चुनाव से पहले असम में नौटंकी! सुबह इस्तीफा, शाम तक वापसी, क्या हुआ 4 घंटे में? क्या BJP से मिला था ऑफर
Assam Congress Bhupen Borah withdrew his resignation: असम की सियासत में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ऐसा ड्रामा देखने को मिला, जिसने कांग्रेस और बीजेपी दोनों को सुर्खियों में ला दिया। पूर्व असम कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पहले पार्टी से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलचल मचा दी और फिर महज चार घंटे के भीतर यू-टर्न लेते हुए कांग्रेस में ही बने रहने का ऐलान कर दिया। सवाल यही है कि अचानक ऐसा क्या हुआ, जिसने एक बड़े फैसले को पल भर में बदल दिया।
सुबह इस्तीफा, शाम तक वापसी: क्या हुआ 4 घंटों में
सोमवार (16 फरवरी) सुबह भूपेन बोरा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को अपना इस्तीफा भेजा। बताया गया कि उन्होंने पार्टी में अनदेखी और उचित सम्मान न मिलने की बात कही। इस्तीफे की खबर बाहर आते ही असम कांग्रेस में खलबली मच गई। गुवाहाटी स्थित उनके घर पर नेताओं का तांता लग गया। बैठकों का दौर चला, फोन कॉल्स हुए और शाम होते-होते बोरा ने इस्तीफा वापस लेने का फैसला कर लिया।

इस्तीफा वापस लेते वक्त भूपेन बोरा ने कहा- 'मैंने अभी इस बारे में अपने परिवार से बात नहीं की है...इसलिए मुझे फैसला लेने के लिए और समय चाहिए।' 32 वर्षों तक कांग्रेस की सेवा करने वाले भूपेन बोरा ने साइडलाइन करने का आरोप लगाया था। भूपेन बोरा ने 2021 से 2025 के बीच असम कांग्रेस संगठन की कमान संभाली थी। पिछले वर्ष पार्टी नेतृत्व ने बदलाव करते हुए उनकी जगह गौरव गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। सियासी अनुभव की बात करें तो बोरा असम विधानसभा में दो बार विधायक भी रह चुके हैं।
राहुल गांधी की एंट्री और हाईकमान का दखल
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस हाईकमान की भूमिका निर्णायक रही। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने खुद भूपेन बोरा से बात की। असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने भी पुष्टि की कि भूपेन बोरा का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया। हाईकमान ने उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारी देने का भरोसा दिलाया, जिसके बाद मामला संभल गया।
भूपेन बोरा के इस्तीफे के पीछे की असली वजह क्या थी?
इस्तीफा देते वक्त भूपेन बोरा ने कहा था कि वह 32 साल से कांग्रेस के सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं, लेकिन बीते कुछ दिनों में बने हालात ने उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया। उन्होंने यह भी साफ किया था कि वह सक्रिय राजनीति में बने रहेंगे, लेकिन आगे क्या करेंगे, इस पर फैसला नहीं किया है। उनका इस्तीफा ऐसे वक्त आया, जब असम में मार्च-अप्रैल के बीच विधानसभा चुनाव होने हैं और तारीखों का ऐलान होना बाकी है।
बीजेपी ऑफर और हिमंत सरमा का बयान
इस्तीफे के तुरंत बाद बीजेपी ने भी मौके पर नजर गड़ा दी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि भूपेन बोरा का यह कदम पहले से अनुमानित था, क्योंकि उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर गौरव गोगोई को जिम्मेदारी दी गई थी।
सरमा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस में वही लोग आगे बढ़ते हैं, जिनके पिता प्रभावशाली हों या जो अल्पसंख्यक समुदाय से आते हों। उन्होंने यह भी दावा किया कि बोरा असम कांग्रेस के आखिरी बड़े हिंदू चेहरा थे, जिन्हें लगातार साइडलाइन किया जा रहा था। हालांकि सरमा ने यह भी कहा कि बोरा ने बीजेपी जॉइन करने के लिए उनसे संपर्क नहीं किया है।
कौन हैं भूपेन कुमार बोरा? (who is Bhupen Kumar Borah)
- भूपेन बोरा असम कांग्रेस के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं।
- वर्ष 2021 से 2025 तक वह असम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे।
- भूपेन बोरा असम के लखीमपुर जिले से आते हैं और छात्र राजनीति से ही सक्रिय रहे हैं।
- छात्र जीवन में वह नॉर्थ लखीमपुर कॉलेज छात्र संघ के उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
- इसके बाद उन्होंने संगठनात्मक राजनीति में कदम बढ़ाया और युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली।
- विधानसभा राजनीति में बोरा 2006 से 2016 तक बिहपुरिया सीट से लगातार दो बार विधायक रहे।
- 2016 विधानसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी उम्मीदवार देबानंद हजारिका से करीब 26 हजार वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा।
- 2021 विधानसभा चुनाव में भी बिहपुरिया सीट पर बीजेपी के अमय कुमार ने उन्हें लगभग 10 हजार वोटों से पराजित किया।
- संगठन में मजबूत पकड़ के बावजूद 2025 में कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर गौरव गोगोई को यह जिम्मेदारी सौंपी।
- अपने पूरे राजनीतिक सफर में भूपेन बोरा कई बार बयानबाजी और संगठनात्मक फैसलों को लेकर चर्चा में रहे हैं।
सियासी मायने: टूट टली, लेकिन असंतोष बरकरार
भूपेन बोरा 2021 से 2025 तक असम कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनका इस्तीफा और फिर वापसी यह साफ संकेत देता है कि कांग्रेस के भीतर असंतोष मौजूद है, लेकिन फिलहाल टूट टल गई है।
विधानसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए चेतावनी है, जबकि बीजेपी इसे विपक्ष की कमजोरी के तौर पर भुनाने की कोशिश में जुटी है। कुल मिलाकर, असम की राजनीति में यह चार घंटे का ड्रामा बता गया कि चुनाव से पहले एक फैसला कितनी बड़ी सियासी पटकथा बदल सकता है।
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