तालिबान सरकार को मान्यता दे सकता है चीन.. राष्ट्रपति के कार्यक्रम में राजदूत का किया जोरदार स्वागत
China recognise Taliban Envoy: चीन की राजधानी बीजिंग में 30 जनवरी को चीनी सरकार की तरफ से आयोजित एक आधिकारिक समारोह में, राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपने परिचय पत्र प्रस्तुत करने के लिए विदेशी राजनयिकों की कतार लगी हुई थी।
इस कार्यक्रम में दुनियाभर के 309 राजनयिक शामिल थे, जिननमें से एक अप्रत्याशित भागीदार था।
दो साल से ज्यादा की बातचीत के बाद, चीन ने तालिबान के पूर्व प्रवक्ता बिलाल करीमी को बीजिंग में आधिकारिक दूत के रूप में मान्यता दी और साल 2021 के अगस्त में अफगानिस्तान पर कब्जा करने वाले तालिबान को मान्यता देने वाला चीन, दुनिया का पहला देश बन गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने साल 2021 में अफगानिस्तान से सेना वापस बुला लिया, जिससे पश्चिम समर्थित अफगान सरकार का पतन हो गया और तालिबान के सत्ता में लौटने का मार्ग खुल गया। अमेरिका के लौटने के बाद से चीन, निवेश और परियोजनाओं के माध्यम से अफगानिस्तान में घुसपैठ कर रहा है।
जैसे ही 30 जनवरी को बीजिंग में तालिबान को औपचारिक रूप से स्वीकार करने की खबर फैली, चीनी विदेश मंत्रालय ने तुरंत एक बयान जारी किया, जिसमें स्पष्ट किया गया, कि राजनयिक साख की स्वीकृति बीजिंग द्वारा अफगानिस्तान के वर्तमान शासकों की आधिकारिक मान्यता का संकेत नहीं है।
लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि चीन अब तालिबान को मान्यता दे चुका है।
विश्लेषकों का कहना है, कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यक्रम में तालिबान के राजदूत का पहुंचना, बीजिंग में तालिबान शासन को मान्यता मिलना है और बीजिंग का ये कदम तालिबान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल करना है, जो अपनी सरकार के लिए वैश्विक मान्यता हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
सत्ता संभालने के बाद से, तालिबान अभी तक अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर अलग-थलग रहा है। खास तौर पर महिलाओं के तमाम अधिकार छीनने को लेकर तालिबान के खिलाफ दुनियाभर में गुस्सा है। जिसका गंभीर असर अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।
लेकिन चीन ने करीमी को बीजिंग में तालिबान के दूत के रूप में क्यों मान्यता दी और तालिबान के लिए इसका क्या मतलब है? आइये समझते हैं।
अफगानी खजाने पर चीन की नजर
ऐसे वक्त में, जब तालिबान को किसी भी देश से मान्यता नहीं मिली है, चीन के राष्ट्रपति के कार्यक्रम में पहुंचना तालिबान के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत है, लेकिन चीन ने ऐसा अनजाने में नहीं किया है।
2023 में, कई चीनी कंपनियों ने तालिबान सरकार के साथ कई व्यापारिक सौदों पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें से सबसे लंबा समझौता 25 सालों के लिए कई मिलियन डॉलर्स का तेल समझौता है। जिसका अनुमानित निवेश मूल्य पहले वर्ष में 150 मिलियन डॉलर और अगले तीन वर्षों में 540 मिलियन डॉलर तक है।
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के शोधकर्ता जियायी झोउ ने कहा, इस रिश्ते का एक इतिहास है।
अलजजीरा की एक रिपोर्ट में जियायी झोउ ने कहा, कि "तालिबान चीनी सरकार के लिए कोई अज्ञात इकाई नहीं है, जो 1990 के दशक के अंत में जब एक अछूत सरकार थी, तब उन्होंने उन तक पहुंच बनाई और एक विद्रोही समूह के रूप में तालिबान के साथ कामकाजी संबंध बनाए रखा।"
एक्सपर्ट्स का मानना है, कि अफगानिस्तान की धरती में जो दुर्लभ धातुएं छिपी हैं, चीन उस तक पहुंचना चाहता है, ताकि ताइवान पर उसके आक्रमण के बाद अगर अमेरिकी प्रतिबंध लगे, तो देश उस प्रतिबंध को बेअसर कर सके।
अफगानिस्तान में दुर्लभ धातुओं का भंडार
अफगानिस्तान में अकूत मात्रा में लोहा, तांबा, कोबाल्ट, सोना के अलावा औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण लिथियम और नाइओबियम के विशालकाय खनिज मौजूद है। ये ऐसे खनिज हैं, जो रातों रात किसी भी देश की तकदीर को हमेशा के लिए बदल सकते हैं।
इन सब खनिजों में से लिथियम की मांग के कारण अफगानिस्तान को 'सऊदी अरब' भी कहा जाता है। दरअसल, लैपटॉप और मोबाइल की बैटरी में लिथियम का इस्तेमाल होता है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने 2021 में कहा था कि अफगानिस्तान का लिथियम सऊदी अरब बन जाएगा।
जलवायु परिवर्तन को देखते हुए यह तय है कि आने वाले वक्त में जीवाश्म ईंधन की जगह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग काफी ज्यादा बढ़ने वाली है। ऐसे में लिथियम जैसे खनिजों की भारी मौजूदगी अफगानिस्तान की किस्मत हमेशा हमेशा के लिए बदल सकती है, बशर्ते उसका सही तरीके से इस्तेमाल है और वो इस्तेमाल अफगानिस्तान के अंदर बनने वाली सरकार करे। उसपर किसी बाहरी शक्ति का नियंत्रण ना हो।
चीन उस खजाने को हासिल करने के लिए करीब 62 अरब डॉलर की बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत अफगानिस्तान तक सीपीसी यानि चीन पाकिस्तान कॉरिडोर का विस्तार करने की कोशिश काफी तेज कर दी है और इसके लिए उसे तालिबान की मदद चाहिए। एक बार अगर बेल्ट एंड रोड परियोजना बन जाता है, तो फिर अफगानिस्तान की खनिज संपदा को चीन के हाथ में जाने से कोई नहीं रोक सकता है। क्योंकि, सब जानते हैं कि अफगानिस्तान के अंदर मची लड़ाई का फायदा उठाने में चीन कोई कमी नहीं करेगा।












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