ताइवान के मुद्दे पर बाइडन-जिनपिंग में तनातनी, क्या हैं भारत के लिए संकेत?
अमेरिका और चीन ने ताइवान को लेकर एक दूसरे को चेतावनी दी है. शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से फ़ोन पर दो घंटे बीस मिनट लंबी बातचीत की है.
व्हाइट हाउस के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच सीधी और स्पष्ट बातचीत हुई. दोनों के बीच अमेरिका-चीन रिश्तों, आपसी मतभेद दूर करने और साझा हितों के मुद्दे पर काम करने की संभावना तलाशने समेत रूस-यूक्रेन युद्ध, युद्ध का वैश्विक असर, स्वास्थ्य और कई मुद्दों को लेकर बात हुई.
दोनों नेताओं की फोन कॉल के बारे में जानकारी देते हुए व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरीन शॉन पिएर ने कहा, "दोनों के बीच स्पष्ट बातचीत हुई. बाइडन करीब चार दशकों से शी जिनपिंग को जानते हैं. राष्ट्रपति बार-बार कहते रहे हैं कि नेताओं को सीधे बातचीत करनी ही चाहिए."
इस अहम कॉल में किन मुद्दों पर चर्चा हुई?
व्हाइड हाउस की तरफ़ से बताया गया है-
बाइडन ओवल हाउस में थे, उसके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन, प्रमुख डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन फिनर, विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, इंडो पैसिफिक कोऑर्डिनेटर कर्ट कैंपबैल और सीनीयर डायरेक्टर लॉरा रोज़ेनबर्गर थीं.
दोनों नेताओं के बीच उन मुद्दों पर बात हुई जिन पर दोनों नेताओं के साथ काम करने की संभावना है. जैसे जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और ड्रग्स का काम रोकने जैसे मुद्दे.
रूस यूक्रेन युद्ध और पूरी दुनिया पर पड़ रहे इसके असर पर भी दोनों नेताओं ने चर्चा की.
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ताइवान पर तनाव और चेतावनी
दोनों नेताओं के बीच ताइवान के मुद्दे पर भी बात हुई. बाइडन ने कहा कि वो वन चाइना पॉलिसी का सम्मान करते हैं.
लेकिन दोनों के बीच ताइवान को लेकर जो तनाव है वो बातचीत के दौरान दिखा. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा है कि ताइवान के मुद्दे पर शी जिनपिंग ने बाइडन को चेतावनी दी है.
मीडिया से बात करते हुए झाओ लिजियान ने कहा, "ताइवान के सवाल पर चीनी सरकार और लोगों की राय हमेशा से एक रही है. डेढ़ अरब चीनी नागरिकों का मानना है कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखे जाना चाहिए. आम नागरिकों की राय का सम्मान ज़रूरी है. जो लोग आग से खेलते हैं वो एक दिन तबाह हो जाते हैं. हमें उम्मीद है कि अमेरिका को इसकी जानकारी होगी."
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अमेरिका की हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेन्टेटिव नैन्सी पेलोसी के अगस्त में प्रस्तावित ताइवान दौरे को लेकर चीन पहले भी नाराज़गी जता चुका है. वो मानता है कि ताइवान चीन का हिस्सा है.
अमेरिका और चीन के बीच किन मुद्दों को लेकर तनाव है-
ट्रेड वॉर- दोनों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर आयात कर बढ़ाया है. हाल के सालों में एक-दूसरे पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए हैं.
समंदर में बढ़ता चीन का प्रभाव- दक्षिण चीन सागर में चीन के पैर फैलाने से अमेरिका और पश्चिमी मुल्क नाराज़ हैं. इसे लेकर कई बार दोनों के बीच तनाव चेतावनी तक भी बढ़ा है.
चीन की घेराबंदी- अमेरिका पेसिफिक के देशों के साथ संबंध बढ़ाना चाहता है. यहां वो अपने सहयोगी ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को रोकने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया के बीच हाल में ऑकस सुरक्षा गठबंधन बना है.
मानवाधिकार उल्लंघन- अमेरिका चीन पर वीगर अल्पसंख्यक मुसलमानों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाता है, हालांकि चीन इससे इनकार करता रहा है.
चीनी सरकार का कहना है कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत का प्रस्ताव अमेरिका ने दिया था. लेकिन चीन के साथ कई मुद्दों पर तनाव के बावजूद अमेरिका बातचीत के लिए आगे क्यों आया?
विदेशी मामलों के जानकार हर्ष पंत कहते हैं, "पहले ऐसा माना जा रहा था कि ट्रंप प्रशासन की वजस से अमेरिका और चीन के रिश्ते ख़राब हुए. लेकिन अब बाइडन प्रशासन ने भी अमेरिका की चीन नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है. अमेरिका और चीन के बीच तनाव के जो मुद्दे हैं वो बने हुए हैं, चाहें वो ताइवान हों, दक्षिण चीन सागर में बढ़ता चीन का प्रभाव हो या फिर दोनों देशों के बीच चल रहा ट्रेड वॉर हो."
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "ये फ़ोन कॉल किसी हद तक इस बात को ध्यान में रखकर किया गया है कि क्या इन संबंधों को सुधारा जा सकता है बगैर हालात और तनावपूर्ण किए. क्योंकि ख़तरा ये मंडरा रहा है कि कहीं ताइवान को लेकर कोई बड़ी गलतफ़हमी ना हो जाए और कोई क़दम ना उठ जाए और अमेरिका और चीन आमने-सामने आ जाएं. ऐसी किसी भी परिस्थिति को संभालने के लिए बाइडन प्रशासन को ये लग रहा है कि उसे चीन से बातचीत करनी चाहिए."
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत मानते हैं कि नेंसी पलोसी की आगामी ताइवान यात्रा दोनों देशों के बीच तनाव को और भी बढ़ा सकती है.
पंत कहते हैं, "ये देखना होगा कि क्या पलोसी ताइवान जाती हैं और फिर चीन उस पर क्या प्रतिक्रिया देता है. अमेरिका के लिए एक अहम राजनीतिक मुद्दा बन गया है. ताइवान और अन्य सहयोगी देशों की नज़र इस यात्रा पर है. ख़ासकर ताइवान अमेरिका की तरफ़ देख रहा है. अगर पलोसी नहीं जाती हैं तो ताइवान को ये संकेत जाएगा कि वो आगे अमेरिका पर भरोसा करे या नहीं. ये ताइवान के अस्तित्व का सवाल हो जाएगा. अगर अमेरिका पीछे हटता है तो ताइवान के पास कोई विकल्प ही नहीं रहेगा."
ताइवान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी साख का सवाल बनता जा रहा है. चीन में अगस्त से लेकर सितंबर-अक्तूबर तक पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन होगा जिसमें राष्ट्रपति जिनपिंग को अगले पांच साल के लिए अनुमोदित किया जाना है.
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "चीन की आर्थिक हालत इस समय ख़राब है. शी जिनपिंग ऐसे समय में कमज़ोर नहीं दिखना चाहेंगे, इसिलए वो राष्ट्रवाद का सहारा लेंगे और ताइवान की तरफ जाएंगे. इसलिए ही हम देख रहे हैं कि चीन ताइवान को लेकर आक्रामक है और भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल कर रहा है."
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भारत पर क्या हो सकता है असर?
चीन भारत का पड़ोसी है, दोनों करीब 3488 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं. लेकिन बीते कुछ सालों से भारत और चीन सीमा विवाद में उलझे हैं.
जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों मुल्कों के सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ा है. भारत के दर्जनों चीनी मोबाइल ऐप्स प्रतिबंधित किए हैं और कुछ चीनी उत्पादों पर एंटी डंपिंग कर भी लगाया है.
वहीं, भारत के अमेरिका के साथ मज़बूत रिश्ते रहे हैं. चीन का मुक़ाबला करने के लिए एशिया में भारत अमेरिका का अहम सहयोगी है.
इस साल मई में आसियान का विशेष सम्मेलन अमेरिका के वॉशिंगटन में हुआ, वो एशिया पैसिफिक क्वाड अलांयस को भी फिर से जिंदा करना चाहता है. अमेरिका ने खुलकर भारत के साथ रिश्ते मज़बूत करने के संकेत भी दिए हैं.
ऐसे में अगर चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है तो उसका असर भारत पर पड़ने की आशंका भी ज़ाहिर की जाती रही है.
क्या अमेरिका और चीन के नेताओं के बीच हुई बातचीत का भारत पर भी कोई असर पड़ सकता है. इस सवाल पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर दिब्येश आनंद कहते हैं, "भारत के लिए अहम ये नहीं है कि चीन और अमेरिका बात कर रहे हैं. भारत के लिए अहम ये है कि चीन ने जिस तरह से अमेरिका को स्पष्ट कहा है कि ताइवान के मामले में वो किसी को दख़ल नहीं देने देगा. इससे भारत के लिए संकेत ये है कि चीन अपने और भारत के तनाव में भी किसी को दख़ल नहीं देने देगा."
प्रोफ़ेसर दिब्येश आनंद लंदन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्ट मिंस्टर में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के शोध प्रमुख भी हैं.
ताइवान का मुद्दा ऐसा है जिस पर कई देश एकजुट होकर बोलते हैं. अमेरिका भी चीन को जवाब देने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करता रहा है. चीन के प्रभाव को कम करने के लिए क्वॉड बना है भारत भी जिसका हिस्सा है. लेकिन चीन पर कोई असर दिख नहीं रहा है. चीन ये जाहिर कर रहा है कि वो भी महाशक्ति है.
प्रोफ़ेसर आनंद कहते हैं, "भारत का अमेरिका के साथ कोई सैन्य गठबंधन नहीं है. भारत क्वाड का हिस्सा ज़रूर है लेकिन ये कोई सैन्य गठबंधन नहीं है. ये बात जगजाहिर है कि क्वाड को चीन का प्रभाव कम करने के लिए ही बनाया गया है.''
''आज के वैश्विक परिवेश में ये दिख रहा है कि अमेरिका की शक्ति कम हो रही है और चीन एक उभरती हुई शक्ति है. जहां तक भारत की बात है, भारत एक अनिश्चित शक्ति है (अनसर्टेन पॉवर). उस संदर्भ में देखा जाए तो रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने भी वही पक्ष लिया है जो चीन ने लिया है."
चीन की इस भाषा के संकेत समझाते हुए प्रोफ़ेसर आनंद कहते हैं, "चीन की भाषा डोकलाम के मुक़ाबले गलवान तनाव के दौरान अधिक सख्त रही है. इससे साफ़ है कि चीन में भी उसी तरह राष्ट्रवाद बढ़ रहा है जैसे भारत में बढ़ रहा है. समस्या ये है कि अगर ये राष्ट्रवाद ऐसे ही बढ़ता रहा तो आगे बड़ा तनाव हो सकता है."
चीन एक उभरती हुई महाशक्ति है. विश्लेषक मानते हैं कि वैश्विक सैन्य शक्ति के मामले में चीन अगले कुछ दशकों में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बन सकता है. हाल के सालों में ये नज़र भी आया है कि चीन ने अपने मुद्दों पर ठोस क़दम उठाए हैं और दुनिया ने कहीं ना कहीं उसकी बात सुनी भी है.
तो क्या इसका मतलब ये नहीं है कि चीन की भाषा और रवैया और भी कड़ा होता जाएगा और क्या चीन अपनी शक्ति से अधिक प्रदर्शन कर रहा है?
इस सवाल पर प्रोफ़ेसर आनंद कहते हैं, "मेरा ये मानना है कि चीन अपने आप को ज़्यादा नहीं समझ रहा है. किसी भी अधिनायकवादी सत्ता में कुछ हद तक अहंकार तो होता ही है. एक बात ये भी है कि वैश्विक स्तर पर नीतियों के मामले में चीन को जो चाहिए है वो उसे मिल रहा है. उसने कहा कि ताइवान को कोई मान्यता नहीं देगा तो भारत समेत किसी ने मान्यता नहीं दी."
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