• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts
Oneindia App Download

नेशनल हेराल्ड : नेहरू के जमाने से ही संकट में

Google Oneindia News

नेशनल हेराल्ड और उससे जुड़े समाचार-पत्रों में वित्तीय अनियमितताओं के कारण कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी आजकल प्रवर्तन निदेशालय के चक्कर लगा रहे है। वैसे यह कोई नयी बात नहीं है कि इस समाचार-पत्र को अधिग्रहण करने वाली कंपनी - एसोसिएट जर्नल लिमिटेड में वित्तीय गड़बड़ियाँ सामने आई हो। वास्तविकता तो यह है कि यह कंपनी अपने शुरुआती वर्षों से ही पैसे की कमी से जूझ रही थी और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने में भी इसके आर्थिक लेनदेन पर सवाल खड़े हो चुके हैं।

Rahul Gandhi

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रहे, पुरषोत्तम दास टंडन अपनी पुस्तक 'The Unforgettable Nehru' में लिखते है, "नेहरू, कांग्रेस के दैनिक समाचार-पत्र नेशनल हेराल्ड के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के अध्यक्ष बन गए थे। यह पत्र लखनऊ से 1938 में प्रकाशित होना शुरू हुआ। नेहरू इस पद पर तब तक बने रहे जब तक वे भारत सरकार का हिस्सा नहीं बने थे। इस समाचार-पत्र की आर्थिक स्थिति हमेशा उनकी चिंता का विषय बनी रहती थी। उन शुरुआती दिनों में, इसके पहले संपादक श्रीमान के। रामा राव लिखते है, 'पहले तीन सालों में बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की बैठकों में बहुत गहमागहमी बनी रहती थी। धीरे-धीरे बढ़ रहे घाटे से कोई खुश नहीं रहता था। नेहरू ने एक दिन यहाँ तक कह दिया कि आनंद भवन ले लो, उसे बेच दो और फिर तुम लोग अगर इस समाचार-पत्र को चलाना चाहते हो तो चलाओ'।"

नेहरू के इस समर्थन से जैसे-तैसे कुछ सालों के लिए नेशनल हेराल्ड चल गया लेकिन स्वाधीन भारत में फिर से उसे आर्थिक समस्याओं से जूझना पड़ गया। टंडन लिखते है, "एक दिन नेहरू से मिलने रफ़ी अहमद किदवई आये और उन्होंने उनसे कहा कि नेशनल हेराल्ड बहुत बुरी अवस्था में है। अब यह लगने लगा है कि इसे बंद करना पड़ेगा।" रफी अहमद तब कंपनी के निदेशक थे।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि नेहरू इस समाचार-पत्र को लेकर बहुत संवेदनशील थे और किसी भी हालत में इसे बंद नहीं होने देना चाहते थे। अतः किदवई ने इधर-उधर से पैसे का इन्तेजाम करना शुरू कर दिया। जब सरदार पटेल को यह बात पता चली तो उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू से इसकी शिकायत की। दरअसल, सरदार पटेल को लगता था कि जिन लोगों से पैसा लिया जा रहा है वे सरकार से इसका मोलभाव कर अपना निजी फायदा उठा सकते हैं।

इस सन्दर्भ में, 5 मई 1950 को सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखकर सचेत किया, "6 दिसंबर 1948 को राणा महावीर शुमश्री जंग बहादुर और सुबिया शुमश्री जंग बहादुर राणा ने 25000-25000 रुपए नेशनल हेराल्ड को दिए है। एक अन्य 25000 रुपए की राशि 2 दिसंबर 1949 को सुबिया शुमश्री जंग बहादुर राणा ने दी है। इन दोनों महानुभावों को आप अच्छे से जानते हैं। यह दोनों हिमालयन एयरवेज से जुड़े हुए हैं। उनके विमान का पिछली जनवरी में ही नवीनीकरण (renewed) किया गया था। इस विमान से पहले नागरिक उड्डयन के मामले में उनकी कोई प्रमुख गतिविधि कभी दिखाई नहीं दी। जबकि इनके खिलाफ कई प्रतिकूल खबरें सामने आई हैं। मुझे लगता है, इसमें से एक शिकायत तो इंडियन एयर फ़ोर्स की तरफ से है।"

सरदार पटेल ने इसी पत्र में रफ़ी अहमद किदवई पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि सरकार में रहते हुए उनके व्यावसायिक क्रियाकलाप उचित नहीं हैं। उन्होंने नेहरू को याद दिलाते हुए यह भी लिखा कि हमने एक नियम बनाया था कि सरकार में रहते हुए हम किसी भी तरह के व्यावसायिक कार्यों को नहीं करेंगे। वे आगे लिखते हैं, "मैंने रफ़ी को निदेशक पद से इस्तीफा देने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है।"

प्रधानमंत्री नेहरू के निजी सचिव एम.ओ. मथाई अपनी पुस्तक, Reminiscences of the Nehru Age' में भी सरदार पटेल के आरोपों की पुष्टि करते हुए लिखते हैं, "जब राज्य मंत्रालय बड़ोदा के महाराजा प्रताप सिंह के खिलाफ कदम उठा रहा था तो रफ़ी ने महाराजा से संपर्क कर नेशनल हेराल्ड के लिए 200,000 रुपए उठा लिए थे। इसकी जानकारी सरदार पटेल ने नेहरू को दे दी थी। जवाब में रफ़ी ने कहा कि मैंने एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक फिरोज गाँधी को पैसे लौटने के लिए कहा है।" उस दौर में 2 लाख रुपए एक बड़ी रकम थी। मथाई इस सन्दर्भ में खुलासा करते हुए लिखते हैं कि फिरोज गाँधी ने यह पैसे न महाराजा को कभी लौटाए और न ही एसोसिएट जर्नल लिमिटेड को दिए।

1942 में फिरोज की इंदिरा गाँधी से शादी के बाद, नेहरू ने ही फिरोज को एसोसिएट जर्नल लिमिटेड का कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया था। फिरोज का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था। वे तो एक आशिक-मिजाज व्यक्ति थे, जिन्हें इंदिरा गाँधी की बुआ की बेटी से ही प्यार हो गया था। मथाई लिखते हैं, "1947 में फिरोज गाँधी को विजयलक्ष्मी पंडित की एक बेटी से प्यार हो गया था। वह तब नेशनल हेराल्ड में पत्रकार के तौर पर काम करती थीं। जैसे ही विजयलक्ष्मी को इसकी भनक लगी तो वे अपने खर्चे से सीधे मास्को से भारत आई और अपनी लड़की को अपने साथ मास्को ले गयीं।"

फिरोज गाँधी के दौरान ही एसोसिएट जर्नल लिमिटेड की आर्थिक स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होने लगी थी। प्रधानमंत्री नेहरू 5 मई 1950 को सरदार पटेल को लिखते हैं, "फिरोज ने मुझे बताया है कि दो साल पहले वो और मृदुला (साराभाई) नेशनल हेराल्ड के शेयर बेचने के सिलसिले में बम्बई गए थे। वे मूलराज से मिले। उन्होंने उनको सहायता का आश्वासन दिया था। वे हुसैनभाई लालजी और कामनी से भी मिले। इन तीनों ने बम्बई के व्यापारियों को कुछ शेयर बेचने में सहायता की थी।"

National Herald Case:राहुल गांधी के ईडी को दिए बयान पर गुस्‍साए मोतीलाल वोरा के बेटे अरुण, बोले- निराधार दावेNational Herald Case:राहुल गांधी के ईडी को दिए बयान पर गुस्‍साए मोतीलाल वोरा के बेटे अरुण, बोले- निराधार दावे

दरअसल, 1947 के बाद से प्रधानमंत्री नेहरू का ध्यान देश की दूसरी समस्याओं पर अधिक था। इसलिए पिछले तीन सालों से उन्होंने नेशनल हेराल्ड की सारी जिम्मेदारी फिरोज, मृदुला और रघुनंदन शरण पर छोड़ दी थी। इन तीनों ने ही कंपनी के शेयर व्यापारियों को बेचे और पैसा जुटाया था। शुरू में प्रधानमंत्री नेहरू इस बात से खुश नहीं थे लेकिन उनकी बनाई इस कंपनी की खस्ता हालत को देखते हुए उन्होंने स्वयं व्यापारियों से धन एकत्र करने को मंजूरी दे दी।

जबकि सरदार पटेल इसके पक्ष में बिलकुल नहीं थे। उन्होंने 10 मई 1950 को प्रधानमंत्री नेहरू से समक्ष अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, "ऐसा लगने लगा है कि आप इस बात से संतुष्ट हैं कि नेशनल हेराल्ड में शेयर और डिबेंचर के बदले जिन व्यापारियों ने पैसा लगाया है, वह उचित है। लेकिन मेरे द्वारा जुटाई जानकारी यह कहती है कि जिन्होंने नेशनल हेराल्ड में निवेश किया है, वह कुछ और मामला है।"

सरदार पटेल इस मामले में बिलकुल सही निकले क्योंकि वास्तव में जो पैसा एकत्र किया गया था वह नेशनल हेराल्ड को कभी मिला ही नहीं। अगर ऐसा होता तो 1955 में इस कंपनी को उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता चंद्रभानु गुप्ता को बेचने की नौबत न आती। तब अजित प्रसाद जैन और फिरोज ने मिलकर इस सौदे को अमलीजामा पहनाना भी शुरू कर दिया था। मगर इंदिरा गाँधी ने विरोध के चलते ऐसा न हो सका। इस प्रकार एक बार फिर से नेशनल हेराल्ड नेहरू परिवार के हाथों से जाते-जाते बच गया लेकिन उसका वित्तीय घाटा पहले की तरह बरकरार रहा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

Comments
English summary
national herald: a bundle of irregularities
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X