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नज़रिया: केजरीवाल Vs कुमार: ग़ैरों पर करम, अपनों पर सितम क्यों?

By Bbc Hindi

केजरीवाल और कुमार विश्वास
Getty Images
केजरीवाल और कुमार विश्वास

दिल्ली से राज्यसभा की तीन सीटों पर इसी महीने होने वाले चुनाव के लिये अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करने के साथ आम आदमी पार्टी एक बार फिर विवादों में घिर गई है.

अपनी स्थापना के बाद पार्टी ने जिस तरह की राजनैतिक-सांगठनिक नैतिकता और उच्च आदर्शों की बात की थी, वे सारे के सारे ध्वस्त होते नजर आ रहे हैं.

सिर्फ़ बाहर ही नहीं, उसके अंदर से भी सवाल उठ रहे हैं कि किन आदर्शों और नैतिक मानदंडों के आधार पर उसने राज्यसभा के तीन में से दो टिकट ऐसे लोगों को थमा दिये गये, जिनका पार्टी के सिद्धांतों, उसके राजनीतिक मूल्यों या उसके किसी अभियान से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा!

दो बाहरी नामों पर अंदर से उठ रहे सवाल

आप ने बुधवार को अपने तीन उम्मीदवारों की सूची जारी की, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह के अलावा दिल्ली के एक बड़े व्यवसायी सुशील गुप्ता और एक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट नारायण दास गुप्ता के नाम शामिल हैं. सुशील हाल तक कांग्रेस में थे. सन् 2013 में उन्होंने मोतीनगर से विधानसभा का चुनाव भी कांग्रेस टिकट पर लड़ा था.

'आप' को लेकर ये सवाल इसलिये भी उठ रहे हैं कि अपने अंदर और बाहर के अनेक ख्यातिलब्ध और समर्थ लोगों की उपेक्षा कर उसने दिल्ली के इन दो व्यक्तियों को राज्यसभा के लिये नामांकित किया.

अपने पांच वर्षीय राजनीतिक जीवन में 'आप' पहली बार राज्यसभा में दाखिल होने जा रही है.

तीन उम्मीदवारों में सिर्फ संजय सिंह का नाम है, जिसे लेकर आमतौर पर पार्टी या उसके बाहर किसी तरह के सवाल नहीं हैं. लेकिन गुप्ता-द्वय पर सवालों का सिलसिला ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा.

अपने बचाव में पार्टी प्रवक्ता कल से ही दोनों 'गुप्ता लोगों' के 'रिज्यूम' बांट रहे हैं. दोनों के गुणों का बखान किया जा रहा है. अगर किसी पार्टी को संसद के उच्च सदन के लिये नामांकित व्यक्तियों का परिचय इतने ब्योरे के साथ देना पड़े तो इसे हास्यास्पद ही कहा जायेगा.

'दोनों राज्यसभा के हिसाब से उतने क़ाबिल नहीं'

पार्टी की तरफ़ से दलील दी जा रही है कि कई बेहद क़ाबिल और मशहूर हस्तियों से भी संपर्क साधा गया पर वे 'आप' के टिकट पर राज्यसभा के लिये नामांकित होने को तैयार नहीं हुए.

यह दलील इतनी बेदम है कि इसे शायद ही कोई गंभीरता से ले! इससे यह भी साफ़ होता है कि पार्टी नेतृत्व को इस बात का आभास है कि ये दो व्यक्ति राज्यसभा के हिसाब से 'उतने क़ाबिल और मशहूर' नहीं हैं! कोई पार्टी किसे उम्मीदवार बनाये, यह उसका अपना निजी सांगठनिक मामला है.

पत्रकार का काम किसी नेता या पार्टी को सलाह देना नहीं है. उसका काम किसी नेता या पार्टी के फ़ैसलों का आंकलन करना है, उसकी समीक्षा या आलोचना करना है.

चूंकि आप का फ़ैसला सार्वजनिक हो गया है, इसलिए अब कहा जा सकता है कि उसकी यह दलील बेमतलब है कि राज्यसभा के लिए उसे इन 'दो व्यक्तियों' के मुकाबले और कोई योग्य उम्मीदवार मिला ही नहीं!

पार्टी के भीतर भी थे बेहतर विकल्प

'आप' के प्रवक्ताओं की यह दलील समझ में आने वाली है कि कुमार विश्वास बीते कई महीने से पार्टी के विचारों और अनुशासन के ख़िलाफ़ काम कर रहे थे, ऐसे में उनके नाम पर विचार नहीं हो सकता था.

लेकिन आप के प्रमुख नेताओं आशुतोष, दिलीप पांडे, मीरा सान्याल या आतिशी मार्लिना के बारे में तो ऐसी बात नहीं कही जा सकती.

'आप' अगर अपने को 'इन्क्लूसिव' और व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का समर्थक होने का दावा करती है तो वह मीरा या आतिशी जैसी महिलाओं के बीच से भी चयन कर सकती थी, जो अपने-अपने क्षेत्र में बेहद काबिल और मशहूर हैं.

दोनों 'गुप्ता लोगों' से बहुत ज्यादा नहीं, तो कम तो बिल्कुल ही नहीं. अगर वह सुशील गुप्ता की तरह 'आप' के दायरे से बाहर किसी व्यक्ति को लेना चाहती तो उसके पास असंख्य बेहतरीन विकल्प थे, जिनके नामांकन से पार्टी अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा सकती थी.

कांग्रेस जैसी पार्टी ने एक समय के आर नारायणन जैसे लोगों को राज्यसभा में लाया था, जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी हुए.

कांग्रेस ने भले ही कुछ अनजान लोगों को भी अपने निहित-स्वार्थो के चलते समय-समय पर राज्यसभा के लिये नामांकित किया पर पार्टी से बाहर के दायरे से उसने दर्जनों ख्यातिलब्ध लोगों को भी राज्यसभा भेजा.

कुमार विश्वास
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कुमार विश्वास

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह 'आप'

उम्मीदवारों के चयन के आधार के अलावा पार्टी के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठ रहे हैं. पार्टी के प्रमुख नेता भी कहने लगे हैं कि 'आप' को केजरीवाल किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या किसी एनजीओ की तरह चला रहे हैं.

आंतरिक लोकतंत्र के लिये पार्टी में स्थान नहीं बचा है. लगभग इसी तरह के आरोप पार्टी पर तब भी लगे थे, जब इसके तीन संस्थापक सदस्य योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और प्रो आनंद कुमार को सन् 2015 में पार्टी से बाहर कर दिया गया था.

महज तीन साल के अंदर उस वक्त पार्टी में बड़ा भूचाल पैदा हुआ था. इस बार भले ही उस कद और प्रतिष्ठा के नेता केजरीवाल के ख़िलाफ़ सामने न आए हों पर पार्टी के फ़ैसले पर उसके समर्थकों और शुभचिंतकों के बड़े हिस्से में सवाल तो उठ रहे हैं. सोशल मीडिया में आप-समर्थकों की तीखी टिप्पणियों का तांता सा लगा हुआ है.

अरविंद केजरीवाल
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अरविंद केजरीवाल

बाकी दलों का क्या हाल?

मुलायम सिंह यादव की सपा, मायावती जी की बसपा, लालू प्रसाद के राजद, नायडू की तेदेपा या पहले से स्थापित किसी अन्य राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी में राज्यसभा के टिकट को लेकर ऐसे फैसले होते हैं तो आमतौर पर उनके अंदर या बाहर न तो कोई ज़्यादा विवाद होता है और न सवाल उठते हैं.

उन दलों से पार्टी के कार्यकर्ताओं या समर्थकों से वैसी अपेक्षाएं नहीं होतीं जो आम आदमी पार्टी से उसके अंदर और बाहर लोगों की रही हैं. सपा-बसपा-राजद सहित देश की अनेक पार्टियों ने 'किस्म-किस्म' के लोगों को राज्यसभा के टिकट दिये हैं.

लालू प्रसाद ने तो एक बार ऐसे व्यक्ति को राज्यसभा का टिकट दिया, जिसने उन पर केंद्रित 'लालू-चालीसा' लिख मारा था. कांग्रेस और भाजपा में भी अनेक योग्य और समर्थ लोगों की उपेक्षा कर अनजान किस्म के लोगों को टिकट दिये जाते रहे हैं.

आम आदमी पार्टी
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आम आदमी पार्टी

'चाल-चरित्र-चेहरा' के स्तर पर भिन्न थी आप!

पर आम आदमी पार्टी तो अपने को इन पार्टियों से सर्वथा अलग किस्म की पार्टी होने का ऐलान करती रही है.

भ्रष्टाचार के खात्मे और जनलोकपाल के गठन जैसी मांगों को लेकर चलाये आंदोलन के अंतिम चरण में नवम्बर, 2012 में जब अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में इसका गठन हुआ तो देश के तमाम उदार मध्यवर्गीय तबकों में इसे एक 'क्रांतिकारी कदम' के रूप में लिया गया.

पार्टी का जनाधार सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित था पर देश के अन्य हिस्सों में बड़ी संख्या में लोगों ने इसे सचमुच अन्य दलों से अलग दल के रूप में देखा.

अपने बारे में भाजपा का दिया नारा कि वह 'चाल-चरित्र-चेहरा' के स्तर पर अन्य दलों से भिन्न है, उसके बजाय आम आदमी पार्टी पर ज़्यादा सटीक बैठता था. लेकिन 'आप' की यह छवि ज्यादा दिन नहीं टिकी.

अन्य दल
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अन्य दल

इसकी छवि को पहला आघात केजरीवाल ने तब लगाया, जब उन्होंने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की मांग कर रही योगेंद्र-प्रशांत की जोड़ी को बाहर किया.

दिलचस्प बात है कि उस वक्त भी विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे का मामला उठा था. दो साल बाद आज फिर टिकट-बंटवारे के विवाद ने ही केजरीवाल और 'आप' की छवि को बुरी तरह प्रभावित किया है.

BBC Hindi
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English summary
Viewpoint Kejriwal Vs Kumar help on Garrison Why Sepam On Theirselves
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