चिकन-अंडा कोई पूछ नहीं रहा, 15 दिन में आधे रह गए दाम, गेहूं क्यों हुआ महंगा ? जानिए
नई दिल्ली, 27 जुलाई: चिकन और अंडों का कारोबार अचानक एकदम ठंडा हो गया है। जून तक में इनकी कीमतों में काफी बढ़ोतरी देखी जा रही थी। लेकिन, अब खरीदारों की संख्या में भारी कमी आ गई है। इसके चलते चिकन का वजन बढ़ रहा है और पोल्ट्री वालों की टेंशन इस कारण से और ज्यादा हो रही है। उधर गेहूं निर्यात पर सरकार ने मई महीने में ही पाबंदी लगा दी थी। यानी गेहूं की विदेशों को होने वाली सप्लाई बंद है, फिर भी इसकी कीमतें बढ़ती जा रही हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि, ना तो अब सामान्य किसानों के पास गेहूं का स्टॉक बचा है और ना ही छोटे कारोबियों ने इस जमा कर रखा है। लिहाजा बढ़ती कीमतों की मार तो आखिरकार आम उपभोक्ताओं को ही उठानी पड़ेगी।

15 दिन में आधे रह गए चिकन के दाम!
ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक पखवाड़े में विभिन्न राज्यों में फार्म वाले चिकन का दाम 25% से लेकर 50% तक घट गया है। चिकन के दाम में सबसे ज्यादा कमी महाराष्ट्र और झारखंड में आई है। महाराष्ट्र में जहां फार्म में चिकन की कीमत 115 रुपये प्रति किलो से घटकर 60 रुपये रह गया है, वहीं झारखंड में तो यह 50 रुपये प्रति किलो तक आ चुका है। भारतीय पोल्ट्री ब्रीडर्स एसोसिएशन के कंवेनर वसंतकुमार शेट्टी ने कहा है, 'फार्म गेट चिकन की कीमतें पिछले एक पखवाड़े के दौरान 115 रुपये प्रति किलोग्राम से घटकर 60 रुपये प्रति किलो हो गए हैं, जो प्रोडक्शन की लागत से भी कम है।'

सावन के महीने में खपत घटना बड़ा कारण
पोल्ट्री इंटीग्रेटर्स की चिंता इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि कई शहरों अंडों के दामों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। अभी अंडे 30 से 35 प्रतिशत कम दाम पर मिल रहे हैं। इस कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि सावन के महीने की वजह से उत्तर भारत में नॉनवेज की मांग घटना, चिकन-अंडों की कीमत कम होने का सबसे बड़ा कारण है। इस साल 15 जुलाई से सावन का महीना शुरू हुआ है। इनका ये भी मानना है कि जून में ज्यादा कीमतों की वजह से उपभोक्ता मांगों में कमी आई है।

गेहूं की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी-रिपोर्ट
इस बीच रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में गेहूं की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जबकि, इस साल देश की जरूरतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने गेहूं के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है। गेहूं की कीमतों में इस मौसम में हुई बढ़ोतरी की वजह मांग की तुलना में खराब मौसम की वजह से इसके फसलों को हुए नुकसान के चलते सप्लाई में आई कमी बताई जा रही है। रिपोर्ट में इंदौर के एक कारोबारी गोपालदास अग्रवाल को कोट करते हुए कहा गया है, 'ज्यादातर किसानों ने अपनी फसल बेच दी है। बिक्री के लिए बहुत ही कम सप्लाई आ रही है, जबकि मांग बहुत ही अधिक है।'

मिल मालिकों की वजह से बढ़ रही हैं कीमतें ?
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बुधवार को स्थानीय बाजार में गेहूं की कीमत 23,547 रुपये प्रति टन दर्ज की गई है, जो कि 14 मई को निर्यात पर सरकार की ओर से लगाई गई अचानक पाबंदी के बाद हाल के सबसे निचले स्तर की तुलना में लगभग 12% ज्यादा है। देश में गेहूं की कीमतें पिछले डेढ़ महीने में करीब 14% बढ़ी हैं, जिसकी वजह मिल मालिकों की ओर से ज्यादा मांग बताया जा रहा है। मानसून के सीजन में सप्लाई में हमेशा दिक्कत होती है। इसलिए मिल मालिक पहले से मैदा, आटा और सूजी जैसे उत्पाद बनाकर रखना चाहते हैं।

गेहूं की हुई जमाखोरी ?
उत्तर भारत में मिलों को सप्लाई होने वाले गेहूं की कीमतें जो जून में 2,260-2,270 रुपये प्रति क्विंटल थीं, आज की तारीख में 2,300-2,350 रुपये प्रति क्विंटल हो चुकी है। कारोबारियों का कहना है कि बड़ी कंपनिया और बड़े व्यापारी दाम बढ़ने की उम्मीद में जमाखोरी कर रहे हैं। जबकि, छोटे किसानों और साधारण कारोबारियों ने अपना स्टॉक पहले ही निकाल दिया हुआ है। जबकि, इस साल पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकारी स्वामित्व वाले फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का गेहूं मिलों के लिए उपलब्ध नहीं है।

देश की जरूरतों की वजह से निर्यात रोका गया है
खाद्य पदार्थों के दामों को नियंत्रित रखने के लिए पिछले मई में सरकार ने तत्काल प्रभाव से गेहूं निर्यात रोक दिया था। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से गेहूं की कीमतें दुनिया भर में बढ़ी हैं। तब देश में गेहूं की खुदरा का दाम 2,949 प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था। तब उपभोक्ता मामले, खाद्य और जन वितरण मंत्रालय ने कहा था कि निर्यात पर पाबंदी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगाई गई है, ताकि देश में किसी तरह की किल्लत ना रहे ।
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