Hunger Index: क्या ग्लोबल हंगर रिपोर्ट चीन का हथकंडा है?
Hunger Index: ग्लोबल हंगर इंडेक्स नाम से हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में विश्व के 121 देशों में भारत को 107वां स्थान दिया गया है। इस रिपोर्ट को आयरलैंड स्थित कंसर्न वर्ल्डवाइड (Concern Worldwide) और जर्मनी के वेल्थहंगरलाइफ (Welthungerhilfe) नाम के दो गैर-सरकारी संस्थान मिलकर हर साल प्रकाशित करते है।
इस प्रकार की रिपोर्ट को प्रकाशित करने का सिलसिला एक अमेरिकी संस्थान - इंटरनेशल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (International Food Policy Research Institute - IFPRI) और वेल्थहंगरलाइफ ने मिलकर शुरू किया था। साल 2007 में कंसर्न वर्ल्डवाइड भी इन दोनों के साथ जुड़ गया।
साल 2018 में इंटरनेशल फ़ूड पालिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (IFPRI) ने अपने को इस उपक्रम से अलग कर लिया और तब से यह रिपोर्ट कंसर्न वर्ल्डवाइड और वेल्थहंगरलाइफ ही मिलकर प्रकाशित करते है। IFPRI सार्वजनिक रूप से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर काम करता है। साल 2009 से 2019 तक एक चीनी नागरिक, शिगन फान (Shenggen Fan) ने इस संस्थान के महानिदेशक के रूप में काम किया।
रायटर्स की 8 मई 2015 की एक खबर - 'China must overhaul farm support policy, says think-tank' के अनुसार "फान का संस्थान चीनी सरकार के साथ मिलकर काम करता है।" अतः चीन और भारत की सामरिक दृष्टि को ध्यान में रखते हुए यह रिपोर्ट और उससे जुड़े संस्थान कभी भी भारत के पक्ष में नहीं रहे। दरअसल, इस इंडेक्स में चीन का जो नक्शा पेश किया जाता है उसमें लद्दाख का एक बड़ा हिस्सा जिस पर भारत और चीन के बीच विवाद है, उसे पूरी तरह चीन में मिला दिया गया है। इसके अलावा अरुणांचल प्रदेश को विवादित मानते हुए उसे अलग से दिखाया गया है।
इस हंगर इंडेक्स की वेबसाइट पर एक अन्य नक्शा भी मिलता है जिसमें एक तरफ अरुणाचल प्रदेश को भारत से अलग करके दिखाया है और दूसरी तरफ, लद्दाख के एक बड़े भूभाग को भारत के नक्शे से गायब कर दिया गया है।


यदि हंगर इंडेक्स वेबसाइट चीनी एजेंडे पर काम नहीं करती है तो उसे वह सभी नक्शें दिखाने की क्यों जरुरत पड़ गयी जैसा चीन की सरकार अक्सर दावे करती रहती है। साथ ही, हंगर इंडेक्स की वेबसाइट में भारत के नक्शे को तोड़ मोड़ कर बताने के साथ तिब्बत और मंगोलिया के हिस्से को चीन के भूभाग के रूप में क्यों दिखाया गया है?
अब प्रश्न उठता है कि IFPRI ने तो अपने को इस इंडेक्स से अलग कर लिया है तो चीन का रिपोर्ट से क्या लेना देना है? दरअसल, पिछले कई सालों से अगर हम भारत और चीन का तुलनात्मक अध्ययन करे तो पता चलता है कि इस रिपोर्ट में वास्तविकता को दरकिनार कर चीनी एजेंडे को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
साल 2014 में प्रकाशित हंगर इंडेक्स में 76 देशों में से भारत को 55 वां स्थान दिया गया था। फिर 2017 में एक साथ सीधे 45 स्थान नीचे 100वीं रैंकिंग थोप दी गयी, हालाँकि इस बार 117 देशों को शामिल किया गया था।
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जबकि, इस रिपोर्ट में चीन पिछले कई सालों से शीर्ष के देशों में शुमार रहता है। अब अगर चीन की खाद्यान्न स्थिति पर नजर डाले तो वास्तविकता कुछ और ही नजर आती है। 22 मई 2022 को ब्लूमबर्ग की एक खबर - 'Record Food Costs Throw Spotlight on How China Will Feed Itself' के मुताबिक चीन उन रास्तों की तलाश कर रहा है जिससे वह अपनी जनसँख्या को भरपेट भोजन उपलब्ध करवा सके। इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन विश्व के सबसे बड़े गेंहू आयातकों में से एक बन गया है। यही नहीं, चीन में सोयाबीन की इतनी खपत होती है जितनी अमेरिका में कुल फसलों का उत्पादन होता है। फिर भी चीन को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए 85 प्रतिशत सोयाबीन बाहर के देशों से आयत करना पड़ता है।
वर्ल्ड ग्रेन डॉट कॉम (world-grain।com) वेबसाइट ने दावा किया है कि साल 2019 में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को पछाड़ कर चीन विश्व का सबसे बड़ा खाद्यान्न आयातक देश बन गया है। जबकि भारत के पास गेंहू का इतना भंडार मौजूद है कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद भी साल 2022 के कुछ ही शुरूआती महीनों में 1।8 मिलियन टन गेंहू दर्जनों देशों को निर्यात किया था। इसमें अफगानिस्तान को दी जाने वाली मानवीय सहायता भी शामिल है।
यह ठीक है कि चीन और भारत दोनों देशों में एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा में जीने को मजबूर है। मगर उन आकड़ों पर भी ध्यान देना होगा जो बताते है कि भारत अपनी इस आबादी का ध्यान रख रहा है। कम-से-कम यह आबादी भूखा मरने के लिए नहीं छोड़ दी गयी है। भारत के पास 1 अक्टूबर 2022 तक लगभग 227 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 205 लाख मीट्रिक टन चावल उपलब्ध है, जो बफर स्टॉक के मानकों से कहीं ज्यादा है।
कोविड-19 के कारण उत्पन्न हुए आर्थिक व्यवधान के कारण गरीबों को होने वाली कठिनाई को दूर करने के लिए भारत सरकार ने उनके लिए कई पहल की हैं और मौजूदा पीडीएस तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं के अलावा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश के लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया है।
भारत सरकार ने 3।91 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित वित्तीय परिव्यय के साथ पीएमजीकेएवाई के तहत कुल 1121 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न आवंटित किया गया है। इन आकंड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस चीन के पास अपनी सामान्य भोजन जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है वह आज ग्लोबल हंगर इंडेक्स में कैसे टॉप 10 देशों में शुमार हो सकता है? भारत जोकि खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर देश है और नागरिकों को मुफ्त में भोजन उपलब्ध करवाने के साथ-साथ उन देशों की भी मानवीय सहायता कर रहा है जोकि वर्तमान में खाद्यान संकट से गुजर रहे है। फिर भी भारत को रिपोर्ट में सबसे पीछे धकेल दिया गया।
इन तथ्यों के अलावा, चीनी एजेंडे की एक और सच्चाई पर गौर करना होगा। वतर्मान में इस रिपोर्ट को वेल्थहंगरलाइफ ने एक अन्य गैर-सरकारी संस्थान के साथ मिलकर प्रकाशित किया है। इस गैर-सरकारी संस्थान के संरक्षक एक जर्मन राजनेता फ्रांक-वाल्टर श्टाईनमायर (Frank-Walter Steinmeier) है। वर्तमान में ये जर्मनी के प्रेसिडेंट है और भूतपूर्व विदेश मंत्री रह चुके है।

कुछ मामलों जैसे तिब्बत और दलाई लामा को लेकर फ्रांक-वाल्टर श्टाईनमायर के विचार बिलकुल चीन से मिलते है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा से मुलाकात का फ्रांक-वाल्टर ने चीन के दवाब में जबरदस्त विरोध किया था।
साल 2008 में जब दलाई लामा पांच दिवसीय जर्मनी यात्रा पर आये तो फ्रांक-वाल्टर तब जर्मनी के विदेश मंत्री थे और उन्होंने दलाई लामा से मुलाकात करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। तब तिब्बत की निर्वासित सरकार सहित दुनियाभर में फ्रांक-वाल्टर के इस रवैये की आलोचना यह कहकर की गयी कि उन्होंने मानवाधिकारों के स्थान पर व्यावसायिक रूचि दिखाई है।
इन्ही कुछ कारणों से पता चलता है कि IFPRI आज इस इंडेक्स का हिस्सा न भी हो फिर भी चीनी सरकार का एजेंडा इसमें साफ़ झलकता है क्योंकि चीनी सरकार की नीतियों के समर्थक इन संस्थानों का आज भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा बने हुए है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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