लिट्टी-चोखा के बारे में वो बातें जो आपको जाननी चाहिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में दिल्ली में हुए 'हुनर हाट' कार्यक्रम में लिट्टी चोखा खाते नज़र आए.
इसके बाद सोशल मीडिया पर सोशल मीडिया पर लिट्टी चोखा को लेकर चर्चा होने लगी और ये क़यास भी लगाए जाने लगे कि कहीं इसका संबंध बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से तो नहीं है.
लिट्टी-चोखा को बिहार की सिग्नेचर डिश का दर्जा हासिल है, हालांकि डिश या व्यंजन आम तौर पर काफ़ी पेचीदा होते हैं, उन्हें बनाने में काफ़ी कारीगरी लगती है और ढेर सारी सामग्री भी. इस हिसाब से लिट्टी को व्यंजन नहीं कहा जा सकता.
लिट्टी गूंथे हुए आटे की लोई का गोला है जिसे जलते अलाव में, कोयले या गोबर के उपले की आँच पर भून लिया जाता है.
लोई की कुप्पी बनाकर उसके भीतर चने का भुरभुरा सत्तू भी भरा जाता है, लेकिन डोसे की ही तरह सादा लिट्टी और भरवां लिट्टी दोनों बनाए और खाए जाते हैं.
चोखा आग पर पके हुए आलू, बैंगन और टमाटर जैसी सब्जियों का भुर्ता है. आग पर पकी सब्ज़ियों को सीधे मसलकर उनमें नमक-तेल डाल दिया जाता है.

कुल मिलाकर, यह दुनिया के सबसे आसानी से तैयार होने वाले खानों में है, इसे बनाने के लिए न तो ढेर सारे बर्तन चाहिए, न ही बहुत सारे मसाले और तेल, यहां तक कि पानी भी बहुत कम लगता है.
इसकी एक खासियत यह भी है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, लेकिन लोग इसे ताज़ा और गर्मागर्म खाना ही पसंद करते हैं.
आम तौर पर सर्दी के दिनों में लोग अलाव सेंकते हुए घर के बाहर ही रात के खाने का इंतज़ाम भी कर लेते हैं.
ज़मीन से जुड़े होने की अपील
मोटे तौर पर लिट्टी बिहारी महिलाओं की रसोई का हिस्सा कम, और पुरुषों और यात्रियों का साथी अधिक रहा है.
लिट्टी-चोखा ऐसी चीज़ है जिसे आप सुविधा और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से जैसे चाहे वैसे बना सकते हैं. अगर घी है तो अच्छी बात है, अगर अचार और चटनी है तो और भी अच्छा है, अगर नहीं भी हैं, तो कोई बात नहीं.
लिट्टी चोखा विशुद्ध रूप से आम आदमी या ये भी कह सकते हैं कि गरीब आदमी का भोजन है. पिछले कुछ सालों में बिहारी कामगारों के देश भर में फैलने के बाद धीरे-धीरे इसके ठेले बिहार से बाहर भी दिखाई देने लगे हैं.
1980 के दशक तक दिल्ली में लिट्टी-चोखा सड़क किनारे मिलना मुश्किल था लेकिन अब यह दिखने लगा है.
अगर सेहत के हिसाब से देखें तो यह तले हुए समोसे से तो बेहतर ज़रूर है. यही वजह है कि यह गैर-बिहारी लोगों में भी धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा है.
कुछ लोगों को इसमें लिपटी राख से ज़मीन की खुशबू आती है, इसकी अपनी एक देहाती और ज़मीन से जुड़े होने की अपील भी है.
हालांकि कहीं-कहीं लिट्टी के नाम पर सत्तू भरा तला हुआ डो-बॉल (लोई का गोला) भी चलन में आ गया है, लेकिन वह नई ईजाद है, बिल्कुल फ्राइड मोमो की तरह. असली मोमो तो भाप में ही पकाया जाता है. अब लिट्टी को मटन और चिकन के साथ भी खाया जाने लगा है जो नया चलन है.
खेतिहरों और सैनिकों का खाना
बिहार एक बड़ा राज्य है लेकिन लिट्टी का चलन मिथिला में कम, मगध और भोजपुर क्षेत्र में अधिक दिखता है. माना जाता है कि इसकी शुरूआत मगध क्षेत्र (गया, पटना और जहानाबाद वाला इलाका) में हुई थी.
चंद्रगुप्त मौर्य मगध के राजा थे जिनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी लेकिन उनका साम्राज्य अफ़ग़ानिस्तान तक फैला था, कुछ जानकारों का कहना है कि चंद्रगुप्त के सैनिक युद्ध के दौरान लंबे रास्तों में आसानी से लिट्टी-चोखा खाकर आगे बढ़ते जाते थे हालांकि इसके ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते.
18वीं सदी की कई किताबों में लंबी तीर्थयात्रा पर निकले लोगों का मुख्य भोजन लिट्टी-चोखा और खिचड़ी बताया गया है.
हालांकि पक्के तौर पर ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ नहीं कहा जा सकता कि लिट्टी की शुरूआत बिहार में ही हुई थी, आटे को आग पर सेंकने की कई विधियां देश भर में चलन में रही हैं जैसे मेवाड़ और मालवा की बाटी जिसे दाल के साथ खाया जाता है.
ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि तात्या टोपे और झाँसी की रानी के सैनिक बाटी या लिट्टी को पसंद करते थे क्योंकि उन्हें पकाना बहुत आसान था और बहुत सामानों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. 1857 के विद्रोहियों के लिट्टी खाकर लड़ने के किस्से भी मिलते हैं.
सदियों से बिहार के किसान खेत की पहरेदारी करते हुए वहीं लिट्टी बनाकर खा लिया करते थे, बहुत बाद में इसकी लोकप्रियता शहरों तक पहुँची. वैसे यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि चोखा के साथ उसकी जोड़ी बिहार में ही बनी.
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