समोसा से पैटरनिटी लीव तक—क्या यही वजह बनी राघव चड्ढा को राज्यसभा में ना बोलने देने की! AAP के फैसले पर सवाल
Raghav Chadha: आम आदमी पार्टी (AAP) की राजनीति इन दिनों अंदरूनी खींचतान के दौर से गुजर रही है और इस बार केंद्र में हैं राघव चड्ढा। कभी पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिने जाने वाले राघव चड्ढा अब खुद को 'साइडलाइन' किए जाने का आरोप लगा रहे हैं। राज्यसभा में डिप्टी लीडर की जिम्मेदारी उनसे लेकर अशोक कुमार मित्तल को देने के फैसले के बाद विवाद और गहरा गया है।
राघव चड्ढा का कहना है कि उन्होंने हमेशा आम जनता से जुड़े मुद्दे उठाए, फिर चाहे वे कितने ही 'साधारण' क्यों न हों। लेकिन पार्टी के भीतर से ही उन्हें 'सॉफ्ट मुद्दों' तक सीमित नेता बताकर सवाल उठाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या वाकई ये मुद्दे हल्के थे या राजनीति में प्राथमिकताओं की जंग चल रही है। क्या इन्ही सॉफ्ट मुद्दों की वजह से आप ने उनपर रोक लगाई। आइए जानें वो 7 मुद्दे कौन-कौन से थे, जो राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाए थे।

क्या है पूरा विवाद? (Raghav Chadha Controversy)
राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वह लगातार जनता से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं और पूछा कि इससे पार्टी को क्या नुकसान हुआ।
दूसरी ओर पार्टी के नेताओं ने एक के बाद एक वीडियो जारी कर उन पर पलटवार किया। दिल्ली यूनिट के प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि चड्ढा ने केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपनाया। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान उनके लंदन में होने को लेकर भी सवाल खड़े किए गए।
राघव चड्ढा के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप यही है कि उन्होंने संसद में 'सॉफ्ट' यानी हल्के मुद्दे उठाए। लेकिन अगर इन मुद्दों को गौर से देखें, तो ये सीधे आम लोगों की जिंदगी से जुड़े नजर आते हैं। आइए जानते हैं वे 7 मुद्दे, जिन पर चड्ढा ने संसद में आवाज उठाई और जो अब विवाद का कारण बन गए।
1. पैटरनिटी लीव (पितृत्व अवकाश) का अधिकार (Paternity Leave & Shared Caregiving)
राघव चड्ढा ने संसद में पैटरनिटी लीव (पितृत्व अवकाश) को कानूनी अधिकार बनाने की मांग की। उनका तर्क था कि बच्चों की देखभाल सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक पिता को नौकरी और परिवार के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए और माताओं को अकेले इस जिम्मेदारी का बोझ नहीं उठाना चाहिए।
2. मेट्रो शहरों में ट्रैफिक जाम (Urban Traffic Crisis)
राघव चड्ढा ने दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में बढ़ते ट्रैफिक पर चिंता जताई। उनका कहना था कि लोग साल में 100 से 168 घंटे तक जाम में फंसे रहते हैं। इसके लिए उन्होंने 'नेशनल अर्बन डी-कंजेशन मिशन' की मांग की, जिसमें बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट और स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम शामिल हो।
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3.28 दिन का रिचार्ज और डेटा खत्म (Recharge Plans Issue)
टेलीकॉम कंपनियों के 28 दिन वाले 'मंथली प्लान' पर उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कंपनियां महीने का नाम लेकर 28 दिन का प्लान देती हैं, जिससे यूजर को साल में 13 बार रिचार्ज करना पड़ता है। साथ ही उन्होंने 'यूज इट या लूज इट' डेटा पॉलिसी का भी विरोध किया, जिसमें बचा हुआ डेटा खत्म हो जाता है।
4. मेंस्ट्रुअल हेल्थ और सम्मान (Menstrual Health & Dignity)
राघव चड्ढा ने लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे मेंस्ट्रुअल सुविधाओं की कमी को बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि यह व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है और इसे स्वास्थ्य और सम्मान से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
5. एयरपोर्ट का महंगा खाना और 'समोसा' (Airport Food Issue)
यही वह मुद्दा है, जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक तंज कसे गए। राघव चड्ढा ने एयरपोर्ट पर महंगे खाने को लेकर सवाल उठाए और सरकार की 'उड़ान यात्री कैफे' पहल का स्वागत किया, जहां सस्ती चाय और समोसा, स्नैक्स मिलते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ये कैफे हर एयरपोर्ट पर और सिक्योरिटी एरिया के अंदर होने चाहिए।
6. राइट टू रिकॉल (Right to Recall)
राजनीतिक सुधार के तहत राघव चड्ढा ने 'राइट टू रिकॉल' की वकालत की।उनका कहना था कि अगर जनता नेता चुन सकती है, तो उसे हटाने का अधिकार भी होना चाहिए।
7. गिग वर्कर्स की हालत (Gig Workers Issue)
राघव चड्ढा ने डिलीवरी और गिग वर्कर्स की स्थिति पर भी बात की। एक दिन उन्होंने खुद डिलीवरी एजेंट के साथ बिताया और उनकी समस्याओं को समझा। उन्होंने बेहतर वेतन और सुरक्षित कामकाजी माहौल की मांग की।
AAP में दरार या रणनीति?
पूरा विवाद अब इस सवाल पर आकर टिक गया है कि क्या राघव चड्ढा को जानबूझकर किनारे किया गया या यह पार्टी की रणनीतिक चाल है। जहां एक ओर चड्ढा खुद को 'खामोश करवाया गया नेता' बता रहे हैं, वहीं पार्टी उन्हें 'सॉफ्ट राजनीति' करने वाला चेहरा बता रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत टकराव नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और प्राथमिकताओं की लड़ाई भी हो सकती है।
पंजाब में कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर राजा सिंह वडिंग बोले, ''राघव चड्ढा और आम आदमी पार्टी अब एक जैसी तस्वीर नहीं दिखते। हमें इसका संकेत काफी पहले मिल गया था, जब केजरीवाल की गिरफ्तारी के वक्त वह लंदन में थे। अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि उनका पार्टी में टिके रहना मुश्किल लगता है। आगे वह किस दिशा में जाएंगे, यह साफ नहीं है, लेकिन आम लोगों के बीच यही धारणा बन रही है कि या तो वह खुद पार्टी छोड़ेंगे या फिर उन्हें बाहर कर दिया जाएगा।"
बीजेपी सांसद रामवीर सिंह विधूड़ी बोले, "मैंने राघव चड्ढा को दिल्ली विधानसभा के समय से देखा है, जब वह विधायक थे और प्रभावी ढंग से अपनी बात रखते थे। राज्यसभा में भी उन्होंने जनहित से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया है। ऐसे में यह समझ से बाहर है कि उनकी आवाज को सीमित क्यों किया जा रहा है। किसी को पद पर रखना या हटाना पार्टी का आंतरिक मामला हो सकता है, लेकिन अगर एक वरिष्ठ सांसद को बोलने से रोका जा रहा है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। पार्टी नेतृत्व को इस पर गंभीरता से दोबारा सोचने की जरूरत है।"
आगे क्या?
चुनावी माहौल और राजनीतिक समीकरणों के बीच यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराता दिख सकता है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राघव चड्ढा ने क्या कहा, बल्कि यह भी है कि राजनीति में 'सॉफ्ट' और 'हार्ड' मुद्दों की असली परिभाषा क्या है।
क्या आम आदमी के रोजमर्रा के मुद्दे भी राजनीति में जगह बनाएंगे, या फिर केवल बड़े और आक्रामक मुद्दे ही चर्चा में रहेंगे? फिलहाल इतना तय है कि 'सामोसा' से शुरू हुई यह बहस अब AAP की राजनीति में बड़ा मोड़ बनती दिख रही है।
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