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भारी बारिश और भीषण बाढ़ की बढ़ती घटनाओं पर जानिए क्या कहते हैं IPCC के वैज्ञानिक

बेंगलुरु। इस मॉनसून में महाराष्‍ट्र, राजस्थान, मध्‍य प्रदेश, बिहार समेत कई प्रदेशों से भारी बारिश के बाद बाढ़ की खबरें आ रही हैं। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्र यानि क‍ि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं के वीडियो आपने सोशल मीडिया पर जरूर देखे होंगे। यही नहीं कैलीफोर्निया के जंगल इस वक्त भी आग से झुलस रहे हैं, हाल ही में जापान में बादल फटने और जर्मनी में भारी बारिश के बाद तबाही का मंजर भी हमने देखा। इस प्रकार की तमाम प्राकृतिक घटनओं का गहन अध्‍ययन करने वाले आईपीसीसी के वर्किंग ग्रुप-1 ने अपनी रिपोर्ट सोमवार को जारी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हीटवेव यानि कि गर्म हवाओं के दुष्‍प्रभाव भारत समेत पूरे एशिया में जारी हैं। यही नहीं दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों पर पड़ रहे प्रभावों के बारे में भी रिपोर्ट में चर्चा की गई।

Flood in India

संयुक्त राष्‍ट्र से संबद्ध इंटर गवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की सिक्थ असेसमेंट साइकिल के वर्किंग ग्रुप-1 ने बीते 6 अगस्त को अपना अध्‍ययन पूरा किया और आज एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के अनुसार 1980 के बाद से समुद्र की ओर से उठने वाली हीटवेव यानि गर्म हवाओं का सिलसिला तेज़ हो गया है, जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण मानवजाति की गतिविधियां हैं। खास बात यह है कि इन गर्म हवाओं का सबसे अधिक प्रभाव 2006 के बाद से देखने को मिला है।

आईपीसीसी के पांचवें असेसमेंट में भी इस बात के लिए आगाह किया गया था कि हीटवेव के कारण मौसम में असामान्य बदलाव हुए हैं। पांचवें चक्र की रिपोर्ट 2014 में जारी हुई थी। उस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि दुनिया के कई देशों में बादल फटने, एक ही स्थान पर भारी बारिश, सूखा पड़ने, बहुत अधिक गर्मी पड़ने और समुद्र तटों पर चक्रवातों का प्रभाव पहले से अधिक होगा।

Germany Flood

सच पूछिए तो बीते वर्षों में ठीक वैसा ही हुआ, जैसा कि आईपीसीसी के वैज्ञानिकों ने 2014 में कहा था। भारत की बात करें तो 2015 में चेन्नई में भारी बारिश के बाद तबाही का मंजर बेहद भयावह था। 2018 में केरल की बाढ़ को कोई नहीं भूल सकता। और तो और 2019 में चक्रवात वायु और फानी, 2020 में निसर्ग और फिर अम्‍फान को कोई नहीं भूल सकता। खास बात यह है कि 2013 के फालिन से लेकर 2021 के अम्फान तक के चक्रवातों को गौर से देखें, तो आप पायेंगे कि भारतीय महासागर, बंगाल की खाड़ी या फिर अरब सागर से उठने वाले चक्रवातों की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। और यह हम सब जानते हैं कि जितनी अधिक तीव्रता उतना अधिक नुकसान।

पहाड़ पर ग्लेशियरों की बात करें तो इस वर्ष फरवरी में उत्तराखंड के चमोली जिले में जब पहाड़ का बड़ा भाग ग्लेशियर के साथ टूटा तो ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदी का जलस्तर तेज़ी से बढ़ा और चमोली जिले के कई इलाके जलमग्न हो गये। नंदादेवी ग्लेशियर के टूटने की इस घटना में 83 लोगों की मौत हुई थी।

आईपीसीसी के प्रथम समुह ने एक बार फिर से आने वाली चुनौतियों के लिए आगाह किया है। आज जारी हुई रिपोर्ट जिसका शीर्षक, "क्लाइमेट चेंज 2021: द‍ि फिज़‍िकल साइंस बेसिस" है, में कहा गया है कि पूरे एशिया में ऐसी घटनएं अब पहले से अधिक तीव्र होंगी।

हीटवेव और साइक्लिोन की तीव्रता पर रिपोर्ट में खास टिप्पणी

हीटवेव और साइक्लिोन की तीव्रता पर रिपोर्ट में खास टिप्पणी

पृथ्‍वी के अधिकांश भागों में गर्म हवाओं का प्रभाव अब बढ़ने लगा है और आगे भी बढ़ेगा। यह प्रभाव उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका के पश्चिम और दक्षिण पूर्वी भाग, रूस, साइबेरिया और पूरे एशिया में दिखेगा। इनमें से कुछ जगहों पर तो तापमान बीते वर्षों की तुलना में बहुत अधिक गर्म होने की संभावना है।

दक्षिण अफ्रीका के उत्तर पूर्व भाग, मेडिटरेनियन, दक्षिणी ऑस्‍ट्रेलिया, उत्तरी अमेरिका का पश्चिमी भाग जहां अब तक बहुत कम सूखा पड़ता था, आने वाले समय में सूखे की चपेट में आ सकते हैं।

निकटतम वर्षों में उत्तरी यूरोप, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अफ्रीका में भारी बारिश होगी। वैज्ञानिकों ने कहा कि एशिया, अमेरिका और अन्य स्थानों पर बारिश का आंकलन करने के लिए और डाटा की जरूरत होगी।

बीते 40 वर्षों में बढ़े समुद्री तूफान

बीते 40 वर्षों में बढ़े समुद्री तूफान

वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले 40 वर्षों में 3 से 5 श्रेणी के समुद्री चक्रवातों में वृद्ध‍ि दर्ज हुई है। जलवायु को नुकसान पहुंचाने वाली जितनी अधिक गतिविध‍ियां होंगी, चक्रवातों की तीव्रता उतनी अधिक बढ़ेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले समय में चक्रवात और भी अधिक तीव्र होंगे, उतनी ही अधिक बारिश होगी उतनी ही तेज़ हवाएं चलेंगी और तटीय क्षेत्रों में उतना ही अधिक नुकसान होगा। इसके लिए समुद्री तटों से लगे देशों की सरकारों को पहले से योजनाएं बनानी होंगी।

वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में कहा कि पृथ्‍वी के तापमान में हो रही छोटी से छोटी वृद्ध‍ि भी बड़े खतरे का संकेत है। तापमान में प्रत्येक डिग्री की वृद्ध‍ि से बाढ़ और आग की घटनाओं में वृद्धि‍ होगी। और तो और अधिकतम तापमान का असर हर व्‍यक्ति पर पड़ेगा।

इस रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण तथ्‍य यह है कि पृथ्‍वी पर हीटवेव, सूखा और असामान्य बारिश का एक साथ होना सामान्य बात नहीं है। और इन सबमें वृद्ध‍ि जारी रहेगी अगर सभी देश एक जुट होकर पेरिस समझौते की शर्तों पर अमल नहीं करेंगे।

क्या है पेरिस समझौते का टेम्परेचर टार्गेट?

क्या है पेरिस समझौते का टेम्परेचर टार्गेट?

वैज्ञानिकों के अनुसार इस सदी के अंत तक पृथ्‍वी के औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्ध‍ि दर्ज होगी। अगर ऐसा हुआ, तो संपूर्ण पृथ्‍वी विनाश की ओर बढ़ जाएगी। इस वृद्ध‍ि को रोकने के लिए संयुक्त राष्‍ट्र के तमाम सदस्य देशों ने पेरिस समझौते पर हस्‍ताक्षर किए हैं, जिसका मुख्‍य लक्ष्‍य तापमान में वृद्ध‍ि को 1.5 सेल्सियस तक रोकना है। इसे रोकने के लिए कार्बन का उत्सर्जन शून्‍य तक लाना होगा। कार्बन डाइऑक्साइड व अन्‍य ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को बढ़ने से रोकना होगा।

आईपीसीसी से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हम उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर तक ले जाने में कामयाब हुए तो इस सदी के अंत तक वृद्ध‍ि को 1.5 डिग्री तक सीमित कर सकते हैं। हालांकि 2021 से 2040 के बीच तापमान में पहले की तुलना में बहुत अधिक वृद्ध‍ि दर्ज होगी, उसके बाद तापमान कम होना शुरू होगा। ऐसा अनुमान वैज्ञानिकों का है।

विशेषज्ञों ने कहा जी20 देशों को गियर बदलने की जरूरत

विशेषज्ञों ने कहा जी20 देशों को गियर बदलने की जरूरत

क्लाइमेट ऐक्शन एंड फाइनेंस के लिए संयुक्त राष्‍ट्र के उच्चायुक्त मार्क कार्ने ने आईपीसीसी की इस रिपोर्ट पर कहा है कि वैज्ञानिकों ने जिन बातों का उल्लेख इस रिपोर्ट में किया है, वो वाकई में चिंताजनक हैं। अब वो दिन आ गया है जब सभी देशों की सरकारों को कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले, नीतियां बनाने से पहले या फिर वित्तीय फैसला लेने से पहले वैज्ञानिकों की सलाह को ध्‍यान में रखना होगा। आईपीसीसी की रिपोर्ट नीति निर्धारकों को गंभीरता से पढ़ने की जरूरत है। कार्बन उत्सर्जन को रकने के लिए जरूरी कदम तुरंत उठाने की जरूरत है।

वहीं आईसीसीसीएडी के निदेशक एवं आईआईईडी के सीनियर एसोसिएट प्रो. सलीम-उल-हक ने कहा कि आईपीसीसी की इस रिपोर्ट ने पर्यावरण को बचाने के दावों के उस गुब्बारे को फोड़ दिया है, जो तमाम देशों की सरकारों ने किया। अब समय आ गया है जब जी20 देशों को गियर बदलने की जरूरत है। अब उन्हें अपने संकल्‍पों को दोहराने और उन पर अमल करने की जरूरत है, जो उन्‍होंने पृथ्‍वी के लिए लिये हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों की सलाह से दूर भागना आत्महत्‍या करने जैसा है, क्योंकि वे जो कह रहे हैं वो पूरी तरह क्रिस्टल क्लियर है और बढ़ते तापमान के प्रभाव हम देख भी रहे हैं।

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