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Explainer: तालिबान दो से तीन दिनों में नई दिल्ली में खोलेगा अफगान दूतावास, क्या इसका मतलब मान्यता देना है?

Afghan mission in New Delhi: अफगानिस्तान की पूर्व सरकार द्वारा संचालित दूतावास बंद होने के बाद अब तालिबान ने कहा है, कि वो अगले दो से तीन दिनों ने नई दिल्ली में अफगान दूतावास का संचालन शुरू कर देगा, जिसके बाद सवाल उठ रहे हैं, कि क्या तालिबान के डिप्लोमेट को नई दिल्ली से अफगान दूतावास को संचालन की इजाजत देना, क्या तालिबान शासन को मान्यता देना नहीं है?

तालिबान के कार्यवाहक उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई ने स्थानीय प्रसारक आरटीए के साथ एक साक्षात्कार में बुधवार को कहा, कि नई दिल्ली में अफगानिस्तान मिशन अगले "दो से तीन दिनों" में गतिविधियां फिर से शुरू करेगा।

Afghan mission in New Delhi

भारत में तालिबान का दूतावास?

तालिबान के उप-विदेश मंत्री ने कहा, कि तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान, देश सभी देशों, खासकर अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध चाहता है।

स्टैनिकजई की टिप्पणी दिल्ली में अफगान दूतावास के नियंत्रण पर विवाद के बीच आई है, जो अगस्त 2021 में तालिबान द्वारा देश में सत्ता पर कब्जा करने के बाद से चल रहा है। अफगानिस्तान का दिल्ली मिशन, पिछले शासन के तहत नियुक्त भारत के दूत फरीद मामुंडजे के नियंत्रण में था। लेकिन, इसी महीने अफगान दूतावास ने नई दिल्ली में कामकाज बंद करने की घोषणा की थी और कहा था, कि उसे जरूरी मदद नहीं मिल रही है।

स्टैनिकजई ने कहा, कि अफगान दूतावास, तालिबान-नियंत्रित विदेश मंत्रालय के नजदीकी संपर्क में है और मुंबई और हैदराबाद में अफगान वाणिज्य दूतावास सक्रिय हैं, और उसके संपर्क में हैं।

शुक्रवार को, मामुंडज़े ने नई दिल्ली मिशन को "स्थायी रूप से बंद करने" की घोषणा की थी, जिसमें इसकी छवि खराब करने और "तालिबान द्वारा नियुक्त और संबद्ध राजनयिकों की उपस्थिति और काम को उचित ठहराने के लिए राजनयिक प्रयासों में बाधा डालने" के प्रयासों का आरोप लगाया गया था।

लेकिन, उनके संदेश के कुछ घंटों बाद, मुंबई में महावाणिज्य दूत जकिया वारदाक और हैदराबाद में कार्यवाहक महावाणिज्य दूत सैयद मोहम्मद इब्राहिमखिल ने मिशन के अपने "संयुक्त नेतृत्व" की घोषणा की और सभी से पूर्व अफगान राजनयिकों द्वारा "गैर-पेशेवर" मैसेज को "अनदेखा" करने का आग्रह किया।

स्टैनिकजई ने कहा, कि अफगान राजनयिकों के लिए वीजा विस्तार पर भारत सरकार के साथ मुद्दों की वजह से दूतावास बंद कर दिया गया था। उन्होंने कहा, इन चुनौतियों के बावजूद, तालिबान का लक्ष्य जल्द ही मिशन में पूर्ण राजनयिक प्रतिनिधित्व बहाल करना है।

क्या भारत-तालिबान में मजबूत हुए संबंध?

वहीं, द प्रिंट की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि जब ब्रिटेन में रहने वाले मामुंडजे से इस बाबत सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, कि "उन्होंने लगातार इस बात पर जोर दिया है, कि तालिबान और वर्तमान भारत सरकार के बीच संबंध विशेष रूप से दिसंबर 2022 से मजबूत हुए हैं।"

उन्होंने कहा, कि "यह रिश्ता आपसी स्वार्थ से प्रेरित प्रतीत होता है, तालिबान भूराजनीतिक संतुलन, आर्थिक सहायता और मान्यता के लिए दिल्ली के समर्थन की मांग कर रहा है, जबकि दिल्ली, सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के लिए तालिबान के समर्थन को महत्व देती है, भले ही ये नैतिक और सैद्धांतिक विचारों की कीमत पर दुख की बात है।"

उन्होंने कहा, कि भारत चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के भू-राजनीतिक संदर्भ में तालिबान के समर्थन को महत्व देता है।

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की फिलहाल इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है, कि तालिबान से संपर्क करना अब भारत के हितों में है, क्योंकि चीन अफगानिस्तान में पांव पसार रहा है और आतंकवाद के किसी खतरे को दूर रखने के साथ साथ मध्य एशिया से जुड़ाव में तालिबान भारत के लिए अहम भूमिका निभा सकता है।

अफगान दूतावास विवाद क्या है?

अफगानिस्तान दूतावास को लेकर विवाद पहली बार मई में शुरू हुआ था, जब तालिबान ने व्यापार सलाहकार कादिर शाह को प्रभारी नियुक्त किया था। शाह ने ममुंडज़े की अनुपस्थिति में दूतावास पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया था, लेकिन असफल रहे, और बाद में उनके "दूतावास परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया।"

लेकिन, एक अक्टूबर को मामुंडज़े ने पहली बार अन्य कारणों के अलावा भारत सरकार से समर्थन की कमी का हवाला देते हुए 1 अक्टूबर को नई दिल्ली में अफगानिस्तान दूतावास को बंद करने की घोषणा की थी।

यह सितंबर में मिशन द्वारा अपने स्थानीय कर्मचारियों को बर्खास्त करने के तुरंत बाद आया।

अफगान महावाणिज्य दूत ने तब दूतावास बंद करने पर राजदूत के बयान को "अस्वीकार" किया था और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के साथ व्यापक बैठकें की थीं।

शनिवार को, अफगान मिशन ने कहा, कि "23 नवंबर तक, भारत में पूर्व गणराज्य का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई अफगान राजनयिक नहीं है"।

लेकिन, अब स्टैनिकजई ने संयुक्त राष्ट्र से अफगानिस्तान की सीट तालिबान शासित इस्लामी अमीरात अफगानिस्तान को सौंपने का भी आग्रह किया, और देश के बारे में आयोजित बैठकों में इसके प्रतिनिधियों को आमंत्रित करने का आह्वान किया। आपको बता दें, कि अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन को अभी तक अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है।

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