मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर नहीं हुए हैं रमन सिंह, छत्तीसगढ़ BJP में है सर्वस्वीकार्यता, और भी हैं कारण
Next CM of Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ में जीत हासिल करने के बाद भाजपा सरकार के गठन में जुट चुकी है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने तीन पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर दी है, जिन्हें प्रदेश में अगला मुख्यमंत्री चुनने की जिम्मेदारी मिली है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि राज्य में 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे डॉ रमन सिंह के स्थान पर किसी नए चेहरे को मौका दिया जा सकता है,लेकिन इस चर्चा को पुख्ता नहीं माना जा सकता है। सूत्रों की मानें, तो रमन सिंह सीएम पद की दौड़ से बाहर नहीं हुए हैं।

रमन चुप हैं,लेकिन आत्मविश्वास बना हुआ है
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा, सर्वानंद सोनोवाल और दुष्यंत कुमार गौतम को पर्यवेक्षक बनाया है। इसी बीच पूर्व सीएम रमन सिंह का बड़ा बयान आया है, उन्होंने कहा है कि अगले एक दो दिन में मामला क्लीयर हो जाएगा। रमन सिंह का कहना है कि विधायक दल की बैठक के लिए नियुक्त पर्यवेक्षक विधायकों से सुझाव लेंगे, इसके बाद विधायक दल की राय और केंद्र की सहमति से विधायक दल का नेता चुना जायेगा। रमन सिंह ने कि अभी किसी का नाम फाइनल नहीं हुआ है, जब तक राय मशवरा नहीं होंगे तब तक किसी का नाम फ़ाइनल कहना मुश्किल है।
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आरएसएस भी ले रही है राय
आरएसएस से जुड़े सूत्रों की माने, तो आगामी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा कोई रिस्क नही लेना चाहती है, इसलिए पार्टी सर्वसम्मति से रमन सिंह को ही मौका दे सकती है। यह बात एकदम साफ़ है कि विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में भी रमन सिंह की पसंद से ही नाम फाइनल हुए थे। जाहिर सी बात है कि चुनाव जीतकर विधायक बनने वालों में से अधिकांश का झुकाव रमन सिंह के प्रति हो अधिक होगा। अधिकांश वही चेहरे हैं,जिन्हे रमन सिंह ने सीएम रहते हुए बड़े मंत्रालय सौंपे थे। सियासी समीकरण भी इसी तरह इशारा करते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लोकसभा चुनाव से पहले किसी भी तरह गुटबाजी को देना चाहता है,इसलिए पुराने चहेरे को ही आगे करके चुनाव जीतने की जुगत होगी।
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रमन सिंह की क्यों? रेणुका क्यों नहीं
सीएम पद की प्रबल दावेदार रेणुका सिंह और रामविचार नेताम सरगुजा संभाग के बड़े नेता हैं,लेकिन पूरे छत्तीसगढ़ के कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता नहीं है। रायपुर में आयोजित होने वाली भाजपा की बड़ी बैठकों में कभी उन्हें सक्रिय नहीं देखा गया है। पहली बार विधायक बने ओपी चौधरी राजनीती में बेहद नए हैं। 5 साल पहले ही उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण करके राजनीती में प्रवेश किया था, लिहाजा कार्यकर्ताओं के बीच उनका जनाधार लगभग शून्य है। अरुण साव समेत बाकी के दावेदार भले ही योग्यता के हर पैमाने पर फीट बैठते हैं,लेकिन लोकसभा चुनाव में सभी 11 जिताने की जिम्मेदारी रमन सिंह से बेहतर कोई नहीं संभाल सकता है।
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी की गारंटी के साथ ही अरुण साव का नेतृत्व और रमन सिंह का भूपेश बघेल के खिलाफ फ्रंट पर आकर खेलना भी बड़ा फैक्टर रहा है। मुख्यमंत्री पद के लिए इन दोनों नेताओ की दावेदारी को कोई ख़ारिज नहीं कर सकता है। आलाकमान भी इस बात से अनभिग्यनहीन होंगे कि जिन नेताओं के दम पर 2023 का चुनाव जीता है, कार्यकर्ताओ की ताक़त उन्ही के साथ हैं। बिना कार्यकर्ताओं के दम पर कोई चुनाव नही जीता जा सकता है,लिहाजा रमन सिंह की दावेदारी अब भी बनी हुई है।
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