कौन हैं पसमांदा मुसलमान ? BJP क्यों चाहती है समर्थन ? जानिए
नई दिल्ली, 8 जुलाई: भारतीय जनता पार्टी अब मुसलमानों के बीच में भी अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं से इसका आह्वान किया है। पीएम मोदी ने पार्टी से कहा है कि 'पसमांदा मुसलमानों' के बीच जाएं और उनके साथ स्नेह बांटें। दरअसल, भाजपा को लगता है कि यह एक ऐसा वर्ग है, जिसे मुसलमानों के अंदर काफी उपेक्षित छोड़ा गया है और अगर उन्हें उनका वाजिब हक दिलाया जाए तो यह चुनावों में पार्टी के लिए हित का सौदा भी साबित हो सकता है। दरअसल, मुसलमानों की अधिकतर आबादी पसमांदाओं की ही है, जो अभी भी अपने समाज में मुख्यधारा से पीछे माने जाते हैं।

पसमांदा मुसलमानों के लिए भाजपा की 'स्नेह यात्रा'
अभी तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जो बैठक हुई है, उसके समापन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि पार्टी को 'स्नेह यात्राओं' के माध्यम से 'पसमांदा मुसलमानों' का समर्थन हासिल करना चाहिए। यही नहीं कहा जा रहा है कि भाजपा 6 अगस्त को होने वाले देश के 16वें उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी किसी 'पसमांदा मुस्लिम' को अपना प्रत्याशी बनाने को प्राथमिकता दे रही है। दो दिन पहले ही द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक एक भाजपा नेता ने साफ कहा कि 'सक्षम व्यक्ति (उपराष्ट्रपति प्रत्याशी के लिए) को चुनने के लिए सरगर्मी से तलाश जारी है, 'पसमांदा' मुस्लिम गैर-विवादास्पद नेता को उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के तौर पर नामांकित किया जाएगा।'

कौन हैं पसमांदा मुसलमान ?
भारत में हिंदुओं की तरह मुसलमान भी अंदरूनी तौर पर विभिन्न जातियों में बंटे है और उनके भीतर भी भयानक तौर पर आज भी भेदभाव मौजूद है। जिस तरह से बीजेपी पिछले आठ वर्षों से हिंदुओ में दलितों और पिछड़ों-अति-पिछड़ों को अपने साथ जोड़ने में कामयाबी पाई है, उसी तरह अब उसके राजनीतिक एजेंडे में पसमांदा मुसलमान भी आ चुके हैं। अगर पसमांदा का अर्थ समझें तो इसका मतलब है, 'पीछे छूट जाने वाला मुसलमान'। मोटे तौर पर मुसलमान तीन सामाजिक समूहों में विभाजित हैं- अशराफ (अभिजात वर्ग ), अजलाफ (पिछड़े तबके के मुसलमान) और अरजाल (सबसे दबे-कुचले मुसलमान)। पसमांदा में अजलाफ और अरजाल दोनों मुसलमान शामिल हैं। पसमांदा एक फारसी शब्द है- जिसका अर्थ है पीछे छूट जाने वाला।

पसमांदा मुसलमानों की संख्या कितनी है ?
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पसमांदा मुसलमानों की तादाद सबसे ज्यादा है और वह कुल मुस्लिम आबादी के करीब 85 फीसदी हैं। अशराफ या अभिजात वर्ग के मुसलमानों में शेख, सैय्यद, सिद्दीकी और पठानों की गिनती की जाती है। जबकि, पसमांदा में दर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, फाकिर, बढई-लुहार,नाई, जुलाहा,कबाड़ी, कुम्हार, कंजरा, तेली जाति के मुसलमान आते हैं। इनका संबंध अजलाफ से है। वहीं अरजाल में वे मुसलमान हैं, जो दलित थे और इस्माम कबूल कर लिया। यानी भारत में ये हिंदू से मुसलमान जरूर बने, लेकिन अपना पारंपरिक पेशा अपनाए रखा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले विभिन्न राज्यों में इस साल और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी कितने बड़े वोट बैंक पर काम करना चाहती है।

'दिलीप कुमार भी थे पसमांदा मुसलमान'
बॉलीवुड के अभिनेता दिलीप कुमार उर्फ यूसुफ खान भी पसमांदा मुसलमान थे। उन्होंने पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का दर्जा दिलाने के लिए काफी कोशिशें की थीं। महाराष्ट्र सरकार ऐसी पहली सरकार है, जिसने 1967 में मुसलमानों की कुछ जातियों को ओबीसी के तौर पर मान्यता दी थी। बाद में मंडल कमीशन ने भी कई मुस्लिम पिछड़ी जातियों को ओबीसी में शामिल करने की सिफारिश की थी। इस समय ऐसी 79 मुस्लिम जातियां हैं, जो ओबीसी होने के नाम पर आरक्षण का आनंद उठा रही हैं। दिलीप कुमार के साथ पसमांदा मुसलमानों को ओबीसी का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष करने वाले शब्बीर अंसारी ने कहा कि उन्होंने ही दिलीप कुमार से कहा था कि वह पसमांदा मुसलमान हैं, क्योंकि उनके पिता फल बेचते थे, इसलिए वो भी ओबीसी हैं।

मुसलमानों में भेदभाव पर भाजपा की नजर ?
शब्बीर अंसारी का कहना है कि ऐसा भी वक्त था जब अशराफ मुसलमान, अजलाफ और अरजाल के अस्तित्व होने से भी इनकार करते थे। वह कहते थे कि नमाज के लिए बादशाह और कंगाल एक साथ कैसे खड़े होंगे। उन्होंने कहा, 'कई जगहों पर मुझे बाहर कर दिया गया और जब मैंने बताने की कोशिश की कि मुसलमानों में भी पिछड़े वर्ग हैं तो हमला तक किया गया। मैंने उनसे कहा कि यह जाति की बात नहीं, बल्कि वर्ग की है। धीरे-धीरे उन्होंने इसे कबूल करना शुरू किया।'

पीएम मोदी के आह्वान से उम्मीद बढ़ी- अली अनवर
पूर्व सांसद और ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के संस्थापक अध्यक्ष अली अनवर और शब्बीर अंसारी दोनों का मानना है कि पसमांदा मुसलमानों के एक वर्ग ने आर्थिक रूप से तरक्की जरूर की है, लेकिन सामाजिक भेदभाव अभी भी जारी है। अनवर ने कहा, 'कई सैय्यद, शेख, सिद्दीकी और पठान, अंसारी, धुनिया, नदाफ, हलाल खोर, शिकलगार, सलमानी और कई अन्य पसमांदा मुसलमानों से शादी नहीं करते।' हिंदू दलितों के मुकाबले जो मुसलमान बन चुके हैं, वे आर्थिक और शैक्षिक रूप से आज भी मुखर नहीं हो पाए हैं। अनवर का कहना है, 'हमें उम्मीद है कि पसमांदा तक पहुंचने की पीएम मोदी का आह्वान कुछ सकारात्मक बदलाव लाएगा और यह सिर्फ नारा बनकर नहीं रहेगा।'
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