क्या गरीब, आदिवासी महिला को देश के सर्वोच्च पद पर बर्दाश्त नहीं कर पा रहीं कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी?
Poor Lady Row: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्म के प्रभावशाली अभिभाषण से 31 फरवरी को आम बजट सत्र की शुरूआत हुई लेकिन कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति पर ऐसी टिप्पणी की जिसके बाद वो उनकी जमकर आलोचना हो रही है।
दरअसल, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए सोनिया गांधी ने देश के सर्वाच्च पद पर बैठी महिला राष्ट्रपति को 'Poor Lady' कहा। सोनिया गांधी बोलीं "राष्ट्रपति अंत तक बहुत थक चुकी थी, बेचारी, वे मुश्किल से बोल पा रही थीं, पुअर लेडी।" जिसके बाद सोनिया गांधी बुरी तरह घिर चुकी हैं।

राष्ट्रपति भवन ने सोनिया गांधी की इस टिप्पणी को अपमानजनक और सर्वोच्च राष्ट्रपति पद की गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। राष्ट्रपति भवन ने कहा "राष्ट्रपति किसी भी पल थकी नहीं थीं वो ये सदा ये मानती रहीं हैं कि हाशिये पर रहने वाले समुदायों, महिलाओं और किसानों के लिए बोलना चाहिए, जैसा वह अपने भाषण के दौरान बोल रही थीं। ये कभी थकाने वाला नहीं हो सकता।"
"कांग्रेस का शाही परिवार राष्ट्रपति के अपमान पर उतर आया"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी की इस टिप्पणी को देश की महिला और राष्ट्रपति का अपमान बताया। पीएम मोदी ने कहा "कांग्रेस का शाही परिवार राष्ट्रपति के अपमान पर उतर आया है। कांग्रेस ने एक बार फिर बता दिया है कि वो आदिवासियों के बारे में क्या सोचते हैं। सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पुअर लेडी बताकर आदिवासियों का अपमान किया है।"
आदिवासी राष्ट्रपति का घोर अनादर
दरअसल, सोनिया गांधी द्वारा राष्ट्रपति पर की गई इस टिप्पणी से कांग्रेस नेताओं की आदिवासी समुदायों और साधारण पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के प्रति उनकी सोच और पूर्वाग्रह एक बार फिर से उजाकर कर दिया है। सोनिया गांधी को ये बयान इस बात का स्पष्ठ सबूत है कि देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर एक गरीब और आदिवासी महिला के बैठने पर वो अहसज हैं। उन्हें ये बर्दास्त नहीं हो पा रहा है क्योंकि ये उनकी जड़ जमाए हुए वंशवादी राजनीति को चुनौती देता है।
कांग्रेस का आदिवासी विरोधी नीतियों का रहा इतिहास
कांग्रेस पर आदिवासियों के हितों पर ध्यान नहीं देने का आरोप लगता रहा है। आदिवासी समुदायों की उपेक्षा करने का कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। कांग्रेस भारत में अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय की उपलब्धियों और आकांक्षाओं को भी कमतर आंकती रही है। चाहे वो आदिवासी नायकों की पहचान को अवरुद्ध करना हो या प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं को रोकना हो।
कांग्रेस का जो ट्रैक रिकॉर्ड रहा है उसमें आदिवासियों के साथ भेदभाव स्पष्ट नजर आता है। कांग्रेस आदिवासी हकों के मुद्दों पर कभी आवाज उठाती नजर नहीं आई। राष्ट्रपति मुर्मू को कमतर आंकना उसी का हिस्सा है।
आदिवासी भावनाओं का अपमान
सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति मुर्मू को "पुअर लेडी" कहकर उन्हें कमतर आांककर उन्होंने अनजाने में उन लाखों एसटी नागरिकों की सामूहिक पहचान और संघर्ष का अपमान किया है। जिन्होंने अपने संघर्ष के बलबूते शीर्ष पदों पर पहुंच कर प्रतिनिधित्व हासिल किया है। इसके साथ ही इससे उन आदिवासियों की भावनाओं को भी ठेस पहुंची है जिन्होंने द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति पर नियुक्ति को भारतीय शासन के शिखर पर प्रगति और प्रतिनिधित्व का प्रतीक माना था।
कांग्रेस पहले भी कर चुकी है राष्ट्रपति मुर्म का अपमान
याद रहे जुलाई 2024 में कांग्रेस सांसद अधीर रंजन ने संसद में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को 'राष्ट्रपत्नी' कहकर संबोधित किया था। राष्ट्रपत्नी" कहकर उनकी स्थिति को लिंग आधारित अपमान में बदल दिया गया। जिसका उद्देश्य लैंगिक अपमान करना था और आदिवासी समाज से सर्वोच्च पद पर बैठी महिला का तिरस्कार करना था।
अधीर रंजन चौधरी के मजाकिया अंदाज में राष्ट्रपत्नी कहने से लेकर उनके रंग के बारे में टिप्पणी करने तक, उनके शब्द उनकी नस्लवादी और सामंती मानसिकता को उजागर करता है, जहां वो अपने दम पर देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर एक आदिवासी महिला को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। ये घटना अलग नहीं है, बल्कि उसी का एक हिस्सा है।
कांग्रेस बर्दाश्त नहीं कर पा रही कि...
अब सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस ने उसी स्तर का अनादर किया होता अगर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू एक विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से आतीं? ये साफ है कि कांग्रेस का वंशवादी और अभिजात्यवादी दृष्टिकोण एक जमीनी स्तर के नेता के उदय को बर्दाश्त नहीं पा रहा है जो कुलीन लुटियन राजनीति के बजाय वास्तविक भारत का प्रतिनिधित्व करता है। कांग्रेस इस बड़े बदलाव के प्रति असमर्थ महसूस कर रही है।
अब सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस ने उसी स्तर का अनादर किया होता अगर द्रौपदी मुर्मू एक विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से आतीं? ये सच है कि कांग्रेस का वंशवादी और अभिजात्यवादी और वंशवादी दृष्टिकोण एक गरीब, आदिवासी महिला के उदय को बर्दाश्त नहीं कर सकता है जो कुलीन लुटियन राजनीति के बजाय वास्तविक भारत का प्रतिनिधित्व करता है।
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