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भारत और इस्लाम: शुरुआती दौर में भारत की सेनाओं से अरबों में घबराहट

632 ईसवी में पैगम्बर मुहम्मद के निधन के बाद इस्लाम में खिलाफत का दौर शुरू हो गया था। पहले चार खलीफा - अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली जोकि पैगम्बर के सहयोगी भी रह चुके थे, उन्होंने दुनिया भर के साम्राज्यों और सभ्यताओं को कब्जाने के उद्देश्य से अरबी सेनाएं भेजने का क्रम स्थापित किया। इन चारों खलीफाओं के दौर (632 से 661 ईसवी तक) को रशीदुन खिलाफत के नाम से जाना जाता है। इनकी सेनाओं ने इस कालखंड में सीरिया, फिलिस्तीन, इजिप्ट और पर्शिया जैसे साम्राज्यों को जीत लिया लेकिन भारत ही एक ऐसी सभ्यता थी, जहाँ उन्होंने अपने युद्धक अभियान तो भेजे लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी।

Islam

गौर करने वाली बात यह है कि खलीफा अबू बक्र के समय (632 से 634 तक) भारत पर कोई हमला नहीं किया गया। हालाँकि, अरबों के समुद्री जहाज भारतीय बंदरगाहों पर व्यापारिक उद्देश्य के लिए आते थे। वे भरूच और ठाणे से होते हुए दक्षिण में कन्याकुमारी और सीलोन (वर्तमान श्रीलंका) तक जाते थे।

अबू बक्र के बाद खिलाफत सँभालने की जिम्मेदारी उमर को मिली। वह 634 में खलीफा बना लेकिन 644 में स्थानीय विद्रोह के चलते उसकी हत्या कर दी गयी। इन दस वर्षों के कालखंड में उमर को कई बार इस बात का एहसास हुआ कि अरबों को अपने युद्धक अभियानों को जारी रखने के लिए पैसा और बंदरगाह दोनों की जरुरत है। अतः इसके लिए भारत से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता था।

उमर धैर्यवान होने के साथ-साथ समझदार भी था। दरअसल, भारत में इस समय दो महान साम्राज्य - उत्तर में सम्राट हर्षवर्धन और दक्षिण-पश्चिम में चालुक्य वंश का शासन था। भारत के सीमावर्ती इलाकों विशेषकर सिंध में महाराजा चच का राज्य (622 से 662 तक) था। वह एक सफल योद्धा होने के साथ-साथ कुशल सेना का भी नेतृत्व करता था। खलीफा उमर ने एक बार अपने पर्शिया के गवर्नर से सिंध के बारे में जानकारी भेजने को कहा था। पर्शिया के गवर्नर ने खलीफा को बताया कि "सिंध बहुत ताकतवर है और मुसलमानों को वहां मरने के लिए भेजने का कोई मतलब नहीं है।"

चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने अपनी भारत यात्रा के संस्मरणों में स्पष्ट उल्लेख किया है कि सम्राट हर्षवर्धन के पास 60 हजार हाथियों पर सवार सैनिकों सहित 1 लाख घुड़सवार सेना मौजूद थी। इसी कारण उसे 30 वर्षों तक हथियार उठाने की जरुरत नहीं पड़ी और उसके शासन में हमेशा शांति रही।

सम्राट हर्षवर्धन, चालुक्य साम्राज्य और महाराजा चच की सैन्य ताकत एवं क्षमता का खलीफा उमर की सेना कभी मुकाबला नहीं कर सकती थी। इसलिए सभी इतिहासकारों ने इस तथ्य को स्पष्ट रूप से लिखा है कि खलीफा उमर ने अपनी अनुमति से कोई भी युद्धक अभियान भारत नहीं भेजे। वर्ष 1939 में ईश्वरी प्रसाद द्वारा लिखी पुस्तक 'ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ मुस्लिम रूल इन इंडिया' के अनुसार, "उमर ने भारत के खिलाफ अरब सेना के अभियानों को कभी स्वीकृति नहीं दी और उन्हें भारत की तरफ जाने के लिए भी प्रतिबंधित किया हुआ था।"

खलीफा उमर के शासन में पैगम्बर मोहम्मद के सहयोगी उस्मान को बहरीन और ओमान का एक गवर्नर नियुक्त किया गया था। वह महत्वाकांक्षी अधिक था और उसने व्यापारियों के माध्यम से भारत के खजाने एवं मंदिरों की जानकारी बहुत बार सुन रखी थी। इसलिए, खलीफा उमर द्वारा भारतीय युद्धक अभियानों को प्रतिबंधित करने के बावजूद भी उस्मान ने अपनी निजी आदेश पर 636-37 में ठाणे बंदरगाह पर अरबी हमलावर सेना भेज दी। उस दौर में ऐसे ही कुछ हमलें भरूच और देबल के बंदरगाहों पर भी हुए। इन सभी स्थानों से अरबी सेना को खदेड़ दिया गया और महाराजा चच के सिंध के गवर्नर ने देबल बंदरगाह पर अरबी आक्रमणकारियों के सेनापति को ही मार डाला था।

आरसी मजूमदार, वर्ष 1931 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'द अरब इनवेजन ऑफ इंडिया' में लिखते है, "खलीफा उमर के शासन में मुसलमानों को सिंध पर कोई सफलता नहीं मिली।" जब उस्मान के इस हमलें की जानकारी खलीफा उमर तक पहुंची तो उसने उस्मान को चेतावनी देते हुए कहा, "अल्लाह की कसम, अगर हमारे लोग मारे गए तो उतनी ही संख्या में मैं तुम्हारे कबीले के लोगों की हत्या कर दूंगा।"

खलीफा और उस्मान के इस आपसी विरोधाभास का जिक्र नौवीं शताब्दी के एक मुस्लिम इतिहासकार अल-बालाधुरी की पुस्तक 'किताब फ़ुतुह अल-बुलदान' में मिलता है। यह उस दौर के मुस्लिम इतिहास की सबसे प्रासंगिक पुस्तक है। इसी से एक बार फिर स्पष्टता मिलती है कि खलीफा उमर को भारतीय युद्धक अभियानों में न सिर्फ हारने बल्कि उसे अपने अरबी सैनिकों के भारी संख्या में मारे जाने का भी डर हमेशा सताता रहता था।

खलीफा उमर की हत्या के बाद खिलाफत की गद्दी उस्मान (644 से 656 तक) के पास आई। भारत की समृद्धि एवं चकाचौंध अभी भी उसकी आँखों के सामने बनी हुई थी। हालाँकि, उसने इस बार अपनी पिछली गलती से सबक लिया और थोड़ी सतर्कता बरतते हुए अपने एक गवर्नर अब्दुल्ला बिन उमर बिन रबी को सिंध की जानकारी इक्कठा कर भेजने को कहा। अब्दुल्ला खुद तो सिंध नहीं गया लेकिन अपने एक सहयोगी हाकिम बिन जबलाह को वहां भेजा। कुछ दिनों तक वह सिंध में रहा और अब्दुल्ला को उसने वहां की वस्तुस्थिति बताई।

अब्दुल्ला ने उसे सीधे खलीफा उस्मान को वह सब बताने के लिए कहा। वह खलीफा के पास गया और बोला, "मैंने सिंध को अच्छे से समझ लिया है और उसे अब मैं अच्छे से जानता हूँ।" खलीफा ने कहा, "तो फिर मुझे बताओ।" उसने जवाब दिया, "पानी की आपूर्ति की कमी है; खजूर घटिया किस्म के है; और लुटेरे निडर है। छोटी सेना वहां समाप्त हो जाएगी और बड़ी सेना भूख से मर जाएगी।" खलीफा ने हाकिम से कहा, "तुम मुझे जानकारी दे रहो या कोई कविता पढ़ रहे हो?" हाकिम ने कहा, "नहीं, जानकारी दे रहा हूँ।"

यह पूरा वाक्या 'किताब फ़ुतुह अल-बुलदान' में मिलता है। पुस्तक का लेखक अल-बालाधुरी आगे लिखता है कि इस बातचीत के परिणामस्वरुप उस्मान ने भारत पर एक भी हमला नहीं किया। हाकिम की बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि उसने बहुत ही चतुराई से खलीफा उस्मान को भारत के खिलाफ किसी भी युद्धक अभियान भेजने से रोका था। उसे इस बात का आभास हो गया था कि अरब की सेना सिंध का सामना करने में असफल रहेगी। सिंध में पानी और भोजन की कभी कोई कमी नहीं थी। बस हाकिम को किसी भी तरह खलीफा को रोकना था इसलिए उसने ऐसी एक कहानी बनाई जिससे खलीफा भी उस पर नाराज न हो और सिंध की तरफ देखना भी छोड़ दे।

उस्मान के बाद, अली को खलीफा (656 से 661 तक) बनाया गया। अपने पूर्ववर्ती खलीफाओं के भांति उसने भी भारत पर हमलें की असफल योजनाएं नहीं बनायीं। उसे पता था कि उसके समुद्री जहाज हमलें के उद्देश्य से भारत के किसी भी इलाकें में दाखिल होंगे तो वह समाप्त हो जायेंगे। इसलिए उसने एक भी युद्धक अभियान समुद्र के रास्ते से नहीं भेजा। उसके शासन में सिंध के सीमावर्ती इलाकों जैसे किकान में अरबों ने लूटपाट जरुर मचाई लेकिन कभी भी भारत के किसी भी बंदरगाह अथवा शहर पर हमला करने की हिम्मत नहीं की।

इस्लाम में चल रहे आपसी संघर्ष में अली की 661 में हत्या कर दी गयी और इसी के साथ रशीदुन खिलाफत भी समाप्त हो गयी। अब उसकी जगह उमय्यद वंश स्थापित हुआ और मुआविया इस्लाम का पांचवां खलीफा बना। उसने इस्लाम का केंद्र मक्का नहीं बल्कि सीरिया में दमिश्क को बनाया। इस प्रकार पहले पांच खलीफाओं के जीवन में अरबों का भारत में प्रवेश करने का सपना साकार नहीं हुआ। (क्रमशः)

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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