भारत को इंटरफेथ डायलॉग के साथ अभिव्यक्ति की आजादी भी चाहिए
बीते सप्ताह दिल्ली में एक बड़ा आयोजन हुआ। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने शनिवार 30 जुलाई को संविधान क्लब में एक इन्टरफेथ संवाद को संबोधित किया। इस इन्टरफेथ संवाद का आयोजन अजमेर की इस्लामिक संस्था आल इंडिया सज्जादनशी सूफी काउंसिल ने किया था। दिल्ली में हुए इस आयोजन आयोजन में बोलते हुए अजीत डोवाल ने जो कुछ कहा है, उस पर समाज में चर्चा करने की जरूरत है।

नुपुर शर्मा के बयान के बाद जिस तरह से अरब देशों की प्रतिक्रिया आई है, उसके बाद से ही केन्द्र सरकार के स्तर पर मुसलमानों को लेकर सक्रियता बहुत बढ गयी है। नुपुर शर्मा ने मुसलमानों के नबी की निजी जिंदगी के बारे में जो कुछ बताया था उस पर अरब देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए भारत को सभी धर्मों का सम्मान करने की सलाह दी थी। इसमें वह कतर सबसे आगे था जो अफगानिस्तान में तालिबान का शासन लाने में मध्यस्थ की भूमिका निभा चुका है। इसके बाद भाजपा ने न केवल मुसलमानों के नबी पर टिप्पणी करनेवालो को पार्टी से निकाल दिया बल्कि विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में ऐसे लोगों को "फ्रिंज एलिमेन्ट" भी घोषित कर दिया।
उस घटनाक्रम में सर्वाधिक सक्रियता अजीत डोवाल की ही देखने को मिली थी। अजीत डोवाल ने उसी समय ईरान के विदेश मंत्री से भी भारत में मुलाकात की थी और खबरों में इस मुलाकात को "ईरान का गुस्सा शांत करनेवाला" बताया गया था। स्वाभाविक है प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार होने के साथ साथ अजीत डोवाल को इस्लामिक जगत का जानकार भी माना जाता है। ऐसे में अगर किसी भाजपा नेता के बयान से इस्लामिक जगत में बवाल मचा तो अजीत डोवाल की सक्रियता देखकर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अपनी सक्रियता की इसी कड़ी में वो शनिवार को उस इन्टरफेथ कांफ्रेंस में भी बोलने के लिए पहुंचे जिसका आयोजन अजमेर की सूफी संस्था ने किया था।
इस कांफ्रेंस में अजीत डोवाल ने कहा कि "कुछ लोग धर्म के नाम एक से दूसरे नागरिक के बीच दुश्मनी पैदा करने का काम कर रहे हैं। इससे न केवल देश के माहौल पर बहुत बुरा असर हो रहा है। बल्कि देश के बाहर भी इसका गलत संदेश जा रहा है।" देश में सांप्रदायिकता के बिगड़ते माहौल के बीच अजीत डोवाल ने कहा कि "हम मूक दर्शक बनकर नहीं बैठ सकते। हमें मिलकर आवाज उठानी होगी। हमें हर धर्म के लोगों को ये विश्वास दिलाना होगा कि यह देश उनका है। ताकि हर धर्म के लोग आजादी से अपने अपने धर्म का पालन कर सकें।" उन्होंने एक बात और कही कि "कट्टरपंथियों की सिर्फ निंदा करने से काम नहीं चलेगा।हमें जमीन पर उतरकर उनके खिलाफ काम करना होगा।"
अगर अजीत डोवाल की इन बातों को तात्कालिक समय से जोड़ें तो ऐसा लगता है कि वो हिन्दू मुस्लिम रिश्तों पर बोल रहे थे और दोनों ओर के कट्टरपंथियों को कड़ा संदेश दे रहे थे कि अगर आप समाज में सांप्रदायिकता फैलाने का काम करते हैं तो आपके साथ कड़ाई से निपटा जाएगा। इस मौके पर सूफी काउंसिल के चेयरमैन सैय्यद नसीरुद्दीन चिश्ती ने दो महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक, पीएफआई जैसे कट्टरपंथी ताकतों को खत्म किया जाना चाहिए और दूसरा सर तन से जुदा नारा गैर इस्लामिक है। इस अंतर्धार्मिक कांफ्रेंस में और किस धर्म के धर्मगुरु ने क्या बोला, न तो वह खबर बनी और न ही उसका कोई मतलब था। मतलब सिर्फ इससे था कि एनएसए अजीत डोवाल क्या बोल रहे हैं और इस्लाम का प्रतिनिधित्व करने वाले सूफी संस्था के चीफ क्या बोल रहे हैं। इन्हीं दोनों की बातें खबर भी बनीं और इन्हीं पर चर्चा करने की जरूरत भी है।
केन्द्र में जब से मोदी सरकार आयी है उसने सूफियों को इस्लाम की सुधारवादी आवाज मानकर हमेशा महत्व दिया है। दिल्ली के विज्ञान भवन में 2016 में बड़े स्तर पर एक सूफी कांफ्रेंस का आयोजन हुआ था जिसे स्वयं नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया था। अब जबकि नुपुर शर्मा के बयान को बहाना बनाकर मुसलमानों ने देश विदेश में सांप्रदायिकता का खेल खेला है तब एक बार फिर सूफियों के जरिए ही ये सरकार कोई नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन यहां कुछ ऐसी बातें भी हैं जो सूफियों को ही सवालों के घेरे में खड़े करते हैं।
सबसे पहली बात कि भारतीय उपमहाद्वीप में सूफियों का इस्लाम में मजार की पूजा करवाने और कव्वाली गवाने से ज्यादा कोई महत्व नहीं है। इस्लाम के जितने फिरके हैं उनमें सबसे कमजोर आवाज सूफियों की ही है। सूफियों को ताकत मिलती है बरेलवी मुसलमानों से जो मजार पूजा को बुरा नहीं मानते। बरेलवी मुसलमानों की तादात भारत पाकिस्तान में सर्वाधिक है। संभवत: इसी बात को ध्यान में रखकर बार बार इस सरकार की ओर से सूफियों के कंधे पर भाईचारे की जिम्मेवारी डाली जाती है। लेकिन जमीनी सच्चाई ऐसी नहीं है कि सूफियों की बात का आम मुसलमान पर कोई असर होता हो।
ऐसे में उनको आगे करके अगर सरकार कोई संदेश देना भी चाहे तो कम से कम इस्लामिक जगत में जानेवाला सबसे कमजोर संदेश होगा। यहां यह बात भी नहीं भूलनी चाहिये कि जयपुर में कन्हैयालाल की हत्या करने वाले मोहम्मद गौस और अतरी दोनों कन्हैयालाल की हत्या करने के बाद अजमेर दरगाह की ओर ही जा रहे थे। उसी अजमेर दरगाह से नबी की निंदा करनेवालों के सर तन से जुदा करने के नारे दिये गये थे जिसके प्रतिनिधि के तौर पर सैय्यद नुरुद्दीन चिश्ती इस नारे को गलत बता रहे हैं। इसलिए उनकी किसी बात पर विश्वास करना अजीत डोवाल के लिए आसान हो सकता है लेकिन जिन भारतीयों ने यह सब टीवी पर देखा है और अखबारों में पढा है, उनका सूफियों पर भरोसा करना कठिन है।
जहां तक सैय्यद नुरुद्दीन द्वारा पीएफआई को खारिज करने की अपील है तो उसमें कोई बुराई नहीं है।
बरेलवी मुसलमान या फिर सूफी लोग पीएफआई, तबलीगी जमात और देओबंदी इस्लाम के खिलाफ बोलते ही हैं। इसके पीछे गैर मुस्लिमों के हित से अधिक उनके आपसी फिरके की लड़ाई होती है। देओबंदी और तबलीगी मजार पूजा को कुफ्र करार देते हैं तो बरेलवी और सूफी देओबंदियों के खिलाफ लड़ते हैं। लेकिन इन सबमें एक बात समान है और वो कि जो इस्लाम को नहीं मानता वो काफिर है, और काफिर के खिलाफ जिहाद जायज है।
नरेन्द्र मोदी हों या फिर अजीत डोवाल। सूफियों के सहारे हो सकता है वो मुसलमानों में अपने तृप्तीकरण कार्यक्रम को सुदृढ करके अपने ऊपर लगनेवाले मुस्लिम विरोधी होने का दाग मिटाना चाहते हों। लेकिन ऐसा होना मुश्किल लगता है। जैसे इस कांफ्रेंस में ही नुरुद्दीन ने बड़ी चालाकी से भगवान, गॉड, अल्लाह के साथ अपने पैगंबर को जोड़कर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करनेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई वाला प्रस्ताव पारित करवा लिया। जब बात अलग अलग भगवानों के सम्मान की थी तो फिर नुरुद्दीन ने उसमें पैगंबर को क्यों जोड़ दिया?
पैगंबर उनके भगवान नहीं है बल्कि उनकी मान्यताओं के मुताबिक भगवान के संदेशवाहक हैं लेकिन हर मुसलमान के लिए अल्लाह बाद में लेकिन उनका पैगंबर पहले है। उन सूफियों के लिए भी जो कल तक पैगंबरवाद में भरोसा ही नहीं करते थे। लेकिन जब बात इस्लाम की आयी तो उन्होंने भी वही काम किया जो कोई बरेलवी करता या फिर कोई देओबंदी। फ्री एण्ड फेयर स्पीच की बात इस्लाम में स्वीकार नहीं है और इस कांफ्रेस के जरिए वो संदेश उन्होंने बाकी लोगों को स्वीकार करवा लिया।
ऐसे हालात में अजीत डोवाल को सोचना चाहिए कि वह कट्टरपंथियों पर निशाना साधने के बहाने जो वार कर रहे हैं कहीं वह उनके सीने पर तो नहीं हो रहा जिन्होंने अपने सीने में नरेन्द्र मोदी और अजीत डोवाल जैसे लोगों को हीरो बनाकर बिठा रखा है। अजमेर के सूफियों को आगे करके क्या अजीत डोवाल ये संदेश देना चाहते हैं कि कन्हैयालाल की हत्या के बाद जिन हिन्दुओं ने अजमेर दरगाह जाना बंद कर दिया है वो फिर से जाने लगें?
अजीत डोवाल इस्लामिक जगत के जानकार हैं ये बात सही है, लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि अब दुनिया सत्तर और अस्सी के दशक में नहीं है। यह सोशल मीडिया की इक्कीसवीं सदी है। अब इस्लाम के बारे में जितना मुस्लिम समझ रहे हैं, उतना ही गैर मुस्लिम भी समझ रहे हैं। ऐसे में भारत अगर कांग्रेस काल का भारत ही बना रहना चाहेगा तो फिर नये भारत का मतलब क्या रह जाएगा?
एक सेकुलर देश में सबको अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता है। अगर कोई किसी धर्म या उसकी मान्यताओं की आलोचना भी करता है तो उसकी आलोचना को महत्व देने की बजाय उसे सजा देकर अभिव्यक्ति को सुरक्षित नहीं किया जा सकता। केन्द्र में बैठी सरकार को इस बात को समझना होगा कि भारत को इंटरफेथ डॉयलाग के साथ साथ अभिव्यक्ति की आजादी भी चाहिए।
भारत में आलेचना से परे कोई नहीं है, और अगर कोई किसी की आलोचना करता है तो फिर उसको सिर्फ इस बात के लिए सजा देना कि वह किसी मत पंथ, मजहब की मान्यताओं को नहीं मानता, ये घातक फैसला होगा। ऐसी सोच से तो भारत का समस्त दार्शनिक विकास ही अवरुद्ध हो जाएगा और समाज में कटुता बढेगी। जिस देश में यह कहा जाता हो कि "वादे वादे जायते तत्वबोध" उस देश को अरबी मान्यताओं के प्रभाव में आकर सम्मान से ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। तभी हम भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में जन मन के अभिव्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित कर पायेंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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