अफगानिस्तान में नई जुगलबंदी: भारत ने UAE में तालिबान के राजदूत को रिपब्लिक डे पर बतौर गेस्ट किया आमंत्रित

Taliban envoy is Republic Day guest: संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय दूतावास ने अबू धाबी में गणतंत्र दिवस समारोह के लिए तालिबान के दूत बदरुद्दीन हक्कानी को बतौर गेस्ट आमंत्रित किया है, जिसके बाद सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या अफगानिस्तान में भारत नई जुगलबंदी कर रहा है?

आपको बता दें, कि तालिबान के दूत बदरुद्दीन हक्कानी, जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे हैं, जिन्हें अक्टूबर 2023 में यूएई में बतौर राजदूत नियुक्त किया गया था और दूत बदरुद्दीन हक्कानी के भाई का नाम सिराजुद्दीन हक्कानी है, जो अफगानिस्तान के गृहमंत्री हैं।

Taliban envoy is Republic Day guest

सिराजुद्दीन हक्कानी वो शख्स हैं, जिन्होंने हक्कानी नेटवर्क की स्थापना की थी, और जो साल 2008 में काबुल में भारतीय दूतावास में हुए आतंकवादी हमले में शामिल था। हक्कानी नेटवर्क, तालिबान के साथ मिलकर अफगानिस्तान में शासन करता है, जिसपर अमेरिका ने करोड़ों डॉलर का इनाम रखा हुआ है। सिराजुद्दीन हक्कानी पर कई बम धमाकों को अंजाम देने का आरोप रहा है।

संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय राजदूत संजय सुधीर के नाम से जारी निमंत्रण की एक प्रति अफगान पत्रकार बिलाल सरवरी ने ट्वीट की है, जो अब अफगानिस्तान से बाहर रहते हैं। वहीं, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में तालिबान के राजदूत को आमंत्रण किए जाने की पुष्टि की गई है।

तालिबान को क्यों भेजा गया होगा आमंत्रण?

अफगानिस्तान में तालिबान शासन अब एक सच्चाई है और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। इसके अलावा, काबुल में तालिबान के साथ इंगेजमेंट के बाद ही भारत ने अपनी तकनीकी टीम को काबुल में तैनात किया है। सूत्रों ने कहा है, कि बदरुद्दीन हक्कानी को आमंत्रण भेजा जाना उसी दृष्टिकोण के अनुरूप है।

सूत्रों ने कहा है, कि निमंत्रण "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान" के दूत को संबोधित था। तालिबान खुद को "अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात" के रूप में दर्शाता है; "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान" का प्रतिनिधित्व तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी ने किया था।

इस मुद्दे पर सावधानी से आगे बढ़ते हुए, भारत काबुल में तालिबान के साथ बातचीत कर रहा है, लेकिन अभी तक तालिबान शासन को राजनयिक मान्यता नहीं दी है।

भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समान ही टेम्पलेट का पालन कर रही है - वे तालिबान के साथ जुड़े हुए हैं, लेकिन उन्हें संयुक्त राष्ट्र के अनुसार आधिकारिक मान्यता नहीं दी गई है।

इसके अलावा, मुंबई और हैदराबाद में अफगानिस्तान के महावाणिज्य दूत ने पिछले साल नवंबर में घोषणा की थी कि वे नई दिल्ली में अफगान दूतावास को खुला और कार्यात्मक रखेंगे। ये बयान उस वक्त आया था, जब नई दिल्ली दूतावास के राजदूत फरीद मामुंडजे ने दूतावास को बंद करने की घोषणा की थी। राजदूत फरीद मामुंडजे को पूर्ववर्ती अशरफ गनी की सरकार ने बहाल किया था, जो अब लंदन में रह रहे हैं।

भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से बार बार साफ किया गया है, कि तालिबान को मान्यता देने की उसकी कोई योजना नहीं है, लेकिन वो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के मुताबिक ही तालिबान से इंगेज कर रहा है।

वहीं, चीन ने पिछले साल तालिबान के राजदूत का बीजिंग दफ्तर में स्वागत किया है और ऐसा करने वाला वो पहला देश बना था। माना जा रहा है, कि चीन की योजना आगे जाकर तालिबान शासन को मान्यता देने की है, और चीन के ऐसा करके ही पाकिस्तान और रूस भी तालिबान को मान्यता दे सकते हैं, और ये स्थिति भारत के लिए जटिल स्थिति बनाती है, क्योंकि इस क्षेत्र में अफगानिस्तान से संपर्क खत्म नहीं किया जा सकता है।

इसके अवाला, भारत ने नई दिल्ली में अफगानिस्तान दूतावास के सामने तीन शर्तें रखी हुई हैं।

पहली शर्त है, कि अफगानिस्तान की नई नेतृत्व टीम को 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान' का ही झंडा फहराना होगा। यानि, जो झंडा पहले अफगानिस्तान का था, उसे ही फहराना होगा। तालिबान का झंडा भारत में मौजूद अफगान दूतावास को नहीं फहराया जा सकता है।

दूसरा, अफगान दूतावास तालिबान के इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान के बजाय पुराने नामकरण - इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान का उपयोग करना जारी रखेगा।

तीसरा, तालिबान शासन के नए राजनयिकों को दिल्ली में अफगान दूतावास या मुंबई और हैदराबाद में वाणिज्य दूतावासों का हिस्सा बनने के लिए नहीं भेजा जाएगा।

ऐसा माना जा रहा है, कि भारत ने नये रेड लाइंस से तालिबान की नई नेतृत्व टीम को अवगत करा दिया है और अफगान महावाणिज्यदूत ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को आश्वासन दिया है, कि वे इन नियमों का पालन करेंगे।

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