Joshimath and China Border: सामरिक रूप से भी खतरनाक है जोशीमठ का भू धसांव
भारत के लिये जोशीमठ का धार्मिक और आर्थिक से ज्यादा सामरिक महत्व है, इसे समझना जरूरी है। जोशीमठ को अगर नुकसान पहुंचता है तो इसका सीधा असर भारत चीन सीमा यानी एलएसी की सुरक्षा पर होगा।

जोशीमठ यानी गेटवे ऑफ हिमालय, जिसकी बुनियाद पर भारत की धार्मिक, आर्थिक एवं सामरिक अपेक्षाओं का भार है। जरूरतों के बोझ से दबे शहर के पैरों तले से जमीन खिसक रही है, और सदियों से आबाद एक प्राचीन इतिहास खत्म होने की कगार पर जा पहुंचा है।
इसरो की आशंका है कि जिस तरह से जोशीमठ जमीन में धंस रहा है उसके मुताबिक निकट भविष्य में यह पूरी तरह से विलुप्त हो सकता है। जोशीमठ में हालांकि लोग शहर से निकाल लिये गये हैं इसलिए लोगों की जान पर खतरा नहीं है। फिर भी यहां रहने वाली बड़ी आबादी के सिर पर विस्थापन का खतरा ही नहीं है बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा सुरक्षा में भी दरार आ जाने का डर बना हुआ है।
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित जोशीमठ को हिमालय का प्रवेश द्वार कहा जाता है, क्योंकि यहीं से हिमालय का वीरान इलाका और तिब्बत-चीन सीमा पर जाने वाले रास्ते की शुरुआत होती है। यहीं से दुर्गम पहाड़ों की शुरुआत होती है जिस पर वनस्पति का एक अंश तक नहीं दिखता। बर्फ की सफेद चादर के अलावा कुछ नजर नहीं आता है। इसी जोशीमठ में घरों और सड़कों के बीच उभरती दरारें और दरारों के बीच से रिसता हुआ पानी दिल में हदस और सिहरन पैदा कर रहा है।
जोशीमठ की मौजूदा परेशानियों के लिए सरकारी विकास एवं अनियंत्रित नियोजन को जिम्मेदार बताया जा रहा है। बद्रीनाथ तक बनती ऑलवेदर सड़क हो या फिर तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना, दोनों परियोजनाओं का धार्मिक, सामरिक एवं आर्थिक महत्व है। कहा जा रहा है कि जोशीमठ के नीचे से दरकती जमीन और बहते जल के पीछे इन दो बड़ी परियोजनाओं का अहम रोल है। लेकिन भारत के लिये जोशीमठ का धार्मिक और आर्थिक से ज्यादा सामरिक महत्व है, इसे समझना जरूरी है।
उत्तराखंड की 345 किलोमीटर लंबी सीमा चीन और तिब्बत से लगती है। इसमें से 100 किमी लंबा बार्डर चमोली जिले से लगा हुआ है। जोशीमठ चीन-तिब्बत सीमा पर भारत का आखिरी रणनीतिक शहर है। यहां से 100 किलोमीटर दूर नीति दर्रा और 50 किलोमीटर दूर माणा दर्रा है, जो चीन सीमा से लगता है। भारत के आखिरी गांव माणा जाने का भी रास्ता जोशीमठ से होकर गुजरता है। जोशीमठ की दरारों ने प्रदेश सरकार के साथ केंद्रीय रक्षातंत्र की भी परेशानी बढ़ा दी है। सड़कों पर दरार से बार्डर रोड आर्गेनाइजेशन की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं।
भारत चीन-तिब्बत सीमा पर अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिये लगातार काम कर रहा है। ऑल वेदर रोड इसी सामरिक रणनीति का हिस्सा है, जिससे किसी भी मौसम में चीन सीमा तक भारतीय सेना की पहुंच आसान हो जायेगी। जोशीमठ से चीन के साथ लगती लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी की दूरी मात्र 99 किलोमीटर है। जोशीमठ से 46 किमी दूर बाड़ाहोती ऐसी जगह है, जो एलएसी पर चीन के साथ आठ विवादित प्वाइंटों में से एक है।
बीते एक दशक में चीन बाड़ाहोती में 63 बार घुसपैठ कर चुका है। लगभग 42 वर्गकिमी में फैला बाड़ाहोती इलाका लद्दाख की तरह टफ टेरेन और बर्फ वाला है। इसकी ऊंचाई 9500 फीट है, लेकिन यहां बर्फ बहुत गिरती है, जिससे यह इलाका बेहद दुर्गम बन जाता है। चीन-तिब्बत सीमा से नजदीक होने के कारण जोशीमठ के सामरिक महत्व को देखते हुए 1962 के युद्ध के बाद भारत सरकार ने यहां अनेक सैन्य एवं अर्धसैनिक बलों की इकाइयों की तैनाती की।
एलएसी की इस दूरी को देखते हुए ही जोशीमठ में भारतीय सेना का बिग्रेड हेडक्वार्टर बनाने के साथ इंडियन तिब्बत बार्डर पुलिस का मुख्यालय भी स्थापित किया गया है। इन सैन्य इकाइयों में एक बड़ा नाम गढ़वाल स्काउट्स का है, जिसे गढ़वाल राइफल्स की एक विशिष्ट बटालियन के रूप में तैयार किया गया है। गढ़वाल स्काउट्स एक एलीट इन्फैंट्री बटालियन है, जिसे लंबे रेंज के सर्वेक्षण एवं ऊंचे स्थानों पर युद्ध करने में महारत हासिल है। इस बटालियन का मुख्यालय भी स्थायी रूप से जोशीमठ में स्थापित है।
भारतीय सेना के कामकाज के लिहाज से जोशीमठ इलाका मध्य क्षेत्र में आता है। भारतीय सेना ने यहीं पर अपना पहला हाई एल्टीट्यूड फॉरेन ट्रेनिंग नोड भी बनाया है। बीते नवंबर में जोशीमठ के पास ही औली में भारतीय और अमेरिकी सेना ने 15 दिन का संयुक्त युद्धाभ्यास किया था। जोशीमठ से बद्रीनाथ, माणा से होते हुए चीन सीमा तक जाने वाली सड़क जोशीमठ-मलारी बार्डर रोड यानी एनएच 58 पर खतरा आ गया है। इस पर चौड़ी दरारें आ गई हैं। सेना के वाहनों के मूवमेंट पर भी प्रभाव पड़ रहा है।
जोशीमठ भारत की उत्तरी अंतरराष्ट्रीय चीन-तिब्बत सीमा से पहले सर्वाधिक महत्वपूर्ण शहर है। 1962 के चीन युद्ध के बाद सरकार ने इसका विकास किया है। सेना के ब्रिगेड से लेकर अर्द्धसैनिक बलों का मुख्यालय तथा हेलीपैड का निर्माण कराया गया। सैनिक परिवारों को रहने के लिये आवास बने। शहर के महत्व को देखते हुए यहां बसावट बढ़ती चली गई। ब्रदीनाथ, हेमकुंड साहिब और औली जाने वालों के आवागमन के चलते होटल और कारोबार से जुड़े निर्माण भी बढ़ गये, जिसका दबाव अब यहां के पहाड़ नहीं सह पा रहे हैं।
जोशीमठ के धंसने के प्रमुख कारणों में एक 1976 के बाद की केंद्र और राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं, जिन्होंने मुकेशचंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में बनी 18 सदस्यीय कमेटी के सुझाव एवं रिपोर्टों को दरकिनार कर दिया था। उत्तर प्रदेश में गढ़वाल जिले के कमिश्नर रहे मुकेशचंद्र मिश्रा और उनकी कमेटी ने जोशीमठ को बचाने के लिये 1976 में एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें बताया गया था कि जोशीमठ ग्लेशियर के साथ बहकर आये भुरभुरी एवं रेतीली मिट्टी-पत्थर पर बसा हुआ है। यहां की जमीन मजबूत नहीं है।
रिपोर्ट में बताया गया था कि इसकी नींव या जड़ से छेड़छाड़ हुई तो बड़ा हादसा हो सकता है। कमेटी ने क्षेत्र में खनन एवं ब्लॉस्ट पर रोक लगाने के साथ अलकनंदा नदी के किनारे सुरक्षा वॉल बनाने तथा पेड़ लगाने का भी सुझाव दिया था, परतु किसी भी सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब जोशीमठ दरकने लगा है तब एमसी मिश्रा की रिपोर्ट की याद सिस्टम को आ रही है।
जोशीमठ में आनेवाली भूधंसाव की दरारें छावनी इलाके में भी पहुंच चुकी हैं, जो भारत की सामरिक दृष्टि के लिहाज से खतरनाक है। भू वैज्ञानिकों द्वारा जैसी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं अगर वो सच होती हैं तो भारत चीन सीमा की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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