इंडिया गेट से: नड्डा ने क्यों कहा कि क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो जाएंगी, सिर्फ भाजपा बचेगी?
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के एक बयान की बहुत चर्चा हो रही है। नड्डा ने कहा है कि अगर भाजपा अपनी विचारधारा पर चलती रही तो देश से क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो जाएंगी। उन्होंने राष्ट्रीय पार्टियों का भी जिक्र किया और कहा कि ज्यादातर राष्ट्रीय पार्टियां खत्म हो गई हैं। जो बची हैं, वे भी खत्म हो जाएँगी, सिर्फ भाजपा बचेगी।

नड्डा के इस बयान के कई राजनीतिक मतलब निकाले जा रहे हैं। क्या भाजपा एकदलीय शासन चाहती है, जैसा कि 1975 में इंदिरा गांधी की मंशा हो गई थी? या यह बयान सिर्फ परिवार आधारित राजनीति पर चोट करने के इरादे से दिया गया है? हाल ही में विभाजन की शिकार हुई शिव सेना के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने नड्डा के इस बयान को अलोकतांत्रिक और भाजपा का अहंकार कहा है।
लेकिन नड्डा ने एक बात और कही थी, जिस पर उद्धव ठाकरे ने गौर नहीं किया। उन्होंने कहा था कि भाजपा की असल लड़ाई परिवारवाद की राजनीति से है। उद्धव ठाकरे आज जो कुछ भी हैं, या थे, अपने पिता बाला साहब ठाकरे की वजह से थे। वह शिवसेना के अध्यक्ष भी उन्हीं के कारण बने और मुख्यमंत्री भी उन्हीं की राजनीतिक विरासत के कारण बने। वह इस विरासत को संभाले रख सकते थे, अगर वह बाला साहेब की विचारधारा पर आधारित भाजपा से गठजोड़ की विरासत पर भी कायम रहते।
भाजपा की विचारधारा जस की तस है, इसलिए नड्डा ने कहा कि अगर भाजपा विचारधारा पर चलती रही तो सारी पार्टियां खत्म हो जाएँगी। उन्होंने इसके साथ परिवारवाद को भी जोड़ा है, जिसे जानबूझ कर अनदेखा किया जा रहा है। जब से पार्टी की कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में आई है, भाजपा का हर नेता परिवारवाद की राजनीति पर बार बार हमले करता है। यह बात जनता के दिलो दिमाग में जल्दी बैठती है और वे भाजपा की तरफ आकर्षित होते हैं। देश में आज़ादी के बाद से परिवार आधारित पार्टियां चलती रही हैं, आगे भी चलेंगी, लेकिन शर्त यह है कि पारिवारिक विरासत संभालने वाले के पास टेलेंट होना चाहिए।
कांग्रेस इस का सब से बड़ा उदाहरण है। राजीव गांधी सहानुभूति की लहर में कांग्रेस को जीता लाए थे, उस के बाद कांग्रेस को कभी भी लोकसभा में बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस का बुरा हाल इसलिए हुआ, क्योंकि कांग्रेस परिवार आधारित पार्टी बन गई और राहुल गांधी के पास कोई राजनीतिक टेलेंट नहीं है। जहां जहां टेलेंट होगा, परिवार आधारित पार्टियां रहेंगी।
इसके हम तीन उदाहरण देख सकते हैं। उड़ीसा ने नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तमिलनाडू में एम.के. स्टालिन। इन तीनों ने अपने पिता के देहांत के बाद चुनाव जीत कर सरकारें बनाई हैं।
हमारे सामने दो उदाहरण और हैं, जहां पारिवारिक विरासत छीन कर सरकारें बनाई गई थीं। आंध्र प्रदेश में चन्द्रबाबू नायडू ने अपने ससुर एन.टी.आर. से विरासत छीनी थी। उनमें थोड़ा बहुत राजनीतिक टेलेंट था, तभी वह लगातार दो चुनाव हारने के बाद भी 2014 में तेलुगुदेशम को सत्ता में ले आए थे। लेकिन अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बन जाने के बाद अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल नहीं पा रहे। तेलंगाना में परिवार आधारित पार्टी टीआरएस अभी नई पार्टी है। इस का आगे क्या होगा, अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन भाजपा का अगला टार्गेट तेलंगाना ही है।
जे.पी. नड्डा जब कहते हैं कि भाजपा विचारधारा के कारण ही आज इस मुकाम पर पहुंची है, तो वह पूर्ण सत्य नहीं है, वह अर्धसत्य है क्योंकि भाजपा की यही विचारधारा तो जनसंघ के जमाने से है। विचारधारा और संघ से मिले समर्पित मजबूत काडर ने भाजपा को धीरे धीरे आगे जरुर बढाया, लेकिन भाजपा आज इस मुकाम पर नेतृत्व के टेलंट से पहुंची है। वाजपेयी और आडवानी की बरसों की मेहनत पार्टी को धीरे धीरे आगे बढ़ा रही थी कि भाजपा को नरेंद्र मोदी मिल गए।
देश की जनता ने जब 2014 में नरेंद्र मोदी को सत्ता सौंपी थी, तब भाजपा की सिर्फ पांच राज्यों गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ और गोवा में सरकारें थीं। इन पांच राज्यों में देश की सिर्फ 19 प्रतिशत आबादी रहती है। दो राज्यों पंजाब और बिहार में भाजपा सरकार में साझीदार थी। इन दो राज्यों में देश की 11 प्रतिशत आबादी रहती है।
इस समय भाजपा 19 राज्यों में सत्ता में है, इन राज्यों में देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी रहती है। 2018 से पहले एक समय ऐसा भी आया था जब छतीसगढ़ और राजस्थान में भी भाजपा की सरकारें थी, तब देश की 70 फीसदी आबादी इन 21 राज्यों में थीं। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस को देखिए, 2014 में नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए, तब कांग्रेस की 14 राज्यों में सरकार थी। अब सिर्फ दो राज्यों राजस्थान और छतीसगढ़ में सरकारें हैं और झारखंड में सत्ता में साझीदार है।
जेपी नड्डा जब यह कहते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियां नहीं रहेंगी तो वह किस आधार पर कहते हैं। यह ठीक है कि भाजपा बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन लोकतंत्र में जनता ही तय करती है कि उसे किस की सरकार चाहिए। भाजपा के पास अभी राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे लंबी रेस के घोड़े जरुर हैं। लेकिन राज्यों में क्षत्रप खड़े नहीं होंगे तो वह क्षेत्रीय पार्टियों को समाप्त नहीं कर पाएगी। तमिलनाडू, आंध्र, तेलंगाना, उड़ीसा में क्षेत्रीय पार्टियों को चुनौती देने के लिए उसे अपने क्षत्रपों की जरूरत है। कांग्रेस इन राज्यों में तब तक पावरफुल थी, जब तक उसके पास क्षत्रप थे।
अब मौजूदा ताकत बचाए रखने की बात। इस साल भाजपा शासित हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव हैं, भाजपा को इन दोनों राज्यों को बचाना है। अगले साल 2023 में 9 राज्यों के चुनाव हैं, जिनमें से कर्नाटक, मध्य प्रदेश और त्रिपुरा में भाजपा की सरकारें हैं। मेघालय और नगालैंड में भाजपा सरकारों में साझीदार है। कांग्रेस की अन्तिम दो सरकारों राजस्थान और छतीसगढ़ में भी अगले साल चुनाव है। इस के अलावा तेलंगाना में टीआरसी और मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है।
नड्डा जब कहते हैं कि परिवार आधारित सभी पार्टियां खत्म हो जाएँगी तो भाजपा का अगला टार्गेट कांग्रेस की आख़िरी बची दो सरकारें राजस्थान, छतीसगढ़ और टीआरएस की तेलंगाना है। लेकिन अगले साल उसे अपनी कर्नाटक, मध्यपदेश और त्रिपुरा सरकारों को भी बचाना है। भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती 2024 में आएगी, जब उसे लोकसभा के साथ साथ महाराष्ट्र, हरियाणा, सिक्किम और अरुणाचल की अपनी सरकारों को भी बचाना होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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