Golden Duck: दिल्ली चुनाव में एक बार फिर ZERO पर आउट हो सकती है कांग्रेस!
बेंगलुरू। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के मतदान 8 फरवरी होने जा रहा है और आज यानी 6 फरवरी को राजनीतिक दलों को चुनावी अभियान भी शांत हो जाएगा। दिल्ली चुनाव में अब तक चुनावी अभियान में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर खूब चला, जिसमें आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला दिखाई दे रहा है।

लेकिन इस सब के बीच में कांग्रेस कहां है और किसके खिलाफ लड़ाई के मैदान में खड़ी है, यह अबूझ पहेली बनी हुई है। दिल्ली का चुनाव प्रचार के आखिरी दिन भी कांग्रेस के चुनावी अभियान में जोश और रोमांच काफूर दिखा है। ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस सत्ता के लिए नहीं, बल्कि विधानसभा की सीट के लिए चुनावी मैदान में हैं।

दिल्ली चुनाव प्रचार के आखिरी दिन भी एक तरफ जहां भाजपा और आम आदमी पार्टी लगातार एक-दूसरे पर हमलावर हैं, लेकिन कांग्रेस दूर से सत्ता की दौड़ को देख रही है। दिल्ली में शीला दीक्षित के देहांत के बाद जैसे कांग्रेस बिना आत्मा के शरीर हो गई है। पिछले पांच वर्ष के हिसाब लगाए तो कांग्रेस सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी के खिलाफ बिल्कुल भी मुखर नहीं दिखी है और न ही केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली कांग्रेस ही आक्रामक दिखी है।

यही कारण है कि शीला दीक्षित की अनुपस्थित में भी कांग्रेस उनके ही नाम पर दिल्ली विधानसभा चुनाव का चुनाव लड़ रही है, जिन्हें वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने रिकॉर्ड मतों से हराकर राजनीति में ऐतिहासिक रूप से प्रवेश किया था। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस ने वर्ष 2015 विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित को दिल्ली विधानसभा में उम्मीदवार भी नहीं बनाया था। 2019 लोकसभा चुनाव में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी के बुरी तरह हार चुकी शीला दीक्षित को उनकी गैर मौजूदगी में सत्ता तक पहुंचने का कांग्रेस ख्वाब देख रही है।

गौरतलब है वर्ष 2015 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई थी, लेकिन पिछले पांच वर्षो में कांग्रेस और कांग्रेस के किसी नेता में दिल्ली के सत्ता के लिए कोशिश करता हुआ भी नहीं दिखा है। जबकि दिल्ली में हारून युसुफ, अरविंदर सिंह लवली, राजकुमार चौहान और अजय माकन जैसे धाकड़ नेता दिल्ली का प्रतिनिधुत्व करते आए हैं और सभी दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार में कैबिनेट स्तर के मंत्री रह चुके हैं।

कांग्रेस की यह स्थिति कमोबेश दिल्ली बीजेपी की तरह है, जहां डा. हर्ष वर्धन जैसे दिग्गज नेता की मौजूदगी में बीजेपी दिल्ली को मुख्यमंत्री कैंडीडेट तक नहीं घोषित कर पाई। जबकि दिल्ली बीजेपी के पास पूर्व दिल्ली सीएम साहिब सिंह वर्मा के सांसद पुत्र प्रवेश सिं वर्मा का भी विकल्प मौजूद था, लेकिन पिछले 7 वर्षों के अंतराल में भी बीजेपी दिल्ली में एक बेहतर नेता नहीं तैयार कर सकी।

हालांकि कांग्रेस की तुलना में बीजेपी की स्थिति दिल्ली में पहले से काफी बेहतर रही है और प्रधानमंत्री मोदी और पूर्व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के प्रयासों से दिल्ली में बीजेपी लड़ाई में आ गई है। कांग्रेस की मौजूदा स्थिति को देखकर माना जा रहा है कि कांग्रेस एक बार फिर दिल्ली में तीसरे नंबर पर रह सकती है।

अनुमान तो यहां तक जताया जा रहा है कि कांग्रेस एक बार जीरो पर आउट हो सकती है। इसकी तस्दीक खुद दिल्ली कांग्रेस के नेता भी कर चुके हैं, क्योंकि दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में कुछ एक को छोड़ लगभग सभी जगह आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ही सीधे मुकाबले नहीं है और कांग्रेस तीसरे स्थान के लिए लड़ती दिखाई दे रही है।

विधानसभा चुनावों की रणनीति व प्रबंधन से जुड़े प्रदेश कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि एक समय दिल्ली में सबसे मजबूत राजनीतिक दल के तौर पर स्थापित और लगातार 15 वर्षों तक शासन कर चुकी कांग्रेस मुश्किल से पांच या छह विधानसभा क्षेत्रों में ही ठीक से चुनाव लड़ रही है।
दिल्ली के जिन सीटों पर कांग्रेस की मौजूदगी दिख रही है उनमें ओखला, बल्लीमारान, सीलमपुर और मुस्तफाबाद की सीटें शामिल हैं। वह भी इसलिए क्योंकि उक्त सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनके अलावा पार्टी गांधीनगर और बादली जैसे क्षेत्रों में भी खुद को लड़ाई में मान रही है।

ओखला इलाके में सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद अहमद ने कहा कि कुछ हफ्ते पहले तक यहां कांग्रेस की स्थिति मजबूत थी, लेकिन अब यहां के लोगों में यह माहौल बनता दिख रहा है कि वो भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए यहां से जीतना काफी मुश्किल नजर आ रहा है।
ओखला से कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद परवेज हाशमी को उम्मीदवार बनाया है। प्रदेश में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ धरना प्रर्दशन का केंद्र बना शाहीन बाग इसी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

कुछ ऐसा ही नजारा सीलमपुर विधानसभा सीट पर भी है, जहां पांच बार के विधायक रहे मतीन अहमद के लिए भी हालात मुश्किल नजर आ रहे हैं। दरअसल, आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार बदलने और भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे के डर से कांग्रेस लिए यहां भी लड़ाई कठिन हो गई है।
हालांकि पूरी तस्वीर मतदान से ठीक पहले ही साफ हो सकेगी। सीएसडीएस के निदेशक और राजनीतिक विशेषज्ञ संजय कुमार की मानें तो दिल्ली में सत्ता की लड़ाई आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच है और कांग्रेस सत्ता की लड़ाई से लगभग बाहर हो चुकी है। बीजेपी ने आशंका जताई है कि दिल्ली चुनाव में कांग्रेस आम आदमी पार्टी के बीच समझौता हुआ। दोनों दल पहले भी साथ सरकार में रह चुकी हैं।

हालांकि दिल्ली प्रभारी कांग्रेस नेता पीसी चाको का दावा है कि पार्टी चौंकाने वाले नतीजे देगी। पीसी चाको के मुताबिक यह धारणा बनाई जा रही है कि आप और भाजपा के बीच मुकाबला है जबकि भाजपा की हालत बहुत खराब है। सोचिए, अमित शाह हर जगह रोड शो कर रहे हैं। कांग्रेस की स्थिति भाजपा से बेहतर है और कांग्रेस ही असल में केजरीवाल को चुनौती दे रहे हैं।
माना जा रहा है कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन कर रही कांग्रेस को उम्मीद थी कि उसे मुस्लिम वोटरों का भरपूर समर्थन मिलेगा, लेकिन पूर्व बीजेपी राष्ट्रीय अध्य़क्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी के आक्रामक कैंपेन से कांग्रेस की बची उम्मीदों को भी अब पलीता लग गया है।

उल्लेखनीय है कुछ समय पहले तक कांग्रेस के लिए संभावना वाली सीटें बताई जा रहीं करीब आधा दर्जन विधानसभा सीटों में पार्टी के नेताओं ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर यह स्वीकार किया कि जमीनी स्तर पर कुछ हफ्ते पहले वाले उत्साह की अब कमी है और इसकी वजह शाहीन बाग के प्रदर्शन और भाजपा एवं आप नेताओं की तल्ख बयानबाजी से बने सियासी हालात हैं।
इससे कांग्रेस हाशिए पर चली गई है और वोटों के ध्रुवीकरण आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच सिमट गया है, जो दिल्ली में कांग्रेस के मटियामेट स्थिति को द्योतक है। हालांकि कांग्रेस को उम्मीद है कि पार्टी 2015 चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करेगी और कई सीटों पर निर्णायक स्थिति में होगी।
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