इंडिया गेट से: गडकरी के बयानों पर चर्चा होती रहेगी
संसदीय बोर्ड से हटाए जाने के बाद नितिन गडकरी का एक वीडियो क्लिप वायरल हुआ, जिसमें वह कह रहे हैं कि अगर उनके पास मंत्री पद नहीं रहता तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जिन्होंने वीडियो क्लिप को वायरल किया उन्होंने प्रश्न किया कि क्या भाजपा संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति से हटाए जाने के बाद नीतिन गडकरी मंत्री पद से इस्तीफा देने का मन बना रहे है? या मोदी-शाह उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर निकालने पर विचार कर रहे हैं?

दोनों प्रश्न राजनीतिक खुराफात का हिस्सा हैं। पहली बात यह है कि नितिन गडकरी ने यह भाषण हाल ही में एक पुस्तक विमोचन समारोह में दिया था, जिसमें वह महाराष्ट्र में मंत्री रहते हुए अपने अनुभव बता रहे थे। इसमें उन्होंने 450 ऐसे गाँवों को सडक से जोड़ने की दास्तान सुनाई थी, जिसकी जंगलात और पर्यावरण विभाग इजाजत नहीं दे रहा था। तब उन्होंने फाईल पर लिख कर दे दिया था कि अगर किसी भी नियम का उलंघन होता है, तो उसके लिए कोई अधिकारी नहीं, बल्कि वह खुद जिम्मेदार होंगे।
बाद में किसी ने हाईकोर्ट में पीआईएल भी लगा दी थी, तब भी उन्होंने अधिकारियों से कहा वे हाईकोर्ट में एफिडेविट दे दें कि इसके लिखित आदेश मंत्री ने दिए थे। इस सन्दर्भ में अधिकारियों से उन्होंने कहा था कि अगर वह मंत्री नहीं भी रहते हैं, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
मूल वीडियो में काट छांट के बाद वीडियो क्लिप वायरल होने से गडकरी को पूरा वीडियो शेयर कर हकीकत बतानी पड़ी। साथ ही उन्होंने मीडिया और विपक्षी दलों के नेताओं को लताड़ लगाते हुए कहा कि कुछ लोगों ने जानबूझकर उनका आधा-अधूरा बयान चलाया। नितिन गडकरी ने ट्वीट किया, "आज एक बार फिर मुख्यधारा की मीडिया, सोशल मीडिया के कुछ वर्ग और विशेष रूप से कुछ लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करके नापाक और मनगढ़त अभियान जारी रखने का प्रयास किया है।"
दूसरी बात यह है कि जब भाजपा संसदीय बोर्ड और केन्द्रीय चुनाव समिति के पुनर्गठन पर मंथन हो रहा था, तो पार्टी महासचिव बी.एल. संतोष ने उन्हें कुछ दिन पहले ही इन दोनों कमेटियों से हटाने की आधिकारिक सूचना दे दे थी। भाजपा में यह परंपरा अभी भी कायम है कि अगर किसी बड़े नेता को किसी समिति से हटाया जाता है, तो संगठन महामंत्री उसे विधिवत सूचना देता है, ताकि उसे मीडिया से पता न चले।
अब सवाल यह है कि क्या नितिन गडकरी अपमानित महसूस कर रहे हैं, तो यह स्वाभाविक है। हालांकि नितिन गडकरी के साथ जो मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है, वह विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध, लेकिन हरफनमौला लीडर हैं। उन्हें पद से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, वह जिस काम में भी हाथ डालेंगे, वहां मिट्टी को सोना बना देंगे। और केंदीय सडक परिवहन मंत्री के नाते उन्होंने यह करके दिखाया है।
अपने पहले कार्यकाल में उनके पास जल परिवहन का मंत्रालय भी था। तब भारत में एक बार फिर से जल परिवहन की शुरुआत हो गई, जिसे अंग्रेजों ने नष्ट कर दिया था। कोलकाता से बनारस तक पानी का जहाज उसी समय चला, लेकिन मोदी के दूसरे कार्यकाल में जब उनके पास जल परिवहन का विभाग नहीं है, तो इस विभाग में काम आगे बढने की कोई खबर नहीं आ रही।
सवाल यह है कि क्या वह क्षुब्ध हैं, तो यह भी स्वाभाविक है। याद करिए जब राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष रहते हुए नरेंद्र मोदी को पार्टी संसदीय बोर्ड से हटाया था तो कितना बवाल मचा था। नितिन गडकरी के क्षुब्ध होने की एक और ठोस वजह यह भी हो सकती है कि अब तक पार्टी के पूर्व अध्यक्षों को संसदीय बोर्ड में रखने की परंपरा रही थी। इसलिए गडकरी की छुट्टी के बाद अब अगला नंबर राजनाथ सिंह का हो सकता है, क्योंकि परंपरा तो टूट ही गई है। हालांकि जरूरी नहीं है कि ऐसा हो ही, क्योंकि वह सरकार में अभी भी नंबर दो बने हुए हैं।
अनुतरित सवाल यह है कि नितिन गडकरी को संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से हटाए जाने की क्या वजहें हो सकती हैं। क्या इसकी वजह उनकी बढती हुई लोकप्रियता और उनका सर्वस्वीकार्य होना है? मोदी केबिनेट के वह एकमात्र मंत्री हैं, जिसकी तारीफ़ विरोधी भी करते हैं, यहाँ तक कि एक बार सोनिया गांधी ने भी उनकी तारीफ़ की थी। वह स्पष्टवादी हैं, और जो कहते हैं, वह करते हैं। इस कारण उनकी लोकप्रियता बढती जा रही है।
लेकिन राजनीति में एक नेता की लोकप्रियता किसी दूसरे नेता के लिए खतरे की घंटी होती है। नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़ते हुए कहा कि ज्यादा न सही तो भी 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की 40-50 सीटें घटेंगी ही। इसके बाद से कई विश्लेषकों का अनुमान है कि 2024 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में नितिन गडकरी सर्वमान्य नेता हो सकते हैं। लेकिन यह केवल एक कल्पना है। अभी भाजपा के पास 300 लोकसभा सीटें हैं। 40-50 सीटें कम होने पर भी 250 सीटें बचती हैं। उसके बाद 25-30 सांसदों का समर्थन जुटाना मोदी व शाह की जोड़ी के लिए मुश्किल नहीं होगा।
फिलहाल गडकरी न इस दौड़ में शामिल हैं, न उनकी कोई महत्वाकांक्षा है। वह जिस जिम्मेदारी पर होते हैं, उसके इतर न सोचते हैं, न काम नहीं करते हैं। उन की स्पष्टवादिता का एक उदाहरण यह है कि उन्होंने एक भाषण में यह कह दिया था कि उद्योगपति पार्टी के लिए चंदा ले कर खड़े रहते हैं, इसलिए उनके काम करने पड़ते हैं, लेकिन वह पार्टी अध्यक्ष नहीं हैं, तो उन पर दबाव नहीं है।
फिर अपने एक अन्य भाषण में गडकरी ने भाजपा को सत्ता तक पहुँचाने में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के योगदान का जिक्र करके उन दोनों की तारीफ़ की थी। कुछ सप्ताह पहले उन्होंने नागपुर में भाषण में यह कह दिया था कि वह कभी कभी राजनीति छोड़ने पर विचार करते हैं। तब उन्होंने कहा था कि राजनीति के अलावा भी जीवन में करने को बहुत कुछ है। उस समय मीडिया में इसका अर्थ यह निकाला गया था कि वह मोदी शाह की राजनीति से खुश नहीं हैं। लेकिन क्या यह बात उन्होंने बी.एल. संतोष का फोन आने के बाद कही थी? क्योंकि उनके इस भाषण के तीन हफ्ते बाद ही संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन हो गया।
माना यह भी जाता है कि भाजपा की सर्वोच्च कमेटियों का गठन करते समय संघ से सलाह मशविरा किया गया होगा। संघ से मशविरे का मतलब है नए सरकार्यवाह दतात्रेय होसबोले से मशविरा। भाजपा संघ का समन्वय सरकार्यवाह स्तर पर ही होता है, सरसंघचालक उसमें दखल नहीं देते। नितिन गडकरी राष्ट्रीय स्वय सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी के नजदीक माने जाते हैं।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही गडकरी के भाषणों पर बारीकी से चीरफाड़ होती रही है। इसी शनिवार को उन्होंने नागपुर में अपने भाषण में जो बाते कहीं हैं, उनके भी वैसे ही अर्थ निकाले जा रहे हैं, जैसे उनके अन्य भाषणों के निकाले जा रहे हैं। उद्योगपतियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की आत्मकथा में लिखा यह वाक्य दोहराया कि कोई भी इंसान तब खत्म नहीं होता, जब वह हार जाता है, बल्कि वह तब खत्म होता है, जब मैदान छोड़ देता है।
यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि यह वाक्य उन्होंने सिर्फ उद्योगपतियों के लिए नहीं कहा, राजनीति करने वालों के लिए भी कहा है, जिनके लिए सबसे बड़ी ताकत लोगों के बीच अच्छे रिश्ते बनाना होता है। इसलिए किसी को इस्तेमाल करो और फैंक देने वाली सोच नहीं होनी चाहिए। चाहे किसी के अच्छे दिन हो या बुरे दिन, अगर आप एक बार किसी का हाथ थामते हैं तो फिर जीवन भर उस का हाथ मत छोडिए। सिर्फ उगते हुए सूरज को सलाम मत करिए। उनकी यह बात उनके पुराने उद्योगपति साथियों को भी संदेश है और भारतीय जनता पार्टी में उनके साथ नजदीकी बनाए रखने वालों को भी संदेश है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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