए।

दशहरा पर शमी पूजा भी प्राचीन है। वैदिक यज्ञों के लिए शमी वृक्ष में उगे अश्वत्थ की दो टहनियों (अरणियों) से अग्नि उत्पन्न की जाती थी। अग्नि शक्ति एवं साहस की द्योतक है। शमी की लकड़ी के कुंदे अग्नि-उत्पत्ति में सहायक होते हैं। इस उत्सव का सम्बन्ध नवरात्र से भी है क्योंकि इसमें महिषासुर के विरोध में देवी के साहसपूर्ण कृत्यों का भी उल्लेख होता है और नवरात्र के उपरांत ही यह उत्सव होता है।

पुरातन पर्व है विजया दशमी

भारत में स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व बड़ौदा, मैसूर और जयपुर आदि रियासतों में विजयादशमी के अवसर पर दरबार लगते थे और हौदों से युक्त हाथियों एवं दौड़ते तथा उछल-कूद करते हुए घोड़ों की सवारियां राजधानी की सड़कों पर निकलती थी। शस्त्रधारियों का जुलूस निकाला जाता था।

प्राचीन एवं मध्य काल में घोड़ों, हाथियों, सैनिकों एवं स्वयं का आरती उत्सव राजा लोग करते थे। कालिदास ने रघुवंश (4/24-25) में वर्णन किया है कि जब शरद-ऋतु का आगमन होता था तो अयोध्या के महाराज रघु 'वाजिनीराजना' शांति कृत्य करते थे। वराह ने बृहत्संहिता (अध्याय 44) में अश्वों, हाथियों एवं मानवों के शुद्धियुक्त कृत्य का वर्णन विस्तार से किया है।

निर्णयसिंधु ने सेना के आरती के समय के मंत्रों का उल्लेख किया है। तिथितत्त्व ने विजयादशमी को खंजन पक्षी के देखे जाने के बारे में प्रकाश डाला है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता में भी खंजन पक्षी के दिखाई पड़ने तथा किस दिशा में कब उसका दर्शन हुआ आदि के विषय में घटित होने वाली घटनाओं का उल्लेख है। मनुस्मृति एवं याज्ञवल्क्य स्मृति ने खंजन को उन पक्षियों में परिगणित किया है, जो अभक्ष्य हैं।

दशहरा उत्सव की उत्पत्ति के विषय में कई कल्पनाएं की गई हैं। भारत के कतिपय भागों में नए अन्न की हवि देने, द्वार पर धान की हरि एवं अनपकी बालियों को टांगने तथा गेहूं आदि के अंकुरों को कानों या मस्तक या पगड़ी पर रखने के कृत्य होते हैं।

कुछ लोगों का मत है कि यह कृषि का उत्सव है। कुछ लोगों के मत से यह रणयात्रा का द्योतक है क्योंकि दशहरा के समय वर्षा समाप्त हो जाती है, नदियों की बाढ़ थम जाती है, धान आदि कोष्ठागार में रखे जाने वाले हो जाते हैं। सम्भवत: यह उत्सव इसी दूसरे मत से सम्बन्धित है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी राजाओं के युद्ध-प्रयाण के लिए यही निश्चित ऋतु थी।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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