तालिबानी अधिकारी ने कहा, कड़ी सजा और फांसी की वापसी होगी

काबुल, 24 सितंबर। मुल्ला नूरुद्दीन तुराबी तालिबान के संस्थापकों में से एक हैं और इस्लामी कानून की कठोर व्याख्या के जानकार हैं. उन्होंने कहा कि है कि अफगानिस्तान में फिर से फांसी की सजा दी जाएगी और दोषियों के हाथ काटे जाएंगे. हालांकि उन्होंने कहा कि यह सार्वजनिक तौर पर नहीं होगा. पिछली बार जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन किया था तो ऐसी सजा सार्वजनिक तौर पर दी जाती थी.

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समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस के साथ एक साक्षात्कार में मुल्ला नूरुद्दीन तुराबी ने अतीत में तालिबान की फांसी पर नाराजगी के दावे को खारिज कर दिया. पिछले शासन में फांसी की सजा स्टेडियम में दी जाती थी, जिसे देखने के लिए भारी भीड़ जमा होती थी. तुराबी ने साथ ही अफगानिस्तान के नए शासकों के खिलाफ किसी भी साजिश के लिए दुनिया को चेतावनी दी है.

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काबुल में उन्होंने कहा, "स्टेडियम में सजा के लिए सभी ने हमारी आलोचना की, लेकिन हमने उनके कानूनों और उनके दंड के बारे में कभी कुछ नहीं कहा." उन्होंने कहा, "कोई हमें नहीं बताएगा कि हमारे कानून क्या होने चाहिए. हम इस्लाम का पालन करेंगे और कुरान के आधार अपने कानून बनाएंगे."

तालिबानी शासन कैसा होगा

15 अगस्त को जब से तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और देश पर अपना नियंत्रण जमा लिया, अफगानी जनता और दुनिया यह देख रही है कि क्या वे 1990 के दशक के अंत के अपने कठोर शासन को फिर से बनाएंगे या नहीं.

तुराबी की टिप्पणियां यह बताती हैं कि कैसे तालिबान के नेता एक रूढ़िवादी और कठोर नजरिए में उलझे हुए हैं, भले ही वे वीडियो और मोबाइल फोन जैसी तकनीकों को स्वीकार कर रहे हों.

तुराबी अब 60 साल के हो गए हैं. वे तालिबान के पिछले शासन के दौरान न्याय मंत्री और तथाकथित सदाचार प्रचार एवं अवगुण रोकथाम विभाग के प्रमुख थे. उस समय दुनिया ने तालिबान द्वारा दी जाने वाली सजाओं की निंदा की थी. कठोर सजा काबुल के खेल स्टेडियम में या खुले मैदान पर दी जाती थी. सजा को देखने के लिए अक्सर सैकड़ों अफगान पुरुष आते थे.

गोली मारकर दी जाती थी सजा

सजायाफ्ता हत्यारों को आमतौर पर एक ही गोली में मार दिया जाता था. सजा को अंजाम पीड़ित परिवार देता था, जिसके पास "ब्लड मनी" लेने के बदले दोषी को जिंदा रहने देने का विकल्प होता. जो लोग चोरी के दोषी होते थे उनके हाथ काट दिए जाते थे. हाईवे पर डकैती के दोषी का एक हाथ और एक पांव काट दिया जाता था.

सुनवाई और दोषी ठहराने की प्रक्रिया शायद ही कभी सार्वजनिक होती थी और न्यायपालिका भी अक्सर इस्लामी मौलवियों के पक्ष की ओर झुकाव रखता, ऐसे मौलवियों का कानूनी ज्ञान कम और वे धार्मिक निषेधाज्ञा तक सीमित रहते थे.

तस्वीरों मेंः नया अफगानिस्तान

तुराबी कहते हैं कि इस बार जज जिनमें महिलाएं भी शामिल होंगी, मामलों का फैसला करेंगे, लेकिन अफगानिस्तान के कानूनों की नींव में कुरान होगा. उनके मुताबिक वैसी ही सजा बहाल की जाएगी.

तुराबी कहते हैं, "सुरक्षा के लिए हाथ काटना बहुत जरूरी है." इससे भय पैदा होगा. तुराबी का कहना है कि मंत्रिमंडल इसका अध्ययन कर रहा है कि सजा को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए या नहीं. उनके मुताबिक सजा के लिए एक नीति बनाई जाएगी.

एए/वीके (एपी)

Source: DW

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