सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पगड़ी और कृपाण की तुलना हिजाब से न करें, संविधान से मिली है अनुमति
नई दिल्ली, 08 सितंबर: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को भी हिजाब मामले पर सुनवाई जारी रहा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई करते हुए कहा कि सिखों के कृपाण और पगड़ी की हिजाब से कोई तुलना नहीं है क्योंकि सिखों को पगड़ी और कृपाण पहनने की अनुमति है। यह टिप्पणी शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखने वाले कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आई है।

न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखने वाले कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील निजामुद्दीन पाशा ने सुनवाई के दौरान कहा कि, हिजाब मुस्लिम लड़कियों की धार्मिक प्रथा का हिस्सा है और पूछा कि क्या लड़कियों को हिजाब पहनकर स्कूल आने से रोका जा सकता है।
उन्होंने आगे तर्क दिया कि सिख छात्र भी पगड़ी पहनते हैं। पाशा ने जोर देकर कहा कि सांस्कृतिक प्रथाओं की रक्षा की जानी चाहिए। इन दलीलों पर न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि हिजाब पहनने की तुलना सिखों के पगड़ी और कृपाण धारण करने के साथ नहीं की जा सकती है। सिखों को कृपाण ले जाने की मान्यता संविधान द्वारा प्राप्त है इसलिए दोनों प्रथाओं की तुलना न करें।
न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि पगड़ी पर वैधानिक अपेक्षाएं हैं और ये सभी प्रथाएं देश की संस्कृति में अच्छी तरह से स्थापित हैं। जब अधिवक्ता पाशा ने फ्रांस जैसे विदेशी देशों का उदाहरण दिया तो जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हम फ्रांस या ऑस्ट्रिया के मुताबिक नहीं बनना चाहते। अदालत ने कहा कि हम भारतीय हैं और भारत में रहना चाहते हैं।
पाशा ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि हिजाब मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा करता है। पाशा ने कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट के निष्कर्ष कि हिजाब एक सांस्कृतिक प्रथा है, धारणा पर आधारित है। उन्होंने अपने तर्कों का समर्थन करने के लिए विभिन्न धार्मिक पुस्तकों का हवाला दिया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह गलत व्याख्या है कि हाईकोर्ट ने माना कि हिजाब एक सिफारिश न कि आवश्यकता।
सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश कामत ने अदालत को अवगत कराया कि हिजाब एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है या नहीं, इस पर कर्नाटक, केरल और मद्रास उच्च न्यायालय के फैसलों ने अलग-अलग विचार रखे। कामत ने कहा कि मद्रास और केरल की अदालतों ने हिजाब को एक आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में माना है, लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट अलग है।












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