तालिबान को घास डालने के मूड में नहीं है भारत, अफगान दूतावास विवाद पर रखी तीन कड़ी शर्तें, नीति से समझौता नहीं!
India-Afghan Embassy News: मुंबई और हैदराबाद में अफगानिस्तान के महावाणिज्य दूत ने घोषणा की, कि वे नई दिल्ली में अफगान दूतावास को ओपन और फंक्शनल रखेंगे, जबकि नई दिल्ली स्थिति अफगान दूतावास के बंद होने की घोषणा भारत में अपदस्थ अफगान सरकार के राजदूत फरीद ममुंडजे ने की थी। जिसके बाद तालिबान के उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद स्टनिकजई ने कहा, कि तालिबान जल्द ही नई दिल्ली में अपने दूत को भेजेगा।
लेकिन, भारत सरकार का रूख तालिबान को घास डालने पर नहीं है और ऐसी रिपोर्ट है, कि भारत ऐसे कोई संकेत नहीं देना चाहता है, जिससे पता चले, कि नई दिल्ली से तालिबान को मान्यता मिल सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत तीन ऐसे शर्तों के साथ अफगान दूत को नई दिल्ली में नियुक्ति देना चाहता है, जो किसी भी तरह से भारत द्वारा तालिबान शासन की वास्तविक मान्यता देने के बराबर नहीं होगा।

भारत की तीन शर्तें क्या हैं?
भारत की पहली शर्त ये है, कि नई नेतृत्व टीम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान का तिरंगा झंडा ही भारत में इस्तेमाल करेगी, यानि अफगानिस्तान का पुराना झंडा। और किसी भी तरह से तालिबान के सफेद झंडे को दफ्तर में लगाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
दूसरी शर्त ये है, कि अफगान दूतावास, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के नाम का ही उपयोग करना जारी रखेगा, न कि इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान, जो तालिबान का दिया हुआ नया नाम है। पुराने नाम की ही उपयोग भारत सरकार के साथ उनके आधिकारिक संचार, नोट वर्बेल और अन्य स्टेशनरी में उनके लेटरहेड के हिस्से के रूप में किया जाएगा।
और भारत की तीसरी शर्त ये है, कि तालिबान शासन के नए राजनयिकों को दिल्ली में अफगान दूतावास या मुंबई और हैदराबाद में वाणिज्य दूतावासों का हिस्सा बनने के लिए नहीं भेजा जाएगा।
माना जा रहा है, कि है कि साउथ ब्लॉक ने (भारतीय विदेश मंत्रालय) नई नेतृत्व टीम को भारत की रेडलाइन से अवगत करा दिया है और अफगान महावाणिज्यदूत ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को आश्वासन दिया है, कि वे इन नियमों का पालन करेंगे।
भारत सरकार उसी टेम्पलेट का पालन कर रही है, जिसका अनुसरण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय कर रहा है, कि वे तालिबान के साथ जुड़े तो हुए हैं, लेकिन उन्हें संयुक्त राष्ट्र के अनुसार आधिकारिक मान्यता नहीं दी गई है।
भारत के लिए मामला अहम क्यों है?
यह तब बहुत प्रासंगिक हो गया, जब मुंबई में अफगानिस्तान के महावाणिज्यदूत जकिया वारदाक और हैदराबाद में कार्यवाहक महावाणिज्यदूत सैयद मोहम्मद इब्राहिमखिल ने 24 नवंबर को एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया, कि दिल्ली में दूतावास "हमेशा की तरह काम करता रहेगा और कांसुलर सेवाओं के प्रावधान में कोई व्यवधान नहीं होगा।" ऐसा मामुंडज़े द्वारा दिल्ली में दूतावास को स्थायी रूप से बंद करने की घोषणा के बाद हुआ था।
दरअसल, अफगानिस्तान में तालिबान शासन की वापसी के बाद, पिछले दो वर्षों में अफगानिस्तान की पिछली सरकार के राजदूत मामुंडज़े और उनकी 28 राजनयिकों की टीम ने एक-एक करके भारत छोड़ दिया है और पश्चिम देशों में शरण ले ली। मामुंडज़े खुद इस साल जून में लंदन में जाकर रहने लगे और वहीं से भारतीय दूतावास चला रहे थे।
तालिबान ने जब काबुल पर कब्ज़ा कर लिया, उसके बाद मामुंडज़े ने सभी प्रमुख पश्चिमी दूतावासों से संपर्क किया था, कि उनके राजनयिकों को शरण की आवश्यकता होगी। मामुंडज़े इस साल जून में भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए और वापस नहीं लौटे।

लिहाजा, भारत को अब ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जहां पिछली सरकार के दो राजनयिक, मुंबई महावाणिज्य दूतावास जकिया वारदाक और हैदराबाद महावाणिज्य दूतावास सैयद मोहम्मद इब्राहिमखिल ने भारत में ही रहने का विकल्प चुना और अब, वे स्वेच्छा से अफगान मिशन को चलाने के लिए नेतृत्व की भूमिका निभा रहे हैं।
नई दिल्ली दूतावास को बंद करने की जब घोषणा मामुंडज़े ने की, तो उसके फौरन बाद उन दोनों प्रतिनिधियों ने बयान जारी कर कहा, कि मुंबई और हैदराबाद महावाणिज्य दूतावास, नई दिल्ली दूतावास को अपने नियंत्रण में ले रहा है।
चूंकि, भारत में अफगान नागरिकों को पासपोर्ट नवीनीकरण और वीजा विस्तार जैसी कांसुलर सेवाओं के संदर्भ में सुविधा की आवश्यकता है, इसलिए दोनों राजनयिक इन कार्यों के लिए काबुल में तालिबान द्वारा संचालित विदेश मंत्रालय और नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के साथ बातचीत कर रहे हैं। लिहाजा, भारत ने एक सीमा रेखा खींच दी है, कि दोनों दूतावास, अफगान गणराज्य के पुराने झंडे को फहराने और भारत में अफगान दूतावास और वाणिज्य दूतावासों का नाम नहीं बदलने की प्रतिबद्धता का पालन करें। यानि, भारत सावधानी से कदम उठा रहा है और उन्हें तालिबान प्रतिनिधियों का लेबल नहीं दे रहा है।
यानि, जो भी अफगान अधिकारी हैं, या आएंगे, वो भारत में अफगान राजनियक कहे जाएंगे, ना कि तालिबान शासन के राजदूत।
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